तारीफों के पीछे, दबाव में कामगार
कोरियाई स्कूलों के दोपहर के भोजन के वीडियो सोशल मीडिया फ़ीड पर छाए रहते हैं। कुरकुरे झींगों और टार्टर सॉस, अंडे वाले फ्राइड राइस, बीफ़ नूडल सूप, ताज़े फलों के सलाद, किमची और यहां तक कि आइसक्रीम से भरी ट्रे देखकर लोग तारीफों के पुल बांधते हैं और वीडियो को लाखों बार देखा जाता है। इन तस्वीरों की अपील की वजह सीधी है। खाना ऐसा दिखता है जैसे कोई अभिभावक घर पर बनाए, और कोरिया के सरकारी स्कूलों में ये गर्मागर्म भोजन मुफ्त दिए जाते हैं। विदेशों में कई लोगों को ये वीडियो उनके बचपन के कैंटीन भोजन से बिल्कुल अलग लगते हैं। कोरिया के परिवारों के लिए यह कार्यक्रम हर विद्यार्थी से किया गया वादा निभाने जैसा है, चाहे उसकी आय कुछ भी हो।
विषय-सूची
- तारीफों के पीछे, दबाव में कामगार
- कोरिया के एक स्कूल की रसोई के भीतर
- कई चरणों वाला एक दिन
- रसोई से जुड़ी बीमारियां और चोटें
- आंकड़ों में
- स्कूल की रसोइयों में सुरक्षा पीछे क्यों है
- सबके सामने, फिर भी छिपी लैंगिक श्रम व्यवस्था
- कोरिया ने सबके लिए मुफ्त, पर्यावरण-अनुकूल स्कूल भोजन कैसे बनाया
- क्या रोबोट बोझ कम कर सकते हैं
- कर्मचारियों की मौजूदा मांगें
- अभिभावक और विद्यार्थी क्या कर सकते हैं
- जानने योग्य बातें
कैमरा अक्सर यह नहीं दिखाता कि ये भोजन कौन बनाता है और इसकी कीमत उन्हें क्या चुकानी पड़ती है। चमचमाती ट्रे के पीछे रसोई के हजारों कर्मचारी हैं, जिनमें अधिकतर 40 और 50 की उम्र की महिलाएं हैं। वे कसे हुए समय-सारिणी में काम करती हैं और भारी शारीरिक मेहनत उठाती हैं, जबकि उन्हें कानूनी न्यूनतम वेतन से थोड़ा ही अधिक मिलता है। वे टोकरों भर सब्जियां काटती हैं, सूप के बड़े बर्तन उठाती हैं, विशाल फ्रायर और तवे संभालती हैं और यह सुनिश्चित करने के लिए समय से होड़ करती हैं कि दोपहर का भोजन ठीक समय पर शुरू हो। कई कर्मचारी ऐसे दर्द की बात करती हैं जो कम नहीं होता, ऐसी खांसी की जो जाती नहीं, और इस डर की कि रसोई की हवा ही उन्हें बीमार कर रही है।
भोजन कार्यक्रम को लेकर जनता में गहरा गर्व है। कई जिलों में खाना मुफ्त, विविध और स्थानीय सामग्री से जुड़ा है। नतीजतन, दुनिया भर में कोरियाई स्कूल लंच को सर्वश्रेष्ठ में गिना जाता है। हालांकि, इस प्रतिष्ठा ने एक मानवीय कहानी को ढक दिया है। काम बेहद कठिन है, रसोई में अक्सर पर्याप्त कर्मचारी नहीं होते और सुरक्षा इंतजाम नौकरी की मांग के अनुरूप नहीं रहे हैं।
सामूहिक कार्रवाई करना मुश्किल है। सामाजिक अपेक्षा बहुत मजबूत है कि स्कूलों में भोजन कभी बंद न हो। जब रसोई कर्मचारियों ने काम छोड़ा, तो कुछ अभिभावकों और मीडिया की आवाज़ों ने उन पर बच्चों को भूखा रखने का आरोप लगाया, जबकि विरोध के कारणों पर बहुत कम ध्यान दिया गया। जिस दिन दोपहर के भोजन की ट्रे में खाना कम हो या सूप पतला हो, वही अक्सर मुख्य खबर बन जाता है, न कि वर्षों का दबाव और जोखिम, जिसके चलते कर्मचारियों ने विरोध किया।
कोरिया के एक स्कूल की रसोई के भीतर
