अनुबंधों में जकड़ी ऊर्जा: दीर्घकालिक कोयला सौदे एशिया के स्वच्छ ऊर्जा बदलाव को कैसे रोकते हैं

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अनुबंधों में जकड़ी ऊर्जा: दीर्घकालिक कोयला सौदे एशिया के स्वच्छ ऊर्जा बदलाव को कैसे रोकते हैं

जलवायु लक्ष्यों से भी आगे तक चलने वाले अनुबंध

पूरे एशिया में बिजली कंपनियां कोयले से कहीं अधिक लंबे समय तक बंधी हुई हैं, जितना जलवायु नीति या बाजार के रुझानों से लगता है। दशकों तक चलने वाले बिजली खरीद समझौते कोयला संयंत्रों को चालू रखते हैं, भले ही ग्रिड पर सस्ती पवन और सौर ऊर्जा उपलब्ध हो। पावरिंग पास्ट कोल एलायंस की साझा की गई जानकारी के अनुसार, दक्षिण-पूर्व एशिया में कोयला आधारित क्षमता का 50 से 100 प्रतिशत हिस्सा ऐसे समझौतों के तहत आता है, जिनकी औसतन लगभग नौ से 18 साल की अवधि अभी बाकी है। इसका नतीजा विरोधाभासी है। नवीकरणीय बिजली का विस्तार हो रहा है, फिर भी कोयले से बिजली उत्पादन लगातार ऊंचा बना हुआ है, क्योंकि अनुबंधों के तहत खरीदारों को कोयला संयंत्रों को भुगतान करना पड़ता है, चाहे उनकी बिजली की जरूरत हो या नहीं।

विषय-सूची
  1. जलवायु लक्ष्यों से भी आगे तक चलने वाले अनुबंध
  2. ‘लो या भुगतान करो’ समझौते कैसे काम करते हैं
  3. पूरे क्षेत्र में बिजली उत्पादन घटाने का चलन बढ़ रहा है
  4. लचीलेपन से रहित संयंत्रों के इर्द-गिर्द बना ग्रिड
  5. देशों की स्थिति
  6. इंडोनेशिया
  7. वियतनाम
  8. फिलीपींस
  9. भारत
  10. पैसा, कानून और भुगतान कौन करेगा
  11. संयंत्रों को जल्दी बंद करने की योजनाएं क्यों अटकती हैं
  12. बजट बिगाड़े बिना अनुबंधों की जकड़न कैसे खोलें
  13. अनुबंधों को लचीला बनाएं
  14. संक्रमण क्रेडिट और कार्बन बाजारों का उपयोग करें
  15. ऊर्जा सुरक्षा और रोजगार
  16. क्या ये संयंत्र बंद करने के लिए सचमुच बहुत नए हैं
  17. जानने योग्य बातें

अनुबंधों की यह जकड़न क्षेत्रीय बिजली उत्पादन के आंकड़ों में भी दिख रही है। पिछले दशक में दक्षिण-पूर्व एशिया की बिजली आपूर्ति में कोयले की हिस्सेदारी लगभग 35 प्रतिशत से बढ़कर करीब 45 प्रतिशत हो गई, जबकि बिजली उत्पादन में कोयले की वैश्विक हिस्सेदारी करीब 39 प्रतिशत से घटकर लगभग 34 प्रतिशत रह गई। स्वच्छ ऊर्जा अब भी पीछे है। इस क्षेत्र की बिजली का लगभग 26 प्रतिशत नवीकरणीय स्रोतों से आता है, जो करीब 41 प्रतिशत के वैश्विक औसत से काफी कम है। यह अंतर कार्बन प्रदूषण घटाने और सौर, पवन तथा ऊर्जा भंडारण की लागत घटने के साथ बिजली प्रणाली की लागत कम करने, दोनों ही लिहाज से गंवाए गए अवसर को दर्शाता है।

