ताइवान के विशेष आर्थिक क्षेत्र में चीन ने अपतटीय ड्रिलिंग तेज की, कानूनी और सुरक्षा जोखिम बढ़े

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ताइवान के विशेष आर्थिक क्षेत्र में चीन ने अपतटीय ड्रिलिंग तेज की, कानूनी और सुरक्षा जोखिम बढ़े

प्रातास के पास क्या हो रहा है

चीन ने दक्षिण चीन सागर के उत्तरी हिस्से में ताइवान के विशेष आर्थिक क्षेत्र के भीतर, प्रातास के पास तेल और गैस प्रतिष्ठान तथा सहायक पोत तैनात किए हैं। प्रातास को डोंग्शा के नाम से भी जाना जाता है। जुलाई और अगस्त के दौरान उपग्रह तथा समुद्री निगरानी से इस क्षेत्र में काम कर रही चीन की राष्ट्रीय अपतटीय तेल निगम (CNOOC) से जुड़ी कम से कम एक दर्जन परिसंपत्तियों की पहचान हुई। इनमें से एक संरचना प्रातास के आसपास के प्रतिबंधित जलक्षेत्र से करीब 50 किलोमीटर तक पास आ गई। 2024 में अलग-अलग गतिविधियों के दौरान उपकरण सीमा से लगभग एक किलोमीटर तक करीब पहुंच गए थे। सार्वजनिक आंकड़ों और तस्वीरों से स्थानों और समय-सीमाओं को जोड़कर किए गए नए विश्लेषण के सामने आने तक इस गतिविधि की खबर बड़े पैमाने पर नहीं आई। इसके बाद अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों ने कई स्थानों की पुष्टि की।

विषय-सूची
  1. प्रातास के पास क्या हो रहा है
  2. धीरे-धीरे बढ़ता जमावड़ा अब सबकी नजर में
  3. ड्रिलिंग रिग कहां हैं और क्या कर रहे हैं
  4. कानूनी दांव-पेच और ताइवान के सीमित विकल्प
  5. विशेष आर्थिक क्षेत्र के अधिकार संक्षेप में
  6. चीन का रुख और CNOOC की भूमिका
  7. दोहरे इस्तेमाल का जोखिम और डोंग्शा के आसपास सैन्य स्थिति
  8. ऊर्जा सुरक्षा एक कमजोर कड़ी
  9. जापान से वियतनाम तक क्षेत्रीय समानताएं
  10. ताइपे और साझेदारों के सामने क्या विकल्प हैं
  11. मुख्य बातें

ये तैनातियां उन तरीकों के अनुरूप हैं जिन्हें क्षेत्रीय सुरक्षा विशेषज्ञ ‘ग्रे ज़ोन’ रणनीति कहते हैं: ऐसे कदम जो खुले संघर्ष की हद तक तो नहीं पहुंचते, लेकिन यथास्थिति को बदल देते हैं। जैकेट कहलाने वाली स्थायी इस्पाती नींव कुएं के मुहाने वाले प्लेटफॉर्म को सहारा देती हैं और वर्षों तक समुद्र में रह सकती हैं। इलाके में मौजूद कम से कम एक पोत 240 मीटर से अधिक लंबा है, जिसका डेक क्षेत्रफल करीब डेढ़ फुटबॉल मैदान जितना है। कुएं के मुहाने वाले कई प्लेटफॉर्म एशिया के सबसे बड़े प्लेटफॉर्मों में शामिल हैं, जो इस अभियान के औद्योगिक पैमाने को दर्शाते हैं।

धीरे-धीरे बढ़ता जमावड़ा अब सबकी नजर में

जेम्सटाउन फाउंडेशन के शोध में पाया गया कि चीनी परिसंपत्तियां कम से कम मई 2020 से ताइवान के दावे वाले क्षेत्र में और उसके आसपास मौजूद हैं। आमतौर पर वे गुआंगडोंग के दाया बे से रवाना होती हैं। इस गर्मी में उनकी गतिविधियां तेज हुईं। नानहाईएरहाओ, या नानहाई नंबर 2 नाम से पहचाने गए अर्ध-पनडुब्बी प्लेटफॉर्म ने प्रातास के पास के इलाके में गहरी पैठ की और प्रतिबंधित जलक्षेत्र की सीमा से करीब 30 मील तक पास पहुंच गया। ऐसा लगता है कि इस जमावड़े का मकसद चीनी मौजूदगी और औद्योगिक गतिविधियों को सामान्य बनाना है। ताइपे का कहना है कि इस क्षेत्र में कृत्रिम द्वीपों, प्रतिष्ठानों या संरचनाओं के लिए पहले अनुमति लेना जरूरी है।