इस काम को अक्सर खाना पकाने के भेष में फैक्टरी का काम बताया जाता है। डेइजॉन के एक मिडिल स्कूल में 890 विद्यार्थियों के लिए हर दिन खाना बनाने वाले रसोई कर्मचारियों की संख्या आठ थी। एक दिन, समुद्री शैवाल की चादरें कौन काटेगा, इस विवाद का अंत ऐसे सूप के साथ हुआ जिसमें समुद्री शैवाल ही नहीं था। रसोई से बाहर के किसी व्यक्ति को यह बेतुका लग सकता है। लेकिन रसोई के भीतर काम करने वालों के लिए यह हकीकत दिखाता है कि छोटी-छोटी चीजें भी मायने रखती हैं, जब कम लोगों की टीम को तय समय में सैकड़ों विद्यार्थियों के लिए खाना बनाना हो।
आम तौर पर दोपहर के भोजन में घर के खाने जैसा भोजन होता है, न कि थोक में गर्म किया हुआ खाना। चावल भाप में पकता है, सूप धीमी आंच पर उबलता है और दो से तीन साइड डिश पकाकर उनमें मसाले डालने होते हैं। एक साधारण साइड डिश के लिए भी सामग्री भिगोनी, कतरनी, ब्लांच करनी, तेल में भूननी और ठंडा करनी पड़ सकती है। कई स्कूल ताज़े फल भी देते हैं, जिन्हें धोना, काटना और हिस्सों में बांटना पड़ता है। खाना परोसने के बाद उसी टीम को औद्योगिक उपकरण साफ करने और अगले दिन की तैयारी भी करनी होती है।
कई चरणों वाला एक दिन
तेल में भुनी सब्जियों जैसी एक डिश पर गौर करें। कर्मचारी सुबह जल्दी पहुंचकर सामान लेते हैं, सब्जियां छांटते और जांचते हैं, चाकू धोते और धार तेज करते हैं, फिर टोकरियां तैयारी की जगह तक ले जाते हैं। वे सब्जियां साफ करके काटते हैं, उन्हें ब्लांच करके ठंडा करते हैं, गहरे बर्तनों में तेल गर्म करते हैं और सही समय पर मसाले मिलाते हैं। भारी स्टेनलेस स्टील के बर्तनों को सावधानी से उठाकर झुकाना पड़ता है, ताकि जलने से बचा जा सके। इसी बीच सूप पर ध्यान देना होता है, चावल समय पर पकना चाहिए और फल हिस्सों में बांटने होते हैं। दिन की शुरुआत में हुई कोई भी गड़बड़ी बाद में जल्दबाजी में काम और गलतियों या चोटों के बढ़े हुए जोखिम का कारण बन सकती है।
कर्मचारियों की कमी दबाव को और बढ़ाती है। कुछ जिलों में भर्ती अभियानों में रिक्त पदों की संख्या के मुकाबले बहुत कम आवेदन आए हैं और कर्मचारी तेजी से नौकरी छोड़ते हैं। कर्मचारियों का कहना है कि नौकरी की मांगों और मिलने वाले वेतन या सुरक्षा के बीच बड़ा अंतर है। विनिर्माण और लॉजिस्टिक्स क्षेत्र में बेहतर वेतन और सुरक्षित काम की स्थितियां संभावित कर्मचारियों को खींच लेती हैं। नतीजतन, सरकारी सेवाओं की रसोइयों में जाना-पहचाना चक्र चलता रहता है: टीम छोटी होती जाती है, लेकिन काम कम नहीं होता।
रसोई से जुड़ी बीमारियां और चोटें
स्कूल की रसोई में काम करने वाले कई कर्मचारी पीठ, कंधों और हाथों में पुराने दर्द की शिकायत करते हैं। बार-बार छीलने और काटने से समय के साथ जोड़ों का आकार बिगड़ सकता है। गीले फर्श पर फिसलना, गर्म तेल, भाप और सूप से जलना, और चाकू से कटना लगातार बने रहने वाले जोखिम हैं। सर्वेक्षणों और मुआवज़े के मामलों से पता चलता है कि चोटों की दर राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक है। सीमित जगह में गर्मी, तेजी और भारी सामान उठाने के मेल को देखते हुए यह हैरानी की बात नहीं है।
