कार निर्माण केंद्र के रूप में भारत क्यों उभर रहा है
जापान की सबसे बड़ी कार कंपनियां उस बदलाव को तेज कर रही हैं जिसकी तैयारी वर्षों से चल रही है। टोयोटा, होंडा और सुज़ुकी नई पूंजी, नए उत्पाद और आपूर्ति श्रृंखलाएं भारत ला रही हैं। इससे चीन पर उनकी निर्भरता घट रही है और भारत एक अहम उत्पादन केंद्र बन रहा है। निवेश का पैमाना उल्लेखनीय है। टोयोटा और सुज़ुकी ने मिलकर करीब 11 अरब डॉलर के निवेश की रूपरेखा पेश की है। इसका लक्ष्य नए कारखाने, उत्पादन क्षमता का विस्तार और निर्यात कारोबार को मजबूत करना है। होंडा ने संकेत दिया है कि वह अपने आगामी इलेक्ट्रिक मॉडलों में से एक का निर्माण और निर्यात भारत से करेगी, जिससे देश उसके वैश्विक उत्पादन नेटवर्क में शामिल होगा। भारत लंबे समय से बड़ा श्रमबल और लागत संबंधी फायदे देता आया है, लेकिन मौजूदा निवेश लहर प्रतिस्पर्धा, नीतियों और विद्युतीकरण के अगले चरण से प्रेरित गहरे रणनीतिक बदलाव को दर्शाती है।
विषय-सूची
- कार निर्माण केंद्र के रूप में भारत क्यों उभर रहा है
- भारत में टोयोटा की रणनीति
- सुज़ुकी और मारुति निर्यात तथा बाजार हिस्सेदारी बढ़ाने की तैयारी में
- होंडा की नई शुरुआत भारत को उत्पादन और निर्यात केंद्र बना रही है
- चीन का असर और क्षेत्रीय रणनीति में बदलाव
- नीतिगत समर्थन और अमल की चुनौतियां
- रोजगार, आपूर्तिकर्ता और तकनीक का हस्तांतरण
- मुख्य बातें
इस बदलाव के पीछे कई कारण हैं। चीनी इलेक्ट्रिक वाहन निर्माताओं के बीच तीखी मूल्य प्रतिस्पर्धा ने चीन में मुनाफा बनाए रखना मुश्किल कर दिया है। वहीं, भारत ने चीनी निवेश पर नियंत्रण कड़े किए हैं और नए चीनी कार ब्रांडों के लिए अपना बाजार काफी हद तक बंद रखा है। इस रुख से जापानी वाहन निर्माताओं को अपनी रणनीति बदलने के लिए अहम गुंजाइश मिली है। आंकड़े इस बदलाव को रेखांकित करते हैं। भारत के परिवहन क्षेत्र में जापानी प्रत्यक्ष निवेश 2021 से 2024 के बीच सात गुने से अधिक बढ़कर करीब 294 अरब येन हो गया, जबकि इसी अवधि में चीन के परिवहन क्षेत्र में निवेश तेजी से गिरकर लगभग 46 अरब येन रह गया। भारत ने पिछले साल करीब 50 लाख यात्री वाहन बनाए और लगभग 8 लाख इकाइयों का निर्यात किया। निर्यात की वृद्धि स्थानीय बिक्री से तेज रही, जो इस बात का अहम संकेत है कि भारत निर्यात केंद्र के रूप में विकसित हो रहा है।
यह बदलाव आपूर्ति श्रृंखलाओं के व्यापक पुनर्गठन का हिस्सा है। जापानी ब्रांड ऐसी सुदृढ़ और विविध उत्पादन व्यवस्था चाहते हैं जो किसी एक देश पर जरूरत से ज्यादा निर्भर हुए बिना एशिया, मध्य पूर्व और अफ्रीका की जरूरतें पूरी कर सके। भारत में विनिर्माण गुणवत्ता सुधरी है, स्थानीय आपूर्तिकर्ताओं का आधार परिपक्व हो रहा है और सरकारी प्रोत्साहन हाइब्रिड, ईवी तथा उन्नत पुर्जों के संपूर्ण इकोसिस्टम बनाने पर केंद्रित हैं। टाटा मोटर्स और महिंद्रा जैसी घरेलू कंपनियां भी अपना विस्तार कर रही हैं, जिससे भारत प्रतिस्पर्धी और विकास की बड़ी संभावनाओं वाला बाजार बन रहा है। टोयोटा, होंडा और सुज़ुकी के अगले अध्याय भारतीय कारखानों, आपूर्तिकर्ता परिसरों और फैलते बंदरगाह गलियारों में लिखे जाएंगे।