चुनौती सिर्फ तकनीकी नहीं है। यह कानूनी और वित्तीय भी है। कोयला अनुबंध संयंत्र मालिकों की नियमित आय और श्रमिकों के स्थिर रोजगार की गारंटी देने के लिए बनाए गए थे। यदि बिजली कंपनियां नवीकरणीय ऊर्जा के लिए जगह बनाने के वास्ते अनुबंधित कोयला उत्पादन घटाती हैं, तो उन्हें जुर्माना भरने का जोखिम रहता है या फिर बंद पड़े कोयला संयंत्रों के तय शुल्क चुकाते रहना पड़ता है। किसी देश के पूरे बिजली संयंत्र बेड़े में ये देनदारियां अरबों डॉलर तक पहुंच सकती हैं। यही वजह है कि ग्रिड संचालक अक्सर पहले पवन या सौर ऊर्जा का उत्पादन घटाते हैं, भले ही इससे बिजली के लिए ज्यादा भुगतान करना पड़े।

‘लो या भुगतान करो’ समझौते कैसे काम करते हैं

उभरते एशियाई बाजारों में कोयला परियोजनाओं के ज्यादातर वित्तपोषण का आधार दीर्घकालिक बिजली खरीद समझौते रहे हैं। इनमें कई में तथाकथित ‘लो या भुगतान करो’ प्रावधान होते हैं, जिनके तहत खरीदारों को न्यूनतम मात्रा या क्षमता के लिए भुगतान करना पड़ता है, चाहे संयंत्र चालू हो या नहीं। इसका उद्देश्य 20 से 30 वर्षों तक आय सुनिश्चित करके निवेश जोखिम को कम करना था। यह ढांचा ग्रिड की रीढ़ के रूप में बड़े, लगातार चलने वाले कोयला संयंत्रों के पुराने मॉडल के अनुकूल था। लेकिन आधुनिक बिजली प्रणाली के लिए यह ठीक से काम नहीं करता, जहां बदलते उत्पादन वाले नवीकरणीय स्रोत बिजली का बढ़ता हिस्सा देते हैं और ग्रिड को तय उत्पादन से ज्यादा लचीलेपन की जरूरत होती है।

इन समझौतों को तोड़ना या फिर से तय करना कठिन है। अनुबंधों की शर्तें अलग-अलग होती हैं, लेकिन उत्पादन में कमी पर जुर्माने आम हैं। जिन परियोजनाओं में विदेशी ऋणदाता और निवेशक शामिल थे, वहां बिजली अनुबंधों के साथ सरकारी सहायता समझौते भी हो सकते हैं, जिनमें निवेशकों को मजबूत सुरक्षा दी जाती है। यदि नीतियों के कारण संयंत्र समय से पहले बंद होते हैं, तो इनसे मुआवजे के दावे उठ सकते हैं। निवेशक विवादों से बचने की इच्छुक सरकारें अक्सर संयंत्र बंद करने का आदेश देने से हिचकती हैं, भले ही उनकी जलवायु रणनीतियां ऐसा करने की मांग करें।

पूरे क्षेत्र में बिजली उत्पादन घटाने का चलन बढ़ रहा है

जब अनुबंधित कोयला उत्पादन ग्रिड की उपलब्ध क्षमता को घेर लेता है, तो नवीकरणीय ऊर्जा संयंत्रों का उत्पादन घटा दिया जाता है। नवीकरणीय बिजली उत्पादन को जानबूझकर कम करने की यह प्रक्रिया, यानी उत्पादन में कटौती, अब ज्यादा बार होने लगी है। चीन में स्वच्छ ऊर्जा क्षमता में तेज बढ़ोतरी के बावजूद, अक्टूबर में कोयला और गैस संयंत्रों का उत्पादन पिछले साल के इसी महीने की तुलना में 7.3 प्रतिशत बढ़ा। विश्लेषकों का कहना है कि कोयले से जुड़ी दीर्घकालिक प्रतिबद्धताएं सौर और पवन ऊर्जा के उत्पादन में कटौती का एक कारण हैं। वुड मैकेंजी का अनुमान है कि अगले दशक में 21 प्रांतों में सौर ऊर्जा उत्पादन में औसतन 5 प्रतिशत से ज्यादा कटौती होगी। जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत समेत एशिया-प्रशांत की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं ने भी पिछले साल नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन में बढ़ी हुई कटौती की खबर दी है।