सबसे गंभीर खतरे हवा के जरिए शरीर में पहुंचते हैं। खाना पकाने के तेल के धुएं में बेहद छोटे कण और गैसें होती हैं, जो श्वसन मार्ग में सूजन और निशान पैदा कर सकती हैं। तेज गर्मी, खराब वेंटिलेशन और बड़े पैमाने पर तलने से एक्रोलिन और फॉर्मलडिहाइड जैसे एल्डिहाइड, साथ ही पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन बन सकते हैं। कई देशों में रसोइयों पर हुए अध्ययनों में इन धुओं के लंबे समय तक संपर्क को पुरानी खांसी, अस्थमा जैसे लक्षणों, क्रॉनिक ऑब्स्ट्रक्टिव पल्मोनरी डिज़ीज़ और फेफड़ों के कैंसर की अधिक दर से जोड़ा गया है।
आंकड़ों में
कोरिया भर में स्कूल की रसोइयों के 42,077 कर्मचारियों की स्वास्थ्य जांच में पाया गया कि करीब एक तिहाई को फेफड़ों से जुड़ी समस्याएं थीं, जिनमें कैंसर भी शामिल है। करीब 170 कर्मचारियों के फेफड़ों के कैंसर को आधिकारिक तौर पर रसोई के धुएं के संपर्क से जुड़ा माना गया है। बीते तीन वर्षों में ही कम से कम 14 कर्मचारियों की फेफड़ों के कैंसर से मौत हुई है। यूनियन के समर्थकों और व्यावसायिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि असल संख्या इससे अधिक होने की आशंका है, क्योंकि औद्योगिक चोट के दावों के सख्त मानदंड उन कई मामलों को बाहर कर देते हैं जो सीमित दस्तावेजी नियमों या जोखिम के इतिहास से मेल नहीं खाते।
स्कूल की रसोई में काम करने वाली और श्रमिक अधिकारों की कार्यकर्ता पार्क मी ह्यांग ने साथी कर्मचारियों और सांसदों के सामने संसदीय मंच पर इस सौदे की कीमत साफ शब्दों में बताई।
दक्षिण कोरियाई आज जिस विश्वस्तरीय मुफ्त स्कूल भोजन का आनंद ले रहे हैं, उसकी कीमत रसोई कर्मचारियों के टेढ़े-मेढ़े हाथों, जली हुई त्वचा के निशानों और उनके फेफड़ों में बढ़ती कैंसर कोशिकाओं ने चुकाई है।
कई कर्मचारी अब भी खुलकर बोलने से हिचकिचाते हैं। उनमें से बड़ी संख्या ऐसे अनुबंधों पर काम करती है जिनमें नौकरी की सुरक्षा सीमित है। कुछ को डर है कि शिकायत करने पर ऐसे कार्यस्थल में उन्हें मुश्किल खड़ी करने वाला समझा जाएगा, जहां दिन का तालमेल दोपहर के भोजन की घंटी से तय होता है। जब रसोई में कर्मचारी कम हों और खाना समय पर तैयार करना हो, तो विरोध करके प्रतिक्रिया का जोखिम उठाने के बजाय दर्द सहते रहना आसान लग सकता है।
स्कूल की रसोइयों में सुरक्षा पीछे क्यों है
खाना पकाने के धुएं से बचाव की पहली ढाल वेंटिलेशन है, फिर भी ज्यादातर स्कूल की रसोइयों में यह नहीं है या पर्याप्त नहीं है। कर्मचारियों के अनुमान और स्थानीय जांच के मुताबिक, 97 प्रतिशत से अधिक रसोइयों में सुरक्षित वेंटिलेशन नहीं है। पुराने स्कूल भवनों को तेज़ी से तलने या बड़े पैमाने पर खाना पकाने के दौरान धुआं खींचने वाली प्रभावी व्यवस्था के लिए बनाया ही नहीं गया था। उसमें सुधार पर पैसा और समय लगता है और भोजन सेवा बाधित होती है। जहां बजट तंग है, वहां वेंटिलेशन परियोजनाएं स्कूल की ज्यादा नजर आने वाली जरूरतों से पीछे रह जाती हैं।
