प्लास्टिक-मुक्त बनने के लिए दक्षिण कोरिया का संघर्ष

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प्लास्टिक-मुक्त बनने के लिए दक्षिण कोरिया का संघर्ष

दक्षिण कोरिया की प्लास्टिक दुविधा: बड़े वादे, सतर्क कदम

दक्षिण कोरिया ने विश्व मंच पर खुद को जलवायु नेतृत्वकर्ता के रूप में पेश किया है और प्लास्टिक को चरणबद्ध तरीके से खत्म करने तथा प्रदूषण से निपटने के बड़े वादे किए हैं। लेकिन हाल की घटनाओं से पता चला है कि बयानों और वास्तविकता के बीच की खाई अब भी चौड़ी है। देश के भीतर और विदेशों में, प्लास्टिक-मुक्त होने की अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए दक्षिण कोरिया का संघर्ष आर्थिक हितों, सांस्कृतिक आदतों और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के जटिल ताने-बाने को उजागर करता है, जिसके चलते सार्थक प्रगति मुश्किल बनी हुई है।

विषय-सूची
  1. दक्षिण कोरिया की प्लास्टिक दुविधा: बड़े वादे, सतर्क कदम
  2. दक्षिण कोरिया के लिए प्लास्टिक-मुक्त होना इतना मुश्किल क्यों है?
  3. वैश्विक संधि वार्ता: बड़ी उम्मीदें, गहरे मतभेद
  4. घरेलू नीति: महत्वाकांक्षा और विरोध
  5. सांस्कृतिक चुनौती: सुविधा से टिकाऊपन की ओर
  6. अंतरराष्ट्रीय दबाव और जनसमर्थन
  7. तकनीकी और क्षेत्रीय समाधान: आगे का रास्ता
  8. संक्षेप में

2025 की गर्मियों में, दक्षिण कोरिया ने बुसान में संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व में वार्ताओं का एक अहम दौर आयोजित किया। इसका उद्देश्य प्लास्टिक प्रदूषण खत्म करने के लिए वैश्विक संधि को अंतिम रूप देना था। दुनिया की निगाहें इस बैठक पर थीं, जहां 170 देशों के 3,300 से अधिक प्रतिनिधि किसी बड़ी सफलता की उम्मीद में जुटे। लेकिन वार्ता बिना किसी समझौते के टूट गई। इससे गहरे मतभेद सामने आए और बाध्यकारी नियमों के प्रति दक्षिण कोरिया की अपनी झिझक भी उजागर हुई।

दक्षिण कोरिया के लिए प्लास्टिक-मुक्त होना इतना मुश्किल क्यों है?

प्लास्टिक-मुक्त नीतियों को पूरी तरह अपनाने में दक्षिण कोरिया की हिचक उसकी आर्थिक संरचना से जुड़ी है। देश में दुनिया की कुछ सबसे बड़ी पेट्रोकेमिकल कंपनियां हैं, जिनमें एलजी केम, लोटे केमिकल और हानव्हा सॉल्यूशंस शामिल हैं। ये समूह ऐसे रेज़िन और प्लास्टिक बनाते हैं जिनकी आपूर्ति पैकेजिंग और उपभोक्ता वस्तुओं से लेकर कारों और इलेक्ट्रॉनिक्स तक के उद्योगों को होती है। प्लास्टिक उत्पादन पर सीमा लगाने या एकल-उपयोग उत्पादों पर कड़े प्रतिबंध लगाने की किसी भी कोशिश का इन औद्योगिक दिग्गजों पर सीधा असर पड़ेगा और निर्यात प्रतिस्पर्धा तथा घरेलू रोजगार को खतरा होगा।

इन कंपनियों का राजनीतिक प्रभाव बहुत बड़ा है। कोरियाई अर्थव्यवस्था के आधारस्तंभ होने के नाते, नीति निर्माता इनके हितों की सावधानी से रक्षा करते हैं। सियोल राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के पर्यावरण प्रबंधन विभाग के प्रोफेसर जियोंग सु-जोंग बताते हैं:

कोरिया प्लास्टिक का बड़ा उपभोक्ता है, लेकिन साथ ही पेट्रोकेमिकल का वैश्विक आपूर्तिकर्ता भी है। सेमीकंडक्टर, इस्पात और कारों के साथ यह निर्यात से सबसे ज्यादा कमाई करने वाले क्षेत्रों में शामिल है। सरकार प्लास्टिक उत्पादन पर कड़ी सीमाएं लगाने से इसलिए भी सतर्क रहती है कि मामला सिर्फ घरेलू खपत का नहीं, बल्कि व्यापार से होने वाली आय में इस उद्योग के योगदान का भी है।