उत्पादन घटाने की सीधी आर्थिक लागत होती है। पवन और सौर ऊर्जा निवेशकों को उम्मीद से कम आय होती है, जिससे भविष्य के निवेश पर असर पड़ सकता है। उपभोक्ताओं को भी नुकसान होता है, क्योंकि प्रणाली को जरूरत से ज्यादा बिजली के लिए भुगतान करना पड़ता है: कोयला अनुबंधों का पालन करने के लिए भी और उन नवीकरणीय परियोजनाओं को मुआवजा देने के लिए भी, जो अपना पूरा उत्पादन नहीं दे पातीं। लचीलेपन से रहित कोयला अनुबंध जितने लंबे समय तक बने रहेंगे, स्वच्छ ऊर्जा परिसंपत्तियों का कम उपयोग होने और प्रणाली की लागत बढ़ने का जोखिम उतना ही बढ़ेगा।

लचीलेपन से रहित संयंत्रों के इर्द-गिर्द बना ग्रिड

कोयला संयंत्रों को लंबे समय तक लगातार चलने के लिए बनाया गया है और उनका उत्पादन तेजी से बढ़ाना या घटाना महंगा पड़ता है। इसके उलट, नवीकरणीय ऊर्जा का उत्पादन बदलता रहता है। दोनों में तालमेल के लिए बेहतर समय-निर्धारण, ज्यादा ऊर्जा भंडारण और लचीलेपन को महत्व देने वाले अनुबंध जरूरी हैं। इन बदलावों के बिना, बिजली व्यवस्था संभालने वाले अधिकारी अक्सर अनुबंध के जुर्माने और तकनीकी दबाव से बचने के लिए कोयला संयंत्र चालू रखते हैं, फिर दोपहर में सौर ऊर्जा के चरम उत्पादन या हवा वाली रातों में पवन ऊर्जा का उत्पादन घटाते हैं। आधुनिक ग्रिड के लिए मांग के अनुसार बिजली खपत में बदलाव, बिजली पारेषण में सुधार, जरूरत पड़ने पर निकट भविष्य में लचीले गैस संयंत्र और तेजी से बढ़ती बैटरी क्षमता जरूरी हैं। साथ ही, पुराने अनुबंधों में भी यह गुंजाइश होनी चाहिए कि नवीकरणीय ऊर्जा प्रचुर होने पर कोयला उत्पादन घटाया जा सके।

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देशों की स्थिति

हर बाजार में कोयला अनुबंधों की चुनौती अलग दिखती है, लेकिन कुछ बातें बार-बार सामने आती हैं: अनुबंधों की लंबी बची हुई अवधि, ऊंचे तय शुल्क और संयंत्र बंद करने के वित्तपोषण को लेकर नीतिगत अनिश्चितता। प्रमुख देशों की स्थिति इस प्रकार है।

इंडोनेशिया

इंडोनेशिया कोयले पर बहुत अधिक निर्भर है और वहां दीर्घकालिक समझौतों से समर्थित संयंत्रों का बड़ा बेड़ा है। सरकार ने कोयले को धीरे-धीरे बंद करने के लक्ष्य घोषित किए हैं और इसी में मदद के लिए अरबों डॉलर की ‘जस्ट एनर्जी ट्रांजिशन पार्टनरशिप’ बनाई गई। प्रगति असमान रही है। 2030 तक लगभग 6.7 गीगावाट क्षमता बंद करने की योजनाएं अंतरराष्ट्रीय वित्तपोषण के धीमे वितरण के कारण जोखिम में हैं। पिछले निवेश चक्र में जरूरत से ज्यादा क्षमता बन जाने के कारण सरकारी बिजली कंपनी पीएलएन अब भी कुछ संयंत्रों की अप्रयुक्त क्षमता के लिए भुगतान कर रही है। इसका बोझ अंततः उपभोक्ताओं और सरकार पर पड़ता है। एम्बर के विश्लेषकों का कहना है कि 2040 तक कोयले को चरणबद्ध तरीके से खत्म करने के लिए हर साल करीब 3 गीगावाट कोयला क्षमता बंद करनी होगी और नवीकरणीय ऊर्जा, खासकर सौर ऊर्जा के साथ बैटरियों, का तेजी से विस्तार करना होगा, ताकि 2040 तक बिजली मिश्रण में स्वच्छ ऊर्जा की हिस्सेदारी लगभग 65 प्रतिशत हो जाए। इंडोनेशिया संयंत्रों को समय से पहले बंद करने के सौदों को भी आजमा रहा है। इनमें एशियाई विकास बैंक के एनर्जी ट्रांजिशन मैकेनिज्म से जुड़ा एक सौदा शामिल है। इस मॉडल में कोयला परिसंपत्तियों का कम लागत पर पुनर्वित्तपोषण, निवेशकों को जल्दी भुगतान और मूल अनुबंध में तय समय से पहले संयंत्र बंद करना शामिल है।