रसोई कर्मचारियों को ढांचागत नुकसान भी झेलना पड़ता है। सार्वजनिक क्षेत्र में उनमें से कई को नियमित कर्मचारी नहीं माना जाता, जिसका असर वेतनमान, लाभ और सौदेबाजी की ताकत पर पड़ता है। यूनियन मौजूद होने पर भी स्कूल के भोजन में रुकावट डालने वाली किसी कार्रवाई के खिलाफ जनमत तेजी से हो सकता है। सुवन के एक प्राथमिक स्कूल में हड़ताल के दौरान विद्यार्थियों को सादा चावल और सूखा समुद्री शैवाल दिया गया। कुछ अभिभावकों ने कमी पूरी करने के लिए सैंडविच खरीदे। लंबी हड़ताल में परिवारों को बच्चों के लिए घर से खाना पैक करना या उन्हें स्कूल न भेजना पड़ता है, और यह जल्दी ही विवाद का मुद्दा बन जाता है। इन दबावों के चलते सुरक्षा पर बातचीत तब तक किनारे हो जाती है, जब तक कोई दूसरी बीमारी या चोट थोड़े समय के लिए ध्यान न खींचे।
खरीद के नियम और समय-सारिणी के तरीके भी दबाव बढ़ा सकते हैं। सामान देर से पहुंचे या गलत रूप में आए, जैसे उन व्यंजनों के लिए बिना कटी सब्जियां जिनके टुकड़े एक तय आकार के होने चाहिए, तो छोटे काम भी देरी का कारण बन जाते हैं। पोषण मानकों और विविधता व ताज़गी वाले मेन्यू के लिए कच्ची सामग्री से खाना पकाना पड़ता है, जिसमें अधिक श्रम और बेहतर उपकरण चाहिए। ये लक्ष्य अच्छे हैं, लेकिन व्यवस्था जिस श्रम पर निर्भर है, उसे इतने बड़े पैमाने पर कच्ची सामग्री से खाना बनाने के लिए जरूरी सुरक्षा इंतजाम ऐतिहासिक रूप से नहीं मिले।
सबके सामने, फिर भी छिपी लैंगिक श्रम व्यवस्था
स्कूल की रसोइयों में मुख्य रूप से महिलाएं काम करती हैं। उनमें कई अधेड़ उम्र की हैं और बच्चों को पालने के बाद फिर से काम पर लौटी हैं या घर के पास नियमित घंटों वाली नौकरी तलाश रही हैं। इस काम को अक्सर कुशल और जोखिमभरे श्रम के बजाय बिना वेतन वाले देखभाल के काम का विस्तार माना जाता है। रोजमर्रा की बातचीत और लोकप्रिय मीडिया में अजुम्मा शब्द इस नौकरी पर छाया रहता है। यह अधेड़ उम्र की महिलाओं के लिए इस्तेमाल होने वाला शब्द है, जिसे अपमानजनक ढंग से भी कहा जा सकता है। इस सामाजिक नजरिए ने वेतन कम रखा और सुरक्षा में निवेश को टाला, जबकि रसोइयों के मेन्यू अधिक जटिल और उनसे उम्मीदें बढ़ती गईं।
दुनिया भर की स्कूल खाद्य प्रणालियों का अध्ययन करने वाले शोधकर्ताओं ने एक आम प्रवृत्ति देखी है। बच्चों को खाना खिलाने सहित देखभाल के काम को महिलाओं का काम मानकर उसका वेतन और सामाजिक दर्जा कम आंका जाता है। जब कार्यक्रम कच्ची सामग्री से खाना बनाने और घर के भोजन जैसा खाना परोसने पर निर्भर हों, तो उनकी छिपी हुई कीमत उन महिलाओं का श्रम होता है जिनके ज्ञान और मेहनत से यह संभव होता है। एक अलग नजरिया नीति निर्माण में कर्मचारियों की आवाज़ को अहमियत देता है, जरूरी कौशल के अनुरूप वेतन देता है, सुरक्षित उपकरणों में निवेश करता है और मेन्यू व खरीद के नियम तय करते समय समुदायों को भी भागीदारी देता है।