भारत में टोयोटा की रणनीति
भारत में टोयोटा की योजना उत्पादन क्षमता बढ़ाने, उत्पादों का विस्तार करने और स्थानीयकरण को गहरा करने पर आधारित है। कंपनी ने दक्षिण भारत में अपने मौजूदा परिसर में विनिर्माण बढ़ाने और महाराष्ट्र में नया संयंत्र बनाने के लिए 3 अरब डॉलर से अधिक के निवेश की घोषणा की है। टोयोटा का लक्ष्य दशक के अंत तक भारत में 15 नए और उन्नत मॉडल पेश करना और लगभग 10 प्रतिशत बाजार हिस्सेदारी हासिल करना है। इस विस्तार से भारत में टोयोटा की उत्पादन क्षमता सालाना 10 लाख वाहनों से अधिक हो जाएगी। रणनीति बड़े शहरों तक सीमित नहीं है। ग्रामीण बाजारों में विस्तार के लिए टोयोटा कम लागत वाले बिक्री केंद्र और छोटी वर्कशॉप खोल रही है। साथ ही, हालिया वृद्धि को गति देने वाली मध्यम और प्रीमियम एसयूवी श्रेणियों में अपनी मजबूत मौजूदगी बनाए रखेगी।
टोयोटा के निकट अवधि के उत्पाद मिश्रण में हाइब्रिड वाहनों की अहम भूमिका है। अर्बन क्रूज़र हाइराइडर और इनोवा हाईक्रॉस जैसे मॉडलों ने ऐसे ईंधन-बचत विकल्पों पर चर्चा में ब्रांड को आगे रखा है जो मौजूदा बुनियादी ढांचे की वास्तविकताओं के अनुकूल हैं। कंपनी के अधिकारियों ने भारतीय और जापानी आपूर्तिकर्ताओं के साथ मिलकर हाइब्रिड के अहम पुर्जों का स्थानीयकरण करने पर भी ध्यान दिया है, ताकि लागत घटे और आपूर्ति का आधार व्यापक हो। महाराष्ट्र में औरंगाबाद के पास एक नए संयंत्र में टोयोटा से पेट्रोल, हाइब्रिड और इलेक्ट्रिक संस्करणों वाली एसयूवी बनाने की उम्मीद है। इससे घरेलू खरीदारों और निर्यात ग्राहकों, दोनों की जरूरतें पूरी होंगी। यह तरीका कंपनी के विनिर्माण दर्शन के अनुरूप है, जिसमें उत्पादों की विविधता को अनुशासित और गुणवत्ता-केंद्रित प्रक्रियाओं से जोड़ा जाता है।
टोयोटा का उत्पादन दर्शन बताता है कि वह भारत में अपना विस्तार किस तरह करना चाहती है। जिडोका और जस्ट इन टाइम पर आधारित टोयोटा प्रोडक्शन सिस्टम, उत्पादन के स्रोत पर गुणवत्ता, न्यूनतम बर्बादी और निरंतर सुधार पर जोर देता है।
अपने विनिर्माण सिद्धांतों के विवरण में टोयोटा इस प्रणाली के केंद्र में मौजूद मानव-केंद्रित भावना की बात करती है। कंपनी का कहना है कि गुणवत्ता और दक्षता अनुशासित प्रक्रियाओं तथा उत्पादन लाइन पर काम करने वाले लोगों की लगातार समस्या-समाधान की कोशिशों से आती हैं।
ग्राहकों को लगातार बेहतर कारें देने के लिए मानवीय बुद्धिमत्ता और कौशल अनिवार्य हैं,” टोयोटा प्रोडक्शन सिस्टम की आधिकारिक रूपरेखा में टोयोटा कहती है। “हम रोजमर्रा के छोटे-छोटे सुधारों और केवल जरूरत की चीज, जरूरत के समय बनाने के जरिए काम को लगातार बेहतर करने की अपनी अटूट प्रतिबद्धता बनाए रखेंगे।