वियतनाम

वियतनाम ने कोयले से स्वच्छ ऊर्जा की ओर जाने के लिए उच्चस्तरीय प्रतिबद्धताएं की हैं और वहां निवेश का माहौल तुलनात्मक रूप से अनुकूल है। बिजली की कमी की आशंकाओं ने नीति-निर्माताओं को कोयला संयंत्रों को बहुत तेजी से बंद करने के मामले में सतर्क रखा है। शोधकर्ताओं का सुझाव है कि निकट भविष्य में सबसे व्यावहारिक कदम हैं: नई कोयला क्षमता जोड़ना रोकना, मौजूदा नवीकरणीय ऊर्जा का बेहतर उपयोग करना और अनुबंधों में सुधार करना, ताकि कोयला संयंत्रों को कम घंटे चलाने पर जुर्माना न लगे। मकसद बिजली आपूर्ति जारी रखते हुए अधिक पवन और सौर ऊर्जा के लिए जगह बनाना और उत्पादन में कटौती का जोखिम घटाना है।

फिलीपींस

फिलीपींस ने 2020 में नई कोयला परियोजनाओं पर रोक लगाई, लेकिन जो संयंत्र पहले से निर्माण की प्रक्रिया में थे, वे लंबे समय तक चलने वाले अनुबंधों के साथ आगे बढ़े। बातान में जीएनपावर डिंगिनिन संयंत्र इस जकड़न की मिसाल है। बड़े कोयला अनुबंध को समय से पहले खत्म करने में सैकड़ों करोड़ डॉलर खर्च हो सकते हैं, जिसमें बकाया ऋण, कर और खोया हुआ मुनाफा शामिल है। आमतौर पर यह लागत बिजली उपभोक्ताओं पर डाल दी जाती है। दक्षिण-पूर्व एशिया में कोयला परिसंपत्तियों का बड़ा हिस्सा सरकारी संस्थाओं के पास है। अमीर देशों के विपरीत, जहां सरकारी एजेंसियां अनुबंध खरीदकर उन्हें खत्म कर सकती हैं, क्षेत्र की कई सरकारों के पास ऐसा करने के लिए पर्याप्त वित्तीय गुंजाइश नहीं है। इसीलिए संयंत्र बंद करने की किसी भी योजना में मिश्रित वित्तपोषण और बहुपक्षीय सहायता अहम हैं।

भारत

भारत सौर और पवन ऊर्जा क्षमता का तेजी से विस्तार कर रहा है, फिर भी राज्य सरकारों के बिजली खरीदार अब भी कोयला बिजली उत्पादकों के साथ नए दीर्घकालिक समझौतों की तैयारी कर रहे हैं। स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन बढ़ने के साथ, बिजली वितरकों को कम उपयोग हो रही कोयला परिसंपत्तियों पर भारी तय शुल्क चुकाने का जोखिम है। एम्बर और क्लाइमेट ट्रेंड्स समेत शोध संस्थानों का कहना है कि वितरण कंपनियों को संसाधन योजनाओं में बदलाव कर लचीले अनुबंध अपनाने चाहिए, ताकि उपलब्ध होने पर स्वच्छ ऊर्जा को प्राथमिकता दी जा सके। यह बदलाव नहीं हुआ तो उत्पादन में कटौती और फंसी हुई परिसंपत्तियों का जोखिम बढ़ेगा।