यह आर्थिक वास्तविकता कोरिया के कूटनीतिक रुख को आकार देती है। प्लास्टिक उत्पादन पर सख्त और बाध्यकारी सीमाओं की मांग करने वाले तथाकथित उच्च महत्वाकांक्षा गठबंधन के देशों का साथ देने के बजाय, कोरिया ने बीच का रास्ता अपनाया है और नरम भाषा तथा स्वैच्छिक प्रतिबद्धताओं की वकालत की है। इस संतुलन से पर्यावरण समर्थकों और उद्योग, दोनों के साथ संबंध बने रहते हैं, लेकिन बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय नियमों पर कोरिया का रुख स्पष्ट नहीं हो पाता।

वैश्विक संधि वार्ता: बड़ी उम्मीदें, गहरे मतभेद

बुसान वार्ता को प्लास्टिक प्रदूषण के खिलाफ वैश्विक कार्रवाई के लिए निर्णायक क्षण बताया गया था। प्रतिनिधियों के सामने संधि का एक विस्तृत मसौदा था, जिसमें परस्पर विरोधी विकल्प और अनसुलझे विवादों को दर्शाने वाले कोष्ठकबद्ध पाठ शामिल थे। सबसे विवादास्पद मुद्दे थे:

  • क्या वैश्विक प्लास्टिक उत्पादन पर सीमा लगाई जाए
  • प्लास्टिक में खतरनाक रसायनों पर प्रतिबंध
  • कार्यान्वयन के लिए वित्तपोषण कैसे हो, खासकर विकासशील देशों के लिए
  • प्लास्टिक के पूरे जीवनचक्र पर ध्यान दिया जाए या केवल कचरा प्रबंधन पर

अफ्रीका, एशिया और यूरोप के कई देशों सहित उच्च महत्वाकांक्षा गठबंधन के देशों ने उत्पादन घटाने तथा उत्पादों को पुनः उपयोग और पुनर्चक्रण के लिए नए सिरे से तैयार करने के बाध्यकारी लक्ष्य तय करने की मांग की। सऊदी अरब और रूस के नेतृत्व में तेल उत्पादक देशों ने उत्पादन पर किसी भी सीमा का विरोध करते हुए कचरा प्रबंधन और पुनर्चक्रण पर ध्यान देने की दलील दी।

सार्वजनिक वादों के बावजूद, दक्षिण कोरिया ने समझौते और नरम भाषा की पैरवी करने वाले देशों का साथ दिया। वार्ता का समापन केवल एक प्रारंभिक “अध्यक्षीय पाठ” के साथ हुआ, जो आगे की चर्चा का मार्गदर्शन करेगा; प्रक्रिया को 2025 तक के लिए स्थगित कर दिया गया। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की कार्यकारी निदेशक इंगर एंडरसन ने प्रगति को स्वीकार किया, लेकिन चुनौतियों पर जोर दिया:

प्लास्टिक प्रदूषण खत्म करने के लिए दुनिया की प्रतिबद्धता स्पष्ट और निर्विवाद है, लेकिन अहम मुद्दों पर मतभेद अब भी बने हुए हैं। इन्हें सुलझाने के लिए और समय चाहिए।

ग्रीनपीस समेत पर्यावरण समूहों ने खुलकर आलोचना की। वार्ता के दौरान कार्यकर्ताओं ने जहरीले प्लास्टिक रसायनों के निर्यात के विरोध में बुसान में एक टैंकर पर चढ़कर प्रदर्शन किया। उन्होंने सरकारों से उद्योग की लॉबिंग के दबाव का विरोध करने और प्लास्टिक उत्पादन घटाने वाली संधि करने की मांग की। ग्रीनपीस का अनुमान है कि पर्यावरण और जलवायु आपदा टालने के लिए 2040 तक प्लास्टिक उत्पादन में कम से कम 75% की कटौती जरूरी है।

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घरेलू नीति: महत्वाकांक्षा और विरोध

दक्षिण कोरिया का संघर्ष सिर्फ अंतरराष्ट्रीय मंचों तक सीमित नहीं है। देश में सरकार ने एकल-उपयोग प्लास्टिक घटाने के लिए व्यापक नियम लागू किए हैं, जिनमें डिस्पोजेबल कप और स्ट्रॉ पर प्रतिबंध तथा टेकअवे कंटेनरों के लिए जमा-राशि योजना शामिल है। हालांकि, उद्योग के विरोध और जनता की आपत्तियों के चलते ये कोशिशें बार-बार लड़खड़ाई हैं।