समुद्री गतिविधियों पर नजर रखने वाले विश्लेषकों के नेतृत्व वाली जेम्सटाउन की टीम ने चेतावनी दी कि चुप्पी की कीमत चुकानी पड़ सकती है और दूसरे क्षेत्रों के अनुभव बताते हैं कि लगातार बने रहना मायने रखता है।

आज विरोध न करने से संप्रभुता का धीरे-धीरे क्षरण सामान्य बन जाने का जोखिम है और अतिक्रमण को और बढ़ावा मिलता है।

ड्रिलिंग रिग कहां हैं और क्या कर रहे हैं

खुले स्रोतों पर आधारित नवीनतम आकलन के मुताबिक प्रातास के आसपास ताइवान के दावे वाले विशेष आर्थिक क्षेत्र के भीतर या उसके पास 12 स्थायी या अर्ध-स्थायी संरचनाएं हैं। इनमें रिग की सात संरचनाएं, उत्पादन, भंडारण और उतारने वाले तीन तैरते पोत तथा दो अर्ध-पनडुब्बी प्लेटफॉर्म शामिल हैं। कई जगहों पर भविष्य के प्लेटफॉर्मों को टिकाने के लिए समुद्र तल में जैकेट स्थापित किए गए हैं। ये थोड़े समय के सर्वेक्षण के लिए आने वाले पोत नहीं हैं। ये लंबे समय तक वहां रहने वाली परिसंपत्तियां हैं, जो हाइड्रोकार्बन निकाल सकती हैं, उनका भंडारण कर सकती हैं या उन्हें संभालने में मदद कर सकती हैं।

किसी पड़ोसी के क्षेत्र में उसकी सहमति के बिना रिग चलाना उसके अधिकार क्षेत्र को नकारना है। ताइवान का तटरक्षक बल कहता है कि वह अपने निगरानी क्षेत्र में समुद्री लक्ष्यों पर नजर रखता है। लेकिन उसका यह भी कहना है कि तेल की खोज और वाणिज्यिक सहयोग उसके प्रवर्तन अधिकार के दायरे से बाहर हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि जिम्मेदारी का यह बंटवारा और संबंधित उपकरणों का विशाल आकार मौके पर चुनौती देना मुश्किल बनाते हैं।

वॉशिंगटन स्थित जर्मन मार्शल फंड के इंडो-पैसिफिक कार्यक्रम की प्रबंध निदेशक बोनी ग्लेजर ने कहा कि जवाबी कार्रवाई न होना शायद ताइपे की क्षमता और संसाधनों की कमी को दर्शाता है।

मेरा अनुमान है कि ताइपे के पास जवाब देने की क्षमता नहीं थी और इसी वजह से उसने ऐसा नहीं किया। शायद उसने यह अंदाजा कम लगाया कि यह गतिविधि कितनी व्यापक होगी।
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कानूनी दांव-पेच और ताइवान के सीमित विकल्प

समुद्र के कानून पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (UNCLOS) के तहत विशेष आर्थिक क्षेत्र तटीय देशों को अपनी आधाररेखा से 200 समुद्री मील तक के जलक्षेत्र में प्राकृतिक संसाधनों की खोज, दोहन, संरक्षण और प्रबंधन के संप्रभु अधिकार देता है। दूसरे देशों को नौवहन और ऊपर से उड़ान भरने की स्वतंत्रता है, लेकिन वे तटीय देश की सहमति के बिना उसके क्षेत्र से तेल या गैस नहीं निकाल सकते। ताइवान की राजनीतिक स्थिति से वहां की कानूनी स्थिति जटिल हो जाती है। ताइपे न तो संयुक्त राष्ट्र का सदस्य है, न ही UNCLOS की मध्यस्थता प्रक्रियाओं में पक्षकार। इससे औपचारिक विवाद निपटारे तक उसकी पहुंच घट जाती है, भले ही किसी गतिविधि से अभिसमय का उल्लंघन होता दिखे। घरेलू कानून में भी इस बात को लेकर अस्पष्टता है कि सरकार क्षेत्र के किन हिस्सों में प्रवर्तन करना चाहती है।