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पैसा, कानून और भुगतान कौन करेगा

हर कोयला संयंत्र के पीछे एक वित्तीय ढांचा होता है। कई मामलों में विदेशी निवेशकों और ऋणदाताओं ने परियोजनाओं को वित्तपोषित किया और मेजबान सरकारों ने अनुबंधों तथा गारंटियों के जरिए उनका समर्थन किया। वर्ल्ड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट के शोध से एक कठिन वास्तविकता सामने आती है। कई निवेश समझौतों के तहत, यदि सरकारी नीतियों के कारण संयंत्र समय से पहले बंद होते हैं तो मेजबान सरकारों को निवेशकों को मुआवजा देना पड़ता है। इससे तेजी से कार्रवाई करने की इच्छा पर गहरा अंकुश लगता है। सीमित वित्तीय गुंजाइश वाली सरकारें मुआवजे की बड़ी देनदारियां उठाने की संभावना नहीं रखतीं और अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरणों में निवेशक विवादों को आमंत्रित करने से भी हिचकती हैं। बीते दौर के निवेश नियमों का कानूनी ढांचा जलवायु लक्ष्यों को ध्यान में रखकर नहीं बनाया गया था।

फिर भी, रास्ते मौजूद हैं। सरकारें संयंत्र मालिकों, ऋणदाताओं और विकास बैंकों समेत सभी पक्षों को साथ लाकर सुव्यवस्थित बातचीत की अगुवाई कर सकती हैं। चीन, जापान और कोरिया जैसे प्रमुख विदेशी निवेशकों के मूल देश मदद कर सकते हैं, खासकर इसलिए कि इन देशों के सरकारी बैंकों ने दक्षिण-पूर्व एशिया के कई कोयला संयंत्रों को वित्तपोषित किया है। बहुपक्षीय विकास बैंक गतिरोध दूर करने के लिए रियायती पूंजी, कानूनी सहायता और जोखिम बीमा दे सकते हैं। सभी पक्षों के समझौते के बिना संयंत्रों को समय से पहले बंद करना शायद ही संभव हो, लेकिन मिसालें उभर रही हैं। इनमें इंडोनेशिया और चिली के ऐसे सौदे शामिल हैं, जिनमें तेज उत्सर्जन कटौती के बदले ब्याज दरें कम की जाती हैं।

संयंत्रों को जल्दी बंद करने की योजनाएं क्यों अटकती हैं

विचार सरल है: संयंत्रों को जल्दी बंद करें और उनकी जगह स्वच्छ ऊर्जा लाएं। व्यवहार में, किसी को निवेशकों को संचालन के बचे हुए वर्षों के नुकसान का मुआवजा देना होगा या अनुबंध की शर्तें बदलनी होंगी। दानदाताओं के नियमों ने कोयला परिसंपत्तियां खरीदने के लिए सरकारी धन के इस्तेमाल को सीमित किया है। कोयला मालिकों को संयंत्र बंद करने के लिए भुगतान करने पर निजी ऋणदाताओं को अपनी प्रतिष्ठा को लेकर जोखिम रहता है। इन बंदिशों से समय से पहले संयंत्र बंद करने के कार्यक्रम धीमे पड़े हैं और योजनाकारों को दूसरे उपायों पर ध्यान देना पड़ा है, जैसे नवीकरणीय ऊर्जा का विस्तार तेज करना और मौजूदा अनुबंधों के तहत कोयला संयंत्रों के संचालन के घंटे घटाने की कोशिश करना।

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बजट बिगाड़े बिना अनुबंधों की जकड़न कैसे खोलें