कई उपायों को कमजोर करके स्वैच्छिक कार्यक्रमों के रूप में फिर से पेश किया गया है, जिनमें केवल इच्छुक कारोबारी या स्थानीय सरकारें हिस्सा लेती हैं। उदाहरण के लिए, जर्मनी की सफल प्फांड प्रणाली की तर्ज पर 2022 में शुरू हुई टेकअवे कप की जमा-राशि योजना कैफे मालिकों के विरोध और जनता के सीमित समर्थन के कारण जल्द ही ठप हो गई। कैफे और रेस्तरां में डिस्पोजेबल वस्तुओं पर नियमों का भी ऐसा ही विरोध हुआ।

यह रुझान एक बड़ी चुनौती दिखाता है: सुविधा पर आधारित समाज में रोजमर्रा की आदतें बदलना। पर्यावरण मंत्रालय के अनुसार, दक्षिण कोरिया का औसत नागरिक हर दिन 37 ग्राम तक एकल-उपयोग डिस्पोजेबल वस्तुएं फेंकता है, जिनमें प्लास्टिक कचरे का 40% है। तेज रफ्तार शहरी जीवन और तेजी से बढ़ते फूड डिलीवरी उद्योग से मजबूत हुई सुविधा की संस्कृति के चलते डिस्पोजेबल वस्तुओं का इस्तेमाल छोड़ना मुश्किल है।

सांस्कृतिक चुनौती: सुविधा से टिकाऊपन की ओर

पर्यावरण कार्यकर्ताओं का तर्क है कि केवल प्रतिबंध काफी नहीं हैं। ग्रीन कोरिया यूनाइटेड की हीओ सेउंग-उन जीवनशैली के अनुरूप, धीरे-धीरे लागू की जाने वाली प्रोत्साहन-आधारित नीतियों की जरूरत पर जोर देती हैं:

प्लास्टिक और अन्य एकल-उपयोग डिस्पोजेबल वस्तुओं पर अचानक प्रतिबंध से विरोध पैदा हो सकता है। चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ने पर लोगों को ढलने का समय मिलता है। पहले साल बड़े कैफे समूहों को लक्ष्य बनाएं; तीसरे साल रेस्तरां फ्रेंचाइजी को; और पांचवें साल सुविधा स्टोर तथा डिलीवरी पैकेजिंग को। इससे लोगों और कारोबारों को धीरे-धीरे डिस्पोजेबल वस्तुओं का इस्तेमाल छोड़ने की आदत पड़ सकेगी।

ऐसे उपायों में देशव्यापी प्रोत्साहन शामिल हो सकते हैं, जैसे अपने दोबारा इस्तेमाल किए जा सकने वाले कप लाने वाले ग्राहकों को छूट देना, या साझा कप नेटवर्क बनाना, जहां इस्तेमाल किए जा सकने वाले कप कई कैफे में लौटाए जा सकें। लक्ष्य टिकाऊ विकल्पों को डिस्पोजेबल वस्तुओं जितना सुविधाजनक बनाना है, न कि जमी हुई आदतों से टकराना।

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अंतरराष्ट्रीय दबाव और जनसमर्थन

दक्षिण कोरिया के सतर्क रुख की नागरिक समाज और अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों ने आलोचना की है। बुसान संधि वार्ता के दौरान 1,500 से अधिक कार्यकर्ताओं ने ठोस कार्रवाई की मांग करते हुए मार्च निकाला। ग्रीनपीस ने वार्ता में 220 से अधिक पेट्रोकेमिकल लॉबिस्टों की मौजूदगी पर ध्यान दिलाया। यह अब तक की सबसे बड़ी संख्या थी और इसने प्रक्रिया पर उद्योग के प्रभाव को रेखांकित किया।

जापान, ताइवान और दक्षिण कोरिया के पेट्रोकेमिकल उद्योग एशिया में प्लास्टिक प्रदूषण और जलवायु संकट में सबसे बड़े योगदानकर्ताओं में शामिल हैं। खास तौर पर दक्षिण कोरिया ओईसीडी में प्लास्टिक कचरे का सबसे बड़ा उत्पादक और दुनिया का चौथा सबसे बड़ा पेट्रोकेमिकल उत्पादक है। पर्यावरण समूहों ने चेतावनी दी है कि निर्णायक कदम न उठाने पर कोरिया अंतरराष्ट्रीय संधि को प्रभावित करने का अपना अवसर खो सकता है और दूसरों के प्रस्तावों पर प्रतिक्रिया देने वाला निष्क्रिय पक्ष बनकर रह सकता है।