यहां श्रम की एक व्यापक कहानी भी है। कोरिया में प्लेटफॉर्म कर्मचारियों और दूसरे अस्थिर रोजगार वाले लोगों पर हुए अध्ययनों में आम आबादी के मुकाबले मांसपेशियों और जोड़ों के दर्द, थकान और अवसाद की अधिक दर सामने आई है। इसका मतलब यह नहीं कि ये सभी नौकरियां एक जैसी हैं। बात यह है कि सार्वजनिक सेवाओं और कम वेतन वाले काम को अक्सर सामाजिक बीमा और व्यावसायिक स्वास्थ्य की नजर से ओझल रखा जाता है। स्कूल की रसोइयां इसका स्पष्ट उदाहरण हैं कि यह उपेक्षा रोज बच्चों को खाना खिलाने वाले लोगों को कैसे नुकसान पहुंचाती है।
कोरिया ने सबके लिए मुफ्त, पर्यावरण-अनुकूल स्कूल भोजन कैसे बनाया
कोरिया का आज का स्कूल भोजन कार्यक्रम अचानक नहीं बना। 2000 के दशक में खाद्य सुरक्षा से जुड़े घोटालों के बाद अभिभावकों, शिक्षकों और स्थानीय नेताओं ने बदलाव की मांग की। उनका तर्क था कि विद्यार्थियों को सेहतमंद भोजन मिलना चाहिए और सरकारी धन से स्थानीय किसानों को समर्थन मिलना चाहिए। कई क्षेत्रों में इसका नतीजा ऐसी व्यवस्था के रूप में निकला जो सभी के लिए मुफ्त और पर्यावरण-अनुकूल है तथा ताज़ी, स्थानीय रूप से उगाई गई सामग्री और संतुलित मेन्यू को तरजीह देती है। यही वजह भी है कि खाना घर के भोजन जैसा दिखता है। मौसमी उपज से ताज़ा खाना बनाना इस व्यवस्था की बुनियादी योजना का हिस्सा है, कोई अनचाहा नतीजा नहीं।
इस कार्यक्रम ने कई लक्ष्य पूरे किए हैं। यह स्कूल के भोजन को सिर्फ एक सेवा नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य का हिस्सा मानता है। यह क्षेत्रीय किसानों को सहारा देता है और आपूर्ति की श्रृंखला छोटी करता है। यह विद्यार्थियों को सब्जियों, अनाज और स्वादों की अधिक विविधता से परिचित कराकर खाद्य साक्षरता भी बढ़ाता है। कई अभिभावक सभी बच्चों को मुफ्त भोजन देने की गरिमा को अहम मानते हैं, क्योंकि इससे भोजन की कतार में कम आय वाले विद्यार्थियों की अलग पहचान नहीं होती।
लेकिन रसोई के स्तर पर यह सब मुफ्त या आसान नहीं है। ताज़े, स्थानीय और विविध मेन्यू के लिए सामग्री तैयार करने और पकाने में अधिक श्रम लगता है। सामग्री ऐसी हालत में पहुंचती है कि उसे साफ करके काटना पड़ता है। तलने की गर्मी, बड़े बर्तनों और भोजन परोसने की रफ्तार के साथ सुरक्षा की जरूरत भी बढ़ती है। यदि वेंटिलेशन, कर्मचारियों और प्रशिक्षण के लिए मिलने वाली राशि मेन्यू की बढ़ती महत्वाकांक्षा के साथ नहीं बढ़ती, तो जोखिम कर्मचारियों पर आ पड़ता है। सोशल मीडिया पर दर्शक जिस गुणवत्ता की तारीफ करते हैं, वह वास्तविक है। इसे तैयार करने वाले लोगों पर पड़ने वाला दबाव भी उतना ही वास्तविक है।
क्या रोबोट बोझ कम कर सकते हैं
स्वचालन को राहत देने वाले एक संभावित उपाय के रूप में देखा जा रहा है। कुछ स्कूल अब तलने, तेल में भूनने या सूप धीमी आंच पर पकाने जैसे खास कामों के लिए कुकिंग रोबोट आजमा रहे हैं। सियोल के एक मिडिल स्कूल में इन कामों के लिए चार रोबोट इस्तेमाल होते हैं। इंचन कई स्कूलों में कुकिंग रोबोट लगाने के लिए करोड़ों वॉन खर्च करने की योजना बना रहा है। व्यापार मेलों में कंपनियां ऐसे स्वचालित उपकरण दिखाती हैं जिनमें कैमरे से तापमान पर नजर रखकर अपने आप आंच बदली जाती है, रोबोटिक भुजाएं फ्रायर संभालकर अतिरिक्त तेल झाड़ती हैं और मशीनें नूडल्स को शुरू से आखिर तक पकाती हैं।