नए वित्तीय और कानूनी साधनों का मकसद कोयला अनुबंधों का पुनर्गठन करना है, ताकि स्वच्छ ऊर्जा कम लागत पर बढ़ सके। आरएमआई के विश्लेषण में तीन व्यावहारिक रास्ते बताए गए हैं। पहला है, परिसंपत्ति का पुनर्वित्तपोषण करके और निवेशकों को जल्दी भुगतान कर कोयला बिजली खरीद समझौते को समय से पहले खत्म करना, ताकि संयंत्र तय समय से कई साल पहले बंद हो जाए। दूसरा है, कोयला अनुबंध की जगह स्वच्छ ऊर्जा अनुबंध लाना, ताकि ऋण चुकाने और कमाई का संबंध नई नवीकरणीय ऊर्जा तथा ऊर्जा भंडारण से हो, जो बिजली की कमी पूरी करें। तीसरा है, संयंत्र बंद होने से पहले उत्सर्जन घटाने के लिए कोयला अनुबंध का पुनर्गठन करना। मिसाल के तौर पर न्यूनतम बिजली खरीद घटाना, संयंत्र को अनिवार्य रूप से चलाने के घंटे कम करना और भुगतान को वास्तविक बिजली उत्पादन के मुताबिक करना, साथ ही संयंत्र बंद करने की पक्की तारीख तय करना।

ये तरीके ऐसे कोयला संक्रमण तंत्रों पर निर्भर करते हैं, जो रियायती ऋण और वाणिज्यिक पूंजी को मिलाकर उपभोक्ताओं तथा करदाताओं के लिए लागत को संभालने लायक रखते हैं और निवेशकों को लगभग पूरा भुगतान सुनिश्चित करते हैं। कुछ ढांचे, जैसे नियोजित संक्रमण कोष, कई वर्षों की संक्रमण अवधि बना सकते हैं। इस दौरान स्वच्छ ऊर्जा क्षमता खड़ी की जाती है और कोयला संयंत्रों का संचालन तेजी से घटाया जाता है। सही नीतिगत समर्थन के साथ, इन साधनों से कुछ संयंत्रों में उत्सर्जन 80 प्रतिशत या उससे अधिक, और कुछ मामलों में 90 प्रतिशत से भी ज्यादा घटाया जा सकता है। अहम बात ऐसे पैकेज तैयार करना है जो वित्तपोषण के योग्य हों और बिजली कंपनियों, संयंत्र मालिकों, ऋणदाताओं तथा नियामकों के हितों में तालमेल बिठाएं।

अनुबंधों को लचीला बनाएं

अनुबंधों का लचीलापन भी वित्तपोषण जितना ही अहम है। कोयला-केंद्रित दौर में किए गए बिजली खरीद समझौते अक्सर बिजली की बुनियादी मांग पूरी करने के लिए लगातार संचालन और उच्च क्षमता उपयोग मानकर चलते हैं। नवीकरणीय ऊर्जा को प्राथमिकता देने वाली प्रणाली में ये बातें बाधा बन जाती हैं। नियामक नए और फिर से तय किए गए अनुबंधों में आर्थिक आधार पर बिजली उत्पादन तय करने का अधिकार, न्यूनतम बिजली खरीद के निचले स्तर, तय उत्पादन के बजाय लचीलेपन के लिए प्रदर्शन-आधारित भुगतान और नवीकरणीय उत्पादन प्रचुर होने पर कोयला उत्पादन रोकने की गुंजाइश अनिवार्य कर सकते हैं। बिजली पारेषण में निवेश और क्षेत्रीय ग्रिड संपर्क से अतिरिक्त सौर और पवन ऊर्जा का बाजार बढ़ सकता है। ऊर्जा भंडारण और मांग के अनुसार बिजली खपत में बदलाव से खपत को उस समय तक टाला जा सकता है जब नवीकरणीय ऊर्जा का उत्पादन अधिक हो।

संक्रमण क्रेडिट और कार्बन बाजारों का उपयोग करें

टाले गए उत्सर्जन का मूल्य होने पर संयंत्रों को समय से पहले बंद करने के सौदों का वित्तपोषण आसान हो जाता है। सत्यापन योग्य संयंत्र बंदी से जुड़े संक्रमण क्रेडिट पुनर्वित्तपोषण और संयंत्र बंद करने की लागत घटा सकते हैं। एशियाई विकास बैंक के एनर्जी ट्रांजिशन मैकेनिज्म जैसे कार्यक्रम कम लागत वाली पूंजी को मापने योग्य उत्सर्जन कटौती और संयंत्र बंद करने की स्पष्ट समयसीमा के साथ जोड़ने का लक्ष्य रखते हैं। यह सुनिश्चित करने के लिए सावधानीपूर्वक योजना जरूरी है कि क्रेडिट वास्तविक और अतिरिक्त कटौतियों को दर्शाएं तथा संयंत्रों के आसपास के समुदायों को ठोस लाभ मिले।