विशेष आर्थिक क्षेत्र के अधिकार संक्षेप में

  • तटीय देश को अपने विशेष आर्थिक क्षेत्र में संसाधनों की खोज और दोहन के विशेष अधिकार होते हैं।
  • विदेशी पोत वहां से गुजर सकते हैं और कई शांतिपूर्ण गतिविधियां कर सकते हैं, लेकिन संसाधनों का दोहन करने के लिए उन्हें अनुमति चाहिए।
  • UNCLOS के तहत हस्ताक्षरकर्ता देशों के लिए विवाद निपटाने के साधन उपलब्ध हैं, जिनमें मध्यस्थता भी शामिल है।
  • न्यायाधिकरणों ने क्षेत्र में व्यापक समुद्री दावों को खारिज किया है, जिनमें 2016 में नौ-डैश रेखा का दावा भी शामिल है।

चीन 2016 के फैसले को खारिज करता है और पूरे दक्षिण चीन सागर पर व्यापक दावे करता रहता है। अन्य जगहों पर भी अलग-अलग तनाव जारी हैं। टोक्यो ने हाल ही में विरोध जताया कि बीजिंग ने पूर्वी चीन सागर में समुद्री सीमा के पास 21 ड्रिलिंग रिग स्थापित किए हैं। इससे जापानी हिस्से के गैस भंडार से गैस निकाले जाने की आशंका बढ़ी है। ये विवाद दिखाते हैं कि ऊर्जा प्रतिष्ठानों का इस्तेमाल विवादित दावों को आगे बढ़ाने के लिए तेजी से किया जा रहा है।

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चीन का रुख और CNOOC की भूमिका

CNOOC खुद को दुनिया की सबसे बड़ी स्वतंत्र तेल और गैस खोज एवं उत्पादन कंपनियों में से एक बताती है। दुनिया भर में उसके संयुक्त उपक्रम हैं, जिनमें ताइवान की सरकारी ऊर्जा कंपनी CPC के साथ पहले की परियोजनाएं भी शामिल हैं। यह चीन के स्वामित्व वाली कंपनी है और बीजिंग की राजनीतिक प्राथमिकताओं के अनुरूप काम करती है। चीनी अधिकारी और विद्वान प्रातास के पास अपतटीय गतिविधियों को ऊर्जा जरूरतों और आसपास के जलक्षेत्र में चीन के अधिकारों की रक्षा से प्रेरित बताते हैं।

त्सिंगहुआ विश्वविद्यालय के अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीति केंद्र के प्रोफेसर झू फेंग ने पत्रकारों से कहा कि इन गतिविधियों के पीछे संसाधनों की जरूरत है, न कि तनाव को तेजी से बढ़ाने की कोशिश।

चीन की तेल और गैस खोज मुख्य रूप से उसकी मौजूदा ऊर्जा जरूरतों से प्रेरित है और इस क्षेत्र में अपने दावों वाले अधिकारों तथा हितों की रक्षा के उसके दृढ़ रुख को दर्शाती है।

एक दशक पहले, CNOOC के तत्कालीन अध्यक्ष वांग यिलिन ने विशाल प्लेटफॉर्मों के रणनीतिक महत्व का वर्णन करने के लिए जोरदार शब्दों का इस्तेमाल किया था। कारोबारी मीडिया में प्रकाशित 2012 के एक भाषण में उन्होंने बड़े रिगों को “चलता-फिरता राष्ट्रीय भूभाग और रणनीतिक हथियार” कहा था।