दक्षिण कोरिया के जेजू प्रांत में मनाए गए विश्व पर्यावरण दिवस 2025 ने इस मुद्दे पर और ध्यान खींचा। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने दोबारा उपयोग को बढ़ावा देने, जवाबदेही तय करने और एकल-उपयोग प्लास्टिक घटाने वाली नीतियों समेत तत्काल बदलाव की मांग की। इस आयोजन में एकल-उपयोग प्लास्टिक घटाने के लिए कोरिया के अभियानों और 2040 तक प्लास्टिक प्रदूषण खत्म करने के उसके लक्ष्य को सामने रखा गया, लेकिन सामूहिक कार्रवाई और चक्रीय अर्थव्यवस्था की दिशा में आगे बढ़ने की जरूरत भी रेखांकित हुई।

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तकनीकी और क्षेत्रीय समाधान: आगे का रास्ता

नीतिगत और सांस्कृतिक बदलाव जरूरी हैं, लेकिन तकनीकी नवाचार भी उम्मीद जगाता है। ब्लॉकचेन प्लेटफॉर्म और डिजिटल कचरा प्रबंधन प्रणालियों जैसी ट्रेसेबिलिटी तकनीकें प्लास्टिक आपूर्ति श्रृंखला में पारदर्शिता और जवाबदेही ला सकती हैं। इन साधनों से कंपनियां पुनर्चक्रित सामग्री की पुष्टि कर सकती हैं, नियमों का पालन कर सकती हैं और उपभोक्ताओं का भरोसा बढ़ा सकती हैं। हालांकि, अपर्याप्त वित्तपोषण, नियामकीय अनिश्चितता और डेटा ढांचे की सीमाओं जैसी चुनौतियां अब भी हैं।

अंतरराष्ट्रीय सहयोग भी अहम है। दक्षिण कोरिया प्रशांत क्षेत्र में प्रकृति संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय संघ (आईयूसीएन) की परियोजना जैसे समुद्री प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने के क्षेत्रीय प्रयासों का समर्थन कर रहा है। समोआ, वानुअतु और टोंगा जैसे देशों में चक्रीय अर्थव्यवस्था के तौर-तरीकों को बढ़ावा देकर और राष्ट्रीय क्षमताओं को मजबूत करके, कोरिया जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता के नुकसान और प्रदूषण की एक-दूसरे से जुड़ी चुनौतियों के व्यापक समाधान में योगदान दे रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि महत्वाकांक्षी वादों को विरोध के चलते विफल होने से रोकने के लिए अनिवार्य कटौती लक्ष्य, उद्योग को समर्थन, जनता के लिए प्रोत्साहन और तकनीकी नवाचार, इन सबका मेल जरूरी है। स्थिर नियम, स्पष्ट डेटा मानक और पूरी मूल्य श्रृंखला में साझेदारियां टिकाऊ प्लास्टिक अर्थव्यवस्था बनाने में मदद कर सकती हैं।

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संक्षेप में

  • पेट्रोकेमिकल पर आर्थिक निर्भरता, उद्योग का राजनीतिक प्रभाव और सुविधा की गहरी जड़ें जमा चुकी संस्कृति के कारण दक्षिण कोरिया को प्लास्टिक-मुक्त होने की महत्वाकांक्षा को वास्तविकता में बदलने में बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
  • बुसान में वैश्विक संधि वार्ता के दौरान कोरिया ने सतर्क, बीच का रुख अपनाया और स्वैच्छिक उपायों के पक्ष में रहते हुए बाध्यकारी प्रतिबद्धताओं का विरोध किया।
  • एकल-उपयोग प्लास्टिक घटाने की घरेलू नीतियां उद्योग और जनता के विरोध के कारण बार-बार लड़खड़ाई हैं, जिससे रोजमर्रा की आदतें बदलने की कठिनाई सामने आई है।
  • पर्यावरण कार्यकर्ता और अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षक प्लास्टिक पर निर्भरता घटाने के लिए चरणबद्ध, प्रोत्साहन-आधारित उपायों और सरकार की मजबूत अगुवाई की मांग कर रहे हैं।
  • तकनीकी नवाचार और क्षेत्रीय सहयोग आशाजनक समाधान देते हैं, लेकिन इनके लिए स्थिर नियम, वित्तपोषण और सभी हितधारकों की व्यापक भागीदारी जरूरी है।
  • जारी संधि वार्ता का नतीजा कोरिया के पर्यावरणीय नेतृत्व और प्लास्टिक प्रदूषण के खिलाफ वैश्विक लड़ाई पर दूरगामी असर डालेगा।
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