ये उपकरण जलने का जोखिम कम कर सकते हैं और भारी चीजें उठाने की जरूरत घटा सकते हैं। अगर कोई रोबोटिक स्टिरर गहरे बर्तन को लगातार चलाता रहे, तो कर्मचारियों को लंबे समय तक गर्म तेल के ऊपर खड़े नहीं रहना पड़ेगा। अगर रोबोटिक भुजा फ्रायर में सामान डालने और निकालने का काम करे, तो रसोइया गर्म छींटों और कंधे की चोट का कारण बनने वाली असुविधाजनक पहुंच से बच सकते हैं। सैद्धांतिक रूप से, इससे कर्मचारियों का समय गर्मी में एक ही हरकत बार-बार करने के बजाय निगरानी और मसाले डालने में लग सकता है।
रसोई कर्मचारी वाजिब वजहों से सतर्क हैं। मौजूदा रोबोट को कई चरणों में इंसानी मदद की जरूरत होती है। उनसे सुरक्षा से जुड़े नए सवाल भी पैदा हो सकते हैं, जैसे भीड़भरी रसोई में दबने की जगहें और अचानक होने वाली हरकतें। सबसे अहम बात यह है कि मशीनें वेतन, कर्मचारियों की संख्या और वेंटिलेशन की बुनियादी विसंगतियों को दूर नहीं करतीं। जब तनाव बढ़ता है, तो सूप के लिए समुद्री शैवाल काटने जैसे छोटे काम भी दिखा सकते हैं कि रसोई की समय-सारिणी कितनी नाजुक है। कर्मचारियों का कहना है कि असली राहत के लिए कर्मचारियों और काम के अनुपात में सुधार, आराम का समय देने वाली समय-सारिणी और स्रोत पर ही धुआं खींचने वाले उपकरण जरूरी हैं।
कर्मचारियों की मौजूदा मांगें
रसोई कर्मचारियों और उनके समर्थकों ने नुकसान कम करने के लिए व्यावहारिक कदम सुझाए हैं। पहला, स्कूल की रसोइयों के लिए वेंटिलेशन मानक तय कर उनके लिए धन मुहैया कराया जाए। इसमें फ्रायर और तवे के लिए स्थानीय निकास प्रणाली, धुएं को बाहर ले जाने के लिए ताज़ी हवा की व्यवस्था और हुड को चालू रखने के लिए नियमित रखरखाव शामिल हो। दूसरा, श्वसन और मांसपेशियों-जोड़ों की समस्याओं के लिए नियमित स्वास्थ्य जांच का खर्च दिया जाए और काम से जुड़ी बीमारी पर मुआवज़ा पाने का स्पष्ट रास्ता हो। तीसरा, कर्मचारियों और काम का ऐसा अनुपात तय किया जाए जो कच्ची सामग्री से खाना बनाने, भारी सामान उठाने और तेजी से सेवा देने की जरूरतों को ध्यान में रखे; साथ ही काम के कौशल और जोखिम के अनुरूप वेतन दिया जाए।
कर्मचारी स्थायी रोजगार का दर्जा, बेहतर प्रशिक्षण और सार्वजनिक क्षेत्र की अन्य जोखिमभरी नौकरियों के अनुरूप सुरक्षा भी चाहते हैं। वे बताते हैं कि तय समय-सारिणी वाली सुरक्षित और बेहतर वेतन वाली फैक्टरी की नौकरियों में आवेदन करने वालों की कतार कितनी जल्दी लग जाती है। उनका कहना है कि अगर स्कूल कुशल रसोई कर्मचारियों को आकर्षित करना और बनाए रखना चाहते हैं, तो वेतन, सुरक्षा और सम्मान के मामले में इस नौकरी को प्रतिस्पर्धी बनाना होगा।
हाल की एक रैली में कर्मचारियों ने गुलाबी एप्रन पहने और उन सहकर्मियों के नाम वाली तख्तियां उठाईं जिनकी मौत हो चुकी थी। काम से जुड़े फेफड़ों के कैंसर का निदान झेल रहे एक प्रदर्शनकारी ने उन कई लोगों की ओर से बात की जो शरीर जवाब देने के बावजूद खाना पकाते रहे।
सालों तक मैंने हड्डियां तोड़ देने वाला काम का बोझ और जहरीला धुआं सहा, ताकि अपने बच्चों के लिए भी अच्छा खाना बना सकूं। इस बीच मेरा शरीर टूटता जा रहा था।