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ऊर्जा सुरक्षा और रोजगार

कोयले पर बहस में बिजली आपूर्ति की विश्वसनीयता और रोजगार को लेकर चिंताएं अहम भूमिका निभाती हैं। उचित योजना के साथ इन समस्याओं को हल किया जा सकता है। विश्वसनीय आपूर्ति के लिए सिर्फ लगातार चलने वाले संयंत्र काफी नहीं हैं। ऐसे संसाधनों की जरूरत है जो आपूर्ति और मांग में बदलाव पर तेजी से प्रतिक्रिया दे सकें। बैटरियां, जहां जरूरी हो वहां संक्रमणकालीन विकल्प के रूप में लचीली गैस क्षमता, ग्रिड को मजबूत करना और बेहतर पूर्वानुमान, ये सभी मददगार हैं। नीतियों के जरिए निकट भविष्य में कोयला संयंत्रों को अधिक लचीले ढंग से चलाना अनिवार्य किया जा सकता है। इससे उनका न्यूनतम स्थिर उत्पादन घटेगा और उत्पादन तेजी से बढ़ाना संभव होगा, जिससे नवीकरणीय ऊर्जा की कम बर्बादी होगी।

हर योजना में न्यायसंगत संक्रमण शामिल होना चाहिए। कोयले पर निर्भर प्रांतों और समुदायों को नए उद्योगों, प्रशिक्षण और लक्षित सहायता में निवेश की जरूरत है। सामाजिक अव्यवस्था कम से कम रखने के लिए संयंत्र बंद करने का क्रम तय किया जा सकता है। जहां संयंत्र स्थानीय स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा पैदा करते हैं, वहां जल्दी कार्रवाई से तत्काल लाभ मिल सकता है। श्रमिकों और प्रभावित कारोबारों के लिए सहायता को संक्रमण के वित्तपोषण में शामिल किया जाना चाहिए, न कि बाद में सोचा जाने वाला पहलू समझा जाना चाहिए।

क्या ये संयंत्र बंद करने के लिए सचमुच बहुत नए हैं

अक्सर दावा किया जाता है कि दक्षिण-पूर्व एशिया के कोयला संयंत्र बंद करने के लिए बहुत नए हैं। नया विश्लेषण इस धारणा को कमजोर करता है। ग्लोबल एनर्जी मॉनिटर का अनुमान है कि 2040 तक दक्षिण-पूर्व एशिया के कोयला संयंत्रों की औसत आयु करीब 28 वर्ष हो जाएगी। नीतियां यदि बिजली प्रणाली को स्वच्छ ऊर्जा की ओर ले जाएं, तो इस उम्र तक अधिकांश संयंत्र सामान्य सेवानिवृत्ति अवधि में आ जाएंगे। नए कोयला संयंत्र जोड़ना रोकना बेहद जरूरी है। यदि और क्षमता नहीं जोड़ी गई, तो 2040 तक पूरे बेड़े का केवल एक छोटा हिस्सा 20 साल से कम उम्र का होगा। वित्तीय अध्ययनों से यह भी पता चलता है कि सही नीतियों और वित्तपोषण के साथ कुछ संयंत्रों को 15 साल की उम्र के आसपास बंद कर उनकी जगह नवीकरणीय ऊर्जा और भंडारण लाना किफायती हो सकता है, और इससे थोक बिजली कीमतें बढ़ेंगी भी नहीं।

ग्लोबल एनर्जी मॉनिटर में ग्लोबल कोल प्लांट ट्रैकर का प्रबंधन करने वाली क्रिस्टीन शियरर ने इस विचार को खारिज किया कि क्षेत्र के कोयला संयंत्रों का कम उम्र होना उनके भविष्य को तय करता है।

क्रिस्टीन शियरर, ग्लोबल एनर्जी मॉनिटर: "यह मानना गलत है कि दक्षिण-पूर्व एशिया के कोयला संयंत्र इतने नए हैं कि उन्हें बंद नहीं किया जा सकता।"