भारत में ये विचार अहम हैं, जहां तेजी से नए मॉडल पेश करने और आपूर्तिकर्ताओं को विकसित करने का काम साथ-साथ करना होगा। जिडोका यानी मानवीय निगरानी के साथ स्वचालन, हर चरण में गुणवत्ता सुनिश्चित करता है। वहीं, जस्ट इन टाइम पुर्जों की आपूर्ति का तालमेल बैठाता है, ताकि भंडार सीमित रहे और उत्पादन लचीला बना रहे। हाइब्रिड और इलेक्ट्रिक संस्करण जोड़ते समय यह अनुशासन काम आता है, क्योंकि बैटरी, पावर इलेक्ट्रॉनिक्स और सॉफ्टवेयर के लिए स्थानीय आपूर्तिकर्ताओं के साथ करीबी तालमेल जरूरी है।
सुज़ुकी और मारुति निर्यात तथा बाजार हिस्सेदारी बढ़ाने की तैयारी में
सुज़ुकी की भारतीय इकाई मारुति सुज़ुकी की देश में पहले से सबसे बड़ी बाजार हिस्सेदारी है और अब उसकी उत्पादन क्षमता में बड़ी बढ़ोतरी होने वाली है। सुज़ुकी की योजना 2030 तक क्षमता बढ़ाकर सालाना 40 लाख वाहनों तक पहुंचाने के लिए करीब 70,000 करोड़ रुपये निवेश करने की है। योजना के तहत लगभग 30 लाख इकाइयां घरेलू बाजार के लिए और करीब 10 लाख निर्यात के लिए होंगी। यह स्पष्ट संकेत है कि भारत सुज़ुकी का वैश्विक उत्पादन केंद्र बनेगा। कंपनी महामारी से पहले हासिल की गई 50 प्रतिशत बाजार हिस्सेदारी फिर से पाना चाहती है। प्रतिस्पर्धा तेज हुई है और टाटा मोटर्स तथा महिंद्रा, खासकर एसयूवी श्रेणी में, आगे बढ़ रही हैं। ऐसे में मारुति की हिस्सेदारी करीब 40 प्रतिशत पर है।
वृद्धि को रफ्तार देने के लिए सुज़ुकी अब तक की अपनी सबसे आक्रामक उत्पाद लहर की तैयारी कर रही है। कंपनी एसयूवी पर खास जोर देते हुए आठ नए मॉडल जोड़ेगी और इनमें पूरी तरह इलेक्ट्रिक विकल्प भी होंगे। इनमें एक प्रमुख मॉडल ई-विटारा हो सकता है, जिसे दिसंबर 2025 के आसपास पेश किए जाने की उम्मीद है। मारुति की मौजूदा श्रृंखला शुरुआती श्रेणी की हैचबैक से लेकर मजबूत हाइब्रिड तक फैली है। अगला चरण किफायती कीमतों को बेहतर सुविधाओं और विद्युतीकृत विकल्पों के साथ जोड़ेगा। इसे जगह, दक्षता और कम परिचालन लागत के लिए भारतीय ग्राहकों की पसंद के अनुरूप बनाया जाएगा।
सुज़ुकी की योजनाओं में पर्यावरण के अनुकूल पहल भी शामिल है। कंपनी अमूल, बनास डेयरी और राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड जैसे भागीदारों के साथ 2027 तक गुजरात में संपीड़ित बायोगैस के नौ संयंत्र स्थापित करेगी। सुज़ुकी का अनुमान है कि वित्त वर्ष 2031 तक सीएनजी और संपीड़ित बायोगैस वाहन उसके पावरट्रेन मिश्रण का करीब 35 प्रतिशत होंगे। हाइब्रिड और आंतरिक दहन इंजन वाले वाहनों की हिस्सेदारी लगभग 25-25 प्रतिशत होगी और बाकी बैटरी इलेक्ट्रिक वाहनों की होगी। कई तकनीकों पर आधारित यह रणनीति भारत के बढ़ते ईंधन और चार्जिंग बुनियादी ढांचे के अनुरूप रहते हुए उत्सर्जन घटाने का लक्ष्य रखती है।
होंडा की नई शुरुआत भारत को उत्पादन और निर्यात केंद्र बना रही है