चलता-फिरता राष्ट्रीय भूभाग और रणनीतिक हथियार

ताइपे में राष्ट्रपति कार्यालय ने बीजिंग पर उन जलक्षेत्रों में रिग और संबंधित संरचनाएं तैनात करके अंतरराष्ट्रीय मानदंडों का उल्लंघन करने का आरोप लगाया है जिन पर ताइवान अपना दावा करता है। कार्यालय ने गतिविधियां तुरंत रोकने की मांग की और कहा कि ड्रिलिंग से क्षेत्रीय स्थिरता तथा समुद्री कानून के इर्द-गिर्द स्थापित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था कमजोर होती है।

हम बीजिंग से अपील करते हैं कि वह हमारे सहित क्षेत्रीय आर्थिक जलक्षेत्रों में अवैध तैनाती और दोहन की गतिविधियां तुरंत रोके। यह व्यवहार अंतरराष्ट्रीय कानूनी मानदंडों का उल्लंघन करता है और क्षेत्रीय स्थिरता को कमजोर करता है।
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दोहरे इस्तेमाल का जोखिम और डोंग्शा के आसपास सैन्य स्थिति

ऊर्जा प्लेटफॉर्म युद्धपोत नहीं हैं, फिर भी वे सुरक्षा माहौल को प्रभावित कर सकते हैं। इस्पाती जैकेट और स्थायी प्लेटफॉर्म सेंसर, संचार और रसद के लिए आधार बिंदु उपलब्ध कराते हैं, जिससे आसपास के समुद्री और हवाई रास्तों पर निगरानी तथा नियंत्रण बेहतर हो सकता है। विश्लेषकों ने चेताया है कि इन संरचनाओं पर सतह की निगरानी करने वाले रडार, इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और सिग्नल संग्रह उपकरण तथा ध्वनिक उपकरण लगाए जा सकते हैं। उनके हेलिपैड पर बार-बार हेलीकॉप्टर उतारे जा सकते हैं। बीजिंग चाहे तो चुनिंदा ठिकानों की सुरक्षा मजबूत करने के लिए हल्के हथियार या कम दूरी की वायु रक्षा प्रणालियां भी तैनात कर सकता है।

सैन्य योजना के नजरिये से इस तरह के प्रतिष्ठान दबाव बनाने वाले परिदृश्यों में मदद कर सकते हैं। वे समुद्री मार्गों पर नजर रखने, प्रातास जैसी चौकियों तक आपूर्ति पहुंचाना मुश्किल बनाने और तनाव बढ़ने पर तटरक्षक बल तथा समुद्री मिलिशिया के लिए जमावड़े या आपूर्ति केंद्र के रूप में काम आ सकते हैं। जेम्सटाउन के आकलन के मुताबिक द्वीप बनाने की तुलना में इनसे बहुत कम लागत पर ऐसे कई अधिकार-क्षेत्रीय और परिचालन प्रभाव हासिल किए जा सकते हैं।

संघर्ष में प्लेटफॉर्मों के इस्तेमाल के उदाहरण पहले भी रहे हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन ने टेम्स नदी के मुहाने की रक्षा के लिए समुद्री किले बनाए थे। 1980 के दशक के आखिर में ईरान ने टैंकर युद्ध के दौरान अपनी सेनाओं की मदद के लिए अपतटीय प्लेटफॉर्मों का इस्तेमाल किया, जिसके जवाब में अमेरिका ने हमले किए। दक्षिण-पूर्व एशिया में, वियतनाम के दावे वाले जलक्षेत्र में चीन की पिछली रिग तैनातियों से संकट पैदा हुए। हनोई के लगातार विरोध और कभी-कभी समुद्र में आक्रामक कदमों से रिग हटाने पर मजबूर होना पड़ा। ताइवान के मामले में फर्क यह है कि अपतटीय परिसंपत्तियां वर्षों से मौजूद हैं और उन्हें सार्वजनिक रूप से सीमित चुनौती दी गई है।