यह नजरिया उन दूसरे क्षेत्रों के अनुभवों से मेल खाता है, जहां अनुबंधों और नीतियों में तालमेल होने पर कोयले का इस्तेमाल तेजी से बंद हुआ। दक्षिण-पूर्व एशिया के लिए अगला कदम प्रायोगिक सौदों को बड़े पैमाने के कार्यक्रमों में बदलना और यह सुनिश्चित करना है कि कोयले या स्वच्छ ऊर्जा, दोनों के नए अनुबंधों में शुरुआत से ही लचीलापन शामिल हो। सुधारों के बिना, क्षेत्र को कोयला संयंत्रों के लिए दो बार भुगतान करने का जोखिम है: एक बार तय शुल्क के रूप में और फिर कम इस्तेमाल हो रही नवीकरणीय ऊर्जा की कीमत में। सुधारों के साथ, बिजली आपूर्ति जारी रखते हुए क्षेत्र उत्सर्जन तेजी से घटा सकता है, निवेश आकर्षित कर सकता है और जनस्वास्थ्य बेहतर कर सकता है।

जानने योग्य बातें

  • दक्षिण-पूर्व एशिया की कोयला क्षमता का 50 से 100 प्रतिशत हिस्सा बिजली खरीद समझौतों में बंधा है, जिनकी औसतन नौ से 18 साल की अवधि बाकी है।
  • पिछले दशक में दक्षिण-पूर्व एशिया की बिजली में कोयले की हिस्सेदारी बढ़कर करीब 45 प्रतिशत हो गई, जबकि कोयले की वैश्विक हिस्सेदारी घटकर लगभग 34 प्रतिशत रह गई।
  • दक्षिण-पूर्व एशिया की बिजली का लगभग 26 प्रतिशत नवीकरणीय स्रोतों से आता है, जबकि वैश्विक स्तर पर यह करीब 41 प्रतिशत है। इसकी एक वजह यह है कि कोयला अनुबंध स्वच्छ ऊर्जा के लिए उपलब्ध जगह कम करते हैं।
  • चीन, जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत ने नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन में बढ़ी हुई कटौती की खबर दी है, क्योंकि कोयले से जुड़ी दीर्घकालिक प्रतिबद्धताएं ग्रिड का लचीलापन सीमित करती हैं।
  • कोयला अनुबंध तोड़ने पर जुर्माना और मुआवजे के दावे हो सकते हैं, खासकर उन मामलों में जहां विदेशी निवेशकों को सुरक्षा मिली हो। इससे संयंत्रों को समय से पहले बंद करना धीमा पड़ता है।
  • इंडोनेशिया की कोयला क्षमता घटाने की योजनाएं वित्तपोषण में देरी का सामना कर रही हैं। विश्लेषकों का कहना है कि 2040 तक कोयले से बाहर निकलने के लिए हर साल करीब 3 गीगावाट क्षमता बंद करनी होगी और बिजली मिश्रण में नवीकरणीय ऊर्जा की हिस्सेदारी लगभग 65 प्रतिशत तक बढ़ानी होगी।
  • आरएमआई और अन्य संस्थाएं अनुबंधों की जकड़न दूर करने के उपाय बताती हैं। इनमें अनुबंध समय से पहले खत्म करना, उनकी जगह स्वच्छ ऊर्जा अनुबंध लाना और उत्सर्जन घटाने के लिए अनुबंधों का पुनर्गठन शामिल है।
  • संक्रमण वित्तपोषण और कार्बन क्रेडिट से संयंत्र बंद करने की लागत घट सकती है, जबकि अनुबंध के नए नियमों में लचीलेपन और आर्थिक आधार पर बिजली उत्पादन को प्राथमिकता देनी चाहिए।
  • ग्लोबल एनर्जी मॉनिटर के अनुसार, 2040 तक दक्षिण-पूर्व एशिया के कोयला संयंत्रों की औसत उम्र सामान्य सेवानिवृत्ति उम्र के करीब पहुंच जाएगी। सही नीतियों के तहत उन्हें पहले बंद करना संभव है।
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