भारत में होंडा का कार कारोबार कई वर्षों तक सीमित मॉडल श्रृंखला के बाद नई शुरुआत की तैयारी कर रहा है। कंपनी 2030 तक दस मॉडल पेश करने की योजना बना रही है, जिनमें सात एसयूवी होंगे। यह भारत में एसयूवी की ओर मजबूत रुझान को देखते हुए किया जा रहा है। लक्ष्य देश में अपनी बाजार हिस्सेदारी फिर से बढ़ाना और भारत को अन्य एशियाई बाजारों तक पहुंचने के केंद्र के रूप में इस्तेमाल करना है। होंडा अपने आगामी इलेक्ट्रिक वाहनों में से एक के लिए भारत को उत्पादन और निर्यात केंद्र बना रही है। इससे विनिर्माण क्षमता को कुशल और कनेक्टेड वाहनों की क्षेत्रीय मांग के अनुरूप रखा जा सकेगा।
इस योजना का केंद्र होंडा 0 सीरीज है। पहला मॉडल 0 अल्फा एसयूवी 2026 में पेश किया जाना है। इसका निर्माण भारत में होगा और 2027 से इसे जापान तथा एशियाई बाजारों में निर्यात किया जाएगा। होंडा नए ईवी के साथ हाइब्रिड मॉडलों की श्रृंखला बढ़ाने की योजना बना रही है, ताकि चार्जिंग नेटवर्क विकसित होने के दौरान ग्राहकों को एक विकल्प मिले। ईवी के लिए बैटरी की आपूर्ति एशिया में केंद्रित होगी। इसमें इंडोनेशिया में सीएटीएल जैसे आपूर्तिकर्ताओं से सेल शामिल होंगे। इस व्यवस्था का उद्देश्य लागत पर नियंत्रण और आपूर्ति श्रृंखलाओं को मजबूत बनाए रखना है।
होंडा भारत को सॉफ्टवेयर और डिजिटल क्षमता का केंद्र भी मान रही है। कंपनी कनेक्टेड सेवाओं, वाहन की बुद्धिमत्ता और अगली पीढ़ी के मानव-मशीन इंटरफेस पर केंद्रित टीमें बना रही है। सॉफ्टवेयर-आधारित तरीका होंडा को सुविधाएं तेजी से अपडेट करने और भारत के अनुरूप वाहन तैयार करने में मदद करेगा, साथ ही निर्यात वाले संस्करण वैश्विक मानकों के अनुरूप रहेंगे। यह योजना भारत के सबसे तेजी से बढ़ते क्षेत्रों में व्यापक भागीदारी की वापसी का संकेत देती है। साथ ही, भारत की इंजीनियरिंग और विनिर्माण क्षमता का इस्तेमाल देश से बाहर के बाजारों की जरूरतें पूरी करने के लिए किया जाएगा।
चीन का असर और क्षेत्रीय रणनीति में बदलाव
चीन दुनिया का सबसे बड़ा कार बाजार बना हुआ है, लेकिन प्रतिस्पर्धा का समीकरण बदल गया है। चीनी ईवी बाजार में तीखी मूल्य प्रतिस्पर्धा ने मुनाफे का अंतर घटा दिया है। चीनी ब्रांड दक्षिण-पूर्व एशिया और अन्य क्षेत्रों में विस्तार कर रहे हैं और अक्सर कीमतें इतनी कम रख रहे हैं कि जापानी वाहन निर्माताओं के लिए प्रतिस्पर्धा मुश्किल हो रही है। इसके चलते थाईलैंड और इंडोनेशिया जैसे बाजारों में जापानी ब्रांडों की हिस्सेदारी पर दबाव पड़ा है। भारत इसका संतुलन पेश करता है। यहां की नीतियों के कारण नए चीनी कार निर्माताओं के लिए प्रवेश मुश्किल हुआ है, जिससे स्थापित ब्रांडों को स्थानीयकरण, विस्तार और केवल भारी छूट के बजाय सुविधाओं तथा भरोसेमंद प्रदर्शन के आधार पर प्रतिस्पर्धा करने का समय मिला है।
दूसरे क्षेत्रों में शुल्क और नीतिगत बदलाव भी दिखाते हैं कि दुनिया भर में उत्पादन केंद्रों को किस तरह नए सिरे से व्यवस्थित किया जा रहा है। शुल्क बढ़ने के बाद होंडा ने अमेरिकी बाजार के लिए हाइब्रिड सिविक मॉडल अमेरिका में बनाने का फैसला किया। यह एक अलग उदाहरण है कि कंपनियां किस तरह नीतियों के अनुरूप उत्पादन तय करती हैं। ऐसे फैसलों से व्यापारिक झटकों का जोखिम घटता है और लॉजिस्टिक्स सुगम होता है। भारत के मामले में निर्यात का गणित बेहतर हो रहा है। पिछले साल यात्री वाहनों का निर्यात करीब 15 प्रतिशत बढ़ा, जबकि घरेलू वृद्धि लगभग 2 प्रतिशत रही। भारत में बने मॉडल दक्षिण एशिया, अफ्रीका और मध्य पूर्व के बाजारों में तेजी से भेजे जा रहे हैं।