ऊर्जा सुरक्षा एक कमजोर कड़ी

ताइवान अपना लगभग पूरा ईंधन आयात करता है और बिजली उत्पादन के लिए तरलीकृत प्राकृतिक गैस पर काफी निर्भर है। मई 2025 में द्वीप का आखिरी चालू परमाणु रिएक्टर बंद हो गया, जिससे गैस, कोयले और तेल पर निर्भरता बढ़ी। ऊर्जा नियोजकों को LNG की ऐसी आपूर्ति शृंखला संभालनी होती है जिसमें समय पर माल पहुंचना जरूरी है और द्वीप पर भंडार महीनों के बजाय कुछ हफ्तों तक ही चल सकता है। सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज के हालिया युद्धाभ्यासों से संकेत मिला कि नाकेबंदी की स्थिति में ताइवान का उपलब्ध गैस भंडार करीब दस दिनों में खत्म हो सकता है। कोयले का भंडार लगभग सात सप्ताह और तेल का करीब 20 सप्ताह चल सकता है। मॉडल तैयार करने वालों ने चेताया कि अगर जहाज बंदरगाहों तक न पहुंच सकें तो बिजली उत्पादन नाकेबंदी से पहले के स्तर के पांचवें हिस्से तक गिर सकता है।

प्रातास के पास रिगों का जाल दबाव का एक नया बिंदु बनाता है। ये ठिकाने ताइवान के दक्षिण-पश्चिमी समुद्री मार्गों तक पहुंचने वाले रास्तों में चीनी मौजूदगी बढ़ाते हैं और संकट के दौरान निगरानी तथा प्रवर्तन में मदद कर सकते हैं। तनाव बढ़ने पर वे ऊर्जा बाजारों और बीमा क्षेत्र की चिंता भी बढ़ाते हैं, जिससे ताइपे के आयात की लागत बढ़ सकती है। इन संरचनाओं को जितने लंबे समय तक बिना चुनौती के रहने दिया जाएगा, विवादित जलक्षेत्रों में कौन कहां काम करता है, इस बारे में लोगों की धारणाओं पर उनका असर उतना ही बढ़ेगा।

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जापान से वियतनाम तक क्षेत्रीय समानताएं

जापान सरकार का कहना है कि चीन ने पूर्वी चीन सागर में ड्रिलिंग की 21 संरचनाएं तैनात की हैं, जबकि करीब एक दशक पुराना संयुक्त विकास ढांचा अब भी ठप है। टोक्यो के अधिकारियों को चिंता है कि सीमा के पास चीन का काम उन गैस भंडारों से गैस निकाल सकता है जो जापान के हिस्से तक फैले हैं। बीजिंग आलोचना खारिज करता है और कहता है कि उसकी ड्रिलिंग चीनी अधिकार क्षेत्र वाले इलाकों में होती है। वियतनाम ने चीनी निविदाओं और अपने दावे वाले जलक्षेत्रों से मेल खाती पिछली रिग तैनातियों की निंदा की है। ये घटनाएं उस पैटर्न को उजागर करती हैं जिसमें ऊर्जा प्रतिष्ठान समुद्री दावों को आगे बढ़ाने का साधन भी बन जाते हैं।

इतिहास से एक बात साफ होती है कि लगातार और सार्वजनिक विरोध से स्थिति बदल सकती है। वियतनाम ने लगातार विरोध किया और कभी-कभी चीनी रिगों के काम में बाधा डालने के लिए जहाज भी भेजे। बीजिंग ने एक से अधिक बार रिग वापस बुलाए। विश्लेषकों का अब कहना है कि ताइवान और समान विचार वाले साझेदार लगातार निगरानी, त्वरित पारदर्शिता और संयुक्त कूटनीतिक बयानों पर आधारित समन्वित रुख से लाभ उठा सकते हैं, जो इन तैनातियों को साझा क्षेत्रीय चुनौती के रूप में देखे।

ताइपे और साझेदारों के सामने क्या विकल्प हैं

नीति संबंधी विचार कानूनी से लेकर परिचालन स्तर तक फैले हैं। ताइवान औपचारिक विरोध दर्ज करा सकता है और वाणिज्यिक उपग्रह तस्वीरों तथा समुद्री निगरानी, जिसमें हर मौसम में काम करने वाले सेंसरों से मिले आंकड़े भी शामिल हों, के जरिए ठिकानों का दस्तावेजीकरण करके साक्ष्यों के पैकेज प्रकाशित कर सकता है। विशेष आर्थिक क्षेत्र में प्रवर्तन की अगुवाई कौन-सी एजेंसियां करेंगी, यह स्पष्ट करने से तटरक्षक बल, नौसेना और ऊर्जा नियामकों के बीच जिम्मेदारी के अंतर कम होंगे। प्रातास के आसपास सावधानी से गश्त बढ़ाने से टकराव का जोखिम बढ़ाए बिना अधिकार-क्षेत्र जताया जा सकता है। क्षेत्रीय साझेदारों के साथ जहाज पर अधिकारियों की तैनाती या संयुक्त गश्त से इस कदम को अधिक महत्व और दृश्यता मिलेगी।