अभिभावक और विद्यार्थी क्या कर सकते हैं
अभिभावकों और विद्यार्थियों का प्रभाव उनकी सोच से अधिक हो सकता है। स्कूल बोर्ड और शिक्षा कार्यालय समुदाय के दबाव और प्राथमिकताओं पर ध्यान देते हैं। सुरक्षित वेंटिलेशन, पर्याप्त कर्मचारी और व्यावहारिक मेन्यू की मांग यह संकेत देती है कि परिवारों को सिर्फ इस बात की परवाह नहीं कि ट्रे में क्या है, बल्कि यह भी कि उसे कौन बनाता है। सुरक्षा सुधार के दौरान या कर्मचारियों की कमी में सरल मेन्यू स्वीकार करने से रसोई को राहत मिल सकती है, बिना इस बदलाव को नाकामी बताए।
अभिभावक-शिक्षक समूह रसोई कर्मचारियों को उनके काम के बारे में बोलने के लिए आमंत्रित कर सकते हैं, उपकरण सुधारने वाले बजट मदों के लिए समर्थन जुटा सकते हैं और चोटों तथा हवा की गुणवत्ता की पारदर्शी जानकारी देने की मांग कर सकते हैं। विद्यार्थी जान सकते हैं कि सेहत और स्वाद के लिए कच्ची सामग्री से खाना बनाना क्यों अहम है और इस गुणवत्ता के साथ कर्मचारियों की सुरक्षा क्यों जरूरी है। जो भोजन कार्यक्रम रसोई कर्मचारियों को जरूरी पेशेवरों का दर्जा देता है, वह ज्यादा सेहतमंद भोजन और ज्यादा स्वस्थ स्कूल समुदाय तैयार करेगा।
जानने योग्य बातें
- कोरियाई स्कूलों में भोजन मुफ्त और ताज़ी सामग्री से पकाया जाता है तथा इसकी खूब तारीफ होती है, लेकिन इसके पीछे का काम बेहद कठिन और अक्सर असुरक्षित है।
- स्कूल की रसोइयों में ज्यादातर कर्मचारी 40 और 50 की उम्र की महिलाएं हैं। उन्हें कम वेतन मिलता है, जबकि वे कसे हुए समय में भारी सामान और गर्म उपकरण संभालती हैं।
- चोटों का जोखिम अधिक है और खाना पकाने के धुएं के लंबे संपर्क को कर्मचारियों में सांस की पुरानी बीमारियों और फेफड़ों के कैंसर से जोड़ा गया है।
- 42,077 कर्मचारियों की स्वास्थ्य जांच में करीब एक तिहाई को फेफड़ों की समस्याएं मिलीं और फेफड़ों के कैंसर के करीब 170 मामलों को आधिकारिक तौर पर रसोई के धुएं से जुड़ा माना गया।
- अधिकतर स्कूलों में वेंटिलेशन अपर्याप्त है और 97 प्रतिशत से अधिक रसोइयों में धुआं निकालने की सुरक्षित व्यवस्था नहीं है।
- भोजन सेवा जारी रखने का सार्वजनिक दबाव हड़तालों को दुर्लभ और विवादास्पद बनाता है, जिससे सुरक्षा सुधार धीमे पड़ते हैं।
- कार्यक्रम के पर्यावरण-अनुकूल और स्थानीय खरीद के लक्ष्य अहम हैं, लेकिन उनसे श्रम की जरूरत बढ़ती है। इसके साथ सुरक्षित उपकरण और पर्याप्त कर्मचारी भी होने चाहिए।
- जलने और बार-बार किए जाने वाले काम घटाने के लिए कुकिंग रोबोट आजमाए जा रहे हैं, लेकिन वे उचित वेतन, सही वेंटिलेशन और व्यावहारिक काम के बोझ की जरूरत खत्म नहीं करते।
- कर्मचारी लागू किए जा सकने वाले वेंटिलेशन मानक, नियमित स्वास्थ्य जांच, कर्मचारियों और काम के बेहतर अनुपात तथा कौशल और जोखिम के अनुरूप वेतन की मांग करते हैं।
- अभिभावक और विद्यार्थी उपकरण सुधारने के लिए बजट का समर्थन कर सकते हैं, सुरक्षा परियोजनाओं के दौरान सरल मेन्यू स्वीकार कर सकते हैं और रसोई कर्मचारियों को जरूरी पेशेवर मानने वाली नीतियों का समर्थन कर सकते हैं।