नीतिगत समर्थन और अमल की चुनौतियां
भारत की विनिर्माण पहल प्रोत्साहनों, स्थानीयकरण के नियमों और बैटरी, पावर इलेक्ट्रॉनिक्स तथा अन्य उच्च-मूल्य वाले पुर्जों की घरेलू क्षमता में निवेश के स्पष्ट संकेतों पर निर्भर रही है। आयात नियमों ने कंपनियों को स्थानीय असेंबली के लिए प्रेरित किया है, जबकि उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन उन्नत तकनीकों का विस्तार करने को बढ़ावा देते हैं। चीनी पूंजी पर पाबंदियों ने भी प्रतिस्पर्धी परिदृश्य को आकार दिया है। जापानी ब्रांडों के लिए नीतिगत समर्थन, बड़े बाजार और परिपक्व हो रहे आपूर्तिकर्ता तंत्र के मेल ने कई वर्षों के निवेश की योजना बनाना आसान किया है।
अब अधिकतर काम योजनाओं को अमल में लाने का है। वाहन निर्माताओं को हाइब्रिड और ईवी पुर्जों के लिए भरोसेमंद आपूर्तिकर्ता नेटवर्क चाहिए, जिनमें मोटर, बैटरी पैक और सॉफ्टवेयर शामिल हैं। टोयोटा और सुज़ुकी अहम पुर्जों का स्थानीयकरण करने और लागत घटाने के लिए भारतीय तथा जापानी आपूर्तिकर्ताओं के साथ काम कर रही हैं। बड़े पैमाने पर लगातार एक जैसी गुणवत्ता बनाए रखने के लिए प्रशिक्षण, ऑडिट और कड़े उत्पादन अनुशासन की जरूरत होगी। बर्बादी घटाने और हर प्रक्रिया चरण में गुणवत्ता सुनिश्चित करने पर केंद्रित टोयोटा प्रोडक्शन सिस्टम इस काम के लिए उपयुक्त है।
बाजार की चुनौतियां अब भी बड़ी हैं। कीमत को लेकर संवेदनशीलता अधिक है, चार्जिंग बुनियादी ढांचा हर जगह समान नहीं है और ग्राहकों की पसंद तेजी से बदल सकती है, जैसा एसयूवी की ओर रुझान में दिखा है। वैश्विक कार कंपनियां पहले भी भारत में पिछड़ी हैं। फोर्ड और जनरल मोटर्स पर्याप्त पैमाना हासिल करने में संघर्ष के बाद यात्री वाहन कारोबार से बाहर हो गईं। हालांकि, फोर्ड 2029 से निर्यात पर ध्यान देते हुए अपने चेन्नई संयंत्र में इंजन उत्पादन फिर शुरू कर रही है। नीतियां अनुकूल होने पर भी सफलता सही उत्पादों, लागत पर समझदारी से नियंत्रण और समय पर डिलीवरी पर निर्भर करती है।
रोजगार, आपूर्तिकर्ता और तकनीक का हस्तांतरण
जापानी कंपनियों के इस बदलाव से धातु, प्लास्टिक, इलेक्ट्रॉनिक्स और सॉफ्टवेयर क्षेत्रों में भारतीय आपूर्तिकर्ताओं के लिए काम के नए अवसर पैदा होंगे। स्थानीय स्तर पर हाइब्रिड और ईवी बनाने से बैटरी पैक असेंबली, पावर इलेक्ट्रॉनिक्स और ताप प्रबंधन प्रणालियों में निवेश तेज होना चाहिए। जापान और भारत के उद्योग जगत में पुराने प्रकार के सेमीकंडक्टर, एलसीडी और बैटरी आपूर्ति पर सहयोग बढ़ने की चर्चा है। इससे वाहन विनिर्माण पर निर्भर पुर्जों का तंत्र और मजबूत होगा। अधिक पुर्जा निर्माता संयंत्र स्थापित करेंगे तो लॉजिस्टिक्स से लेकर परीक्षण और प्रमाणन तक सहायक सेवाओं का भी विस्तार होगा।