जापान, वियतनाम और फिलीपींस के साथ कूटनीतिक समन्वय से चिंताओं को अनदेखा करने की कीमत बढ़ेगी। ताइपे मित्र देशों की राजधानियों के साथ मिलकर CNOOC के वित्त, तकनीक या बंदरगाह सेवाओं तक पहुंच पर लक्षित पाबंदियों की संभावना भी तलाश सकता है, अगर रिग बिना सहमति के वहां बने रहते हैं। इन कदमों में से किसी के लिए भी संकट प्रबंधन छोड़ना जरूरी नहीं है। लेकिन इनके लिए निरंतरता, पारदर्शिता और ऊर्जा प्रतिष्ठानों को आर्थिक तथा सुरक्षा, दोनों तरह का मुद्दा मानने की इच्छाशक्ति जरूरी है।

ताइवान के राष्ट्रीय रक्षा और सुरक्षा अनुसंधान संस्थान के सहायक शोध अध्येता लिन चाओ लुन ने चेतावनी दी कि चुपचाप स्वीकार करने की रणनीतिक कीमत चुकानी पड़ेगी और समन्वित कार्रवाई का आह्वान किया।

डोंग्शा के पास ड्रिलिंग के खिलाफ ठोस जवाबी कदम नहीं उठाए गए तो संप्रभुता धीरे-धीरे क्षीण होती जाएगी।

मुख्य बातें

  • कम से कम 12 CNOOC संरचनाएं और सहायक पोत प्रातास के पास ताइवान के दावे वाले विशेष आर्थिक क्षेत्र में काम कर रहे हैं। इनमें से कुछ प्रतिबंधित जलक्षेत्र से 50 किलोमीटर के भीतर हैं।
  • खुले स्रोतों की निगरानी से पता चलता है कि कई प्लेटफॉर्म 2020 से वहां मौजूद हैं। इनमें बड़े कुएं के मुहाने वाले प्लेटफॉर्म और अर्ध-पनडुब्बी रिग शामिल हैं।
  • विश्लेषक इस गतिविधि को ‘ग्रे ज़ोन’ दबाव बताते हैं, जो खुले संघर्ष के बिना चीनी नियंत्रण को आगे बढ़ाता है और दबाव बनाने वाले परिदृश्यों में मदद कर सकता है।
  • UNCLOS के तहत ताइवान के कानूनी विकल्प सीमित हैं और समुद्र में जवाब देने में उसे मुश्किल हुई है, हालांकि राष्ट्रपति कार्यालय ने गतिविधियां तुरंत रोकने की मांग की है।
  • चीन का कहना है कि यह काम ऊर्जा जरूरतों और अपने दावे वाले अधिकारों की रक्षा से जुड़ा है। CNOOC के एक पूर्व अध्यक्ष ने रिगों को “चलता-फिरता राष्ट्रीय भूभाग और रणनीतिक हथियार” कहा था।
  • जापान ने पूर्वी चीन सागर में चीन के 21 रिगों को लेकर विरोध दर्ज कराया है और वियतनाम ने अपने जलक्षेत्र में इसी तरह के कदमों का सामना किया है।
  • ताइवान की ऊर्जा निर्भरता से दांव और बढ़ जाते हैं। युद्धाभ्यासों के मुताबिक नाकेबंदी की स्थिति में गैस भंडार करीब दस दिनों में खत्म हो सकता है।
  • विकल्पों में कड़ा विरोध, बेहतर निगरानी और पारदर्शिता, एजेंसियों की स्पष्ट भूमिकाएं, सोच-समझकर गश्त बढ़ाना और क्षेत्रीय साझेदारों के साथ समन्वय शामिल हैं।
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