इन निवेशों से कौशल का हस्तांतरण भी होगा। टोयोटा की जिडोका और जस्ट इन टाइम पद्धतियां अग्रिम पंक्ति के कर्मचारियों द्वारा समस्या-समाधान और व्यवस्थित प्रशिक्षण पर निर्भर करती हैं। उत्पादन लाइनें बढ़ने के साथ इंजीनियरों और तकनीशियनों को ऐसा अनुभव मिलेगा जो आपूर्तिकर्ताओं की विभिन्न परतों तक पहुंचेगा। भारत में सॉफ्टवेयर क्षमता बनाने की होंडा की योजना, कोड के जरिए अपडेट होने वाले वाहनों की ओर उद्योग के बदलाव के अनुरूप है। ये कामकाज भारत में जितने गहरे जुड़ेंगे, उतनी ही संभावना होगी कि विनिर्माण के साथ-साथ नया डिजाइन, परीक्षण और सत्यापन भी यहीं हो।
प्रतिस्पर्धा कड़ी बनी रहेगी। टाटा मोटर्स और महिंद्रा ईवी समेत एसयूवी की अपनी श्रृंखला बढ़ा रही हैं, जबकि हुंडई और किया के उत्पाद पोर्टफोलियो मजबूत हैं। सुज़ुकी की हालिया बाजार हिस्सेदारी में गिरावट दिखाती है कि बाजार कितनी तेजी से बदल रहा है। जापानी ब्रांडों को सुरक्षा और भरोसेमंद प्रदर्शन के साथ बेहतर कीमतें तथा मॉडल में तेज बदलाव का संतुलन बनाना होगा। भारत में सफलता निर्यात पर भी निर्भर करेगी। भारत में बने मॉडल एशिया और अफ्रीका के उन बाजारों की मांग पूरी कर सकते हैं जो पहले चीन या थाईलैंड के कारखानों पर निर्भर थे।
मुख्य बातें
- चीन पर निर्भरता घटाने और बड़ा उत्पादन तथा निर्यात केंद्र बनाने के लिए टोयोटा, होंडा और सुज़ुकी भारत में निवेश तेज कर रही हैं।
- टोयोटा और सुज़ुकी की संयुक्त निवेश प्रतिबद्धताएं करीब 11 अरब डॉलर हैं। टोयोटा का लक्ष्य 2030 तक 15 नए मॉडल पेश करना और सालाना 10 लाख से अधिक इकाइयों की क्षमता हासिल करना है।
- होंडा भारत में अपनी आगामी 0 सीरीज की इलेक्ट्रिक एसयूवी बनाने और निर्यात करने की योजना बना रही है। 2030 तक दस मॉडल पेश करने की उसकी व्यापक योजना में एसयूवी और हाइब्रिड पर खास जोर है।
- सुज़ुकी 2030 तक क्षमता बढ़ाकर 40 लाख वाहन करने, 50 प्रतिशत बाजार हिस्सेदारी फिर हासिल करने और सालाना करीब 10 लाख इकाइयों का निर्यात करने का लक्ष्य रखती है।
- भारत ने पिछले साल करीब 50 लाख यात्री वाहन बनाए और लगभग 8 लाख का निर्यात किया। निर्यात में करीब 15 प्रतिशत की वृद्धि हुई।
- भारत के परिवहन क्षेत्र में जापानी प्रत्यक्ष निवेश 2021 से सात गुने से अधिक बढ़ा है, जबकि चीन के परिवहन क्षेत्र में निवेश तेजी से घटा है।
- भारत की नीतियां नए चीनी वाहन निर्माताओं के प्रवेश पर रोक लगाती हैं और स्थानीय विनिर्माण को प्रोत्साहित करती हैं, जिससे जापानी ब्रांडों को स्थानीयकरण और विस्तार का समय मिलता है।
- जिडोका और जस्ट इन टाइम पर आधारित टोयोटा का उत्पादन दर्शन स्थानीय आपूर्ति श्रृंखलाओं में गुणवत्ता और लागत नियंत्रण के साथ तेजी से विस्तार करने में मदद करता है।
- जोखिमों में टाटा, महिंद्रा, हुंडई और किया से कड़ी प्रतिस्पर्धा, कीमतों को लेकर ग्राहकों की संवेदनशीलता और ईवी आपूर्ति श्रृंखलाओं तथा चार्जिंग बुनियादी ढांचे के विकास की चुनौती शामिल है।






