जापानी शहर के रोज़ाना स्मार्टफोन इस्तेमाल को दो घंटे तक सीमित करने के प्रस्ताव से छिड़ी बहस

पढ़ने में 12 मिनट
जापानी शहर के रोज़ाना स्मार्टफोन इस्तेमाल को दो घंटे तक सीमित करने के प्रस्ताव से छिड़ी बहस

जापान के शहर ने सभी निवासियों के लिए रोज़ाना स्मार्टफोन इस्तेमाल की दो घंटे की सीमा का प्रस्ताव रखा

राष्ट्रीय बहस छेड़ने और अंतरराष्ट्रीय ध्यान खींचने वाले एक कदम के तहत, मध्य जापान के तोयोआके शहर ने एक अध्यादेश का प्रस्ताव रखा है, जिसमें अपने सभी 69,000 निवासियों से काम और पढ़ाई के अलावा रोज़ाना स्मार्टफोन का इस्तेमाल केवल दो घंटे तक सीमित रखने का आग्रह किया गया है। आइची प्रांत की तोयोआके नगरपालिका सरकार की ओर से पेश किए गए इस गैर-बाध्यकारी प्रस्ताव को जापान में अपनी तरह का पहला प्रस्ताव माना जा रहा है, जो उम्र की परवाह किए बिना पूरी आबादी को लक्षित करता है। यह उपाय कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है और इसके उल्लंघन पर कोई दंड नहीं है, लेकिन इसने डिजिटल लत, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और जीवनशैली की आदतों को आकार देने में स्थानीय सरकार की भूमिका पर गहन चर्चा छेड़ दी है।

विषय-सूची
  1. जापान के शहर ने सभी निवासियों के लिए रोज़ाना स्मार्टफोन इस्तेमाल की दो घंटे की सीमा का प्रस्ताव रखा
  2. तोयोआके का स्मार्टफोन अध्यादेश क्या है?
  3. अभी क्यों? प्रस्ताव के पीछे की वजह
  4. यह सीमा कैसे लागू होगी? विवरण और छूट
  5. जनता की प्रतिक्रिया: विरोध और समर्थन
  6. जापान की डिजिटल दुविधा: संदर्भ और तुलना
  7. स्क्रीन समय की सीमाओं पर अंतरराष्ट्रीय नजरिया
  8. क्या दिशा-निर्देश व्यवहार बदल सकते हैं? डिजिटल आदतों का विज्ञान
  9. आगे क्या? विधायी प्रक्रिया और भविष्य की संभावनाएं
  10. संक्षेप में

तोयोआके का स्मार्टफोन अध्यादेश क्या है?

शहर की विधानसभा में फिलहाल विचाराधीन मसौदा अध्यादेश में सभी निवासियों से अपने खाली समय में स्मार्टफोन, टैबलेट और इसी तरह के उपकरणों का इस्तेमाल रोज़ाना दो घंटे तक सीमित रखने की सिफारिश की गई है। प्रस्ताव में काम, पढ़ाई और कुछ गैर-मनोरंजक गतिविधियों, जैसे ऑनलाइन सीखने या ई-स्पोर्ट्स प्रतियोगिताओं की तैयारी के लिए उपकरणों के इस्तेमाल को इस सीमा से बाहर रखा गया है। इसमें यह सुझाव भी दिया गया है कि प्राथमिक स्कूल के बच्चों और उनसे छोटे बच्चों को रात 9 बजे तक उपकरणों का इस्तेमाल बंद कर देना चाहिए, जबकि बड़े विद्यार्थियों और वयस्कों को रात 10 बजे तक फोन रख देना चाहिए।

इस प्रस्ताव के सूत्रधार मेयर मासाफुमी कोकी ने बार-बार जोर दिया है कि अध्यादेश का मकसद आदेश देना नहीं, बल्कि दिशा-निर्देश देना है। कोकी ने नगर विधानसभा की बैठक में कहा, "इसका मतलब यह नहीं है कि शहर अपने निवासियों के अधिकार सीमित करेगा या उन पर कोई कर्तव्य थोपेगा। इसके बजाय, मुझे उम्मीद है कि इससे हर परिवार को स्मार्टफोन पर बिताए जाने वाले समय और दिन के उस वक्त के बारे में सोचने और चर्चा करने का अवसर मिलेगा, जब इन उपकरणों का इस्तेमाल किया जाता है।"

शहर ने जापान के स्वास्थ्य मंत्रालय और बाल एवं परिवार एजेंसी के आंकड़ों का हवाला दिया, जिनके अनुसार जापान के युवा सप्ताह के दिनों में रोज़ाना औसतन पांच घंटे से अधिक समय ऑनलाइन बिताते हैं। अधिकारियों का कहना है कि स्क्रीन पर अत्यधिक समय बिताने का संबंध कई स्वास्थ्य और सामाजिक समस्याओं से है, जिनमें नींद की कमी, परिवार के सदस्यों के बीच कमजोर संवाद और यहां तक कि उन बच्चों का स्कूल न जाना शामिल है, जो फोन के बिना घर से निकलने से इनकार करते हैं।

अभी क्यों? प्रस्ताव के पीछे की वजह

तोयोआके सरकार का कहना है कि यह अध्यादेश डिजिटल उपकरणों के जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल के शारीरिक और मनोवैज्ञानिक प्रभावों को लेकर बढ़ती चिंताओं का जवाब है। मेयर कोकी ने ऐसे विद्यार्थियों के मामलों का उल्लेख किया है, जो फोन से अलग नहीं हो पाने के कारण स्कूल नहीं जा पाते। उन्होंने उन वयस्कों की ओर भी ध्यान दिलाया है, जो देर रात तक सोशल मीडिया देखते रहने या स्ट्रीमिंग सामग्री देखने के लिए नींद या परिवार के साथ बिताया जाने वाला समय छोड़ देते हैं।

मसौदा अध्यादेश के अनुसार, स्मार्टफोन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का लंबे समय तक इस्तेमाल नींद की कमी और स्वास्थ्य से जुड़ी अन्य समस्याओं का कारण बन सकता है। शहर ने यह चेतावनी भी दी है कि इन उपकरणों से परिवार के सदस्यों के बीच संवाद कम हो सकता है और बच्चों का स्वस्थ विकास बाधित हो सकता है। हालांकि नकारात्मक प्रभावों को अक्सर युवाओं से जोड़ा जाता है, तोयोआके के अधिकारियों का जोर है कि वयस्क भी डिजिटल लत के जोखिमों से अछूते नहीं हैं।

मेयर कोकी ने एक सार्वजनिक बयान में कहा, "स्मार्टफोन सुविधाजनक हैं और हमारे रोज़मर्रा के जीवन के लिए जरूरी हैं। लोगों को गलतफहमी हुई है कि अध्यादेश निवासियों पर दो घंटे की सीमा लागू करेगा। लेकिन यह सीमा एक दिशा-निर्देश है, ताकि लोग अपनी नींद के समय और परिवार के सदस्यों के साथ अपने रिश्ते जैसी बातों पर फिर से विचार करें।"

यह सीमा कैसे लागू होगी? विवरण और छूट

प्रस्तावित अध्यादेश में मनोरंजन के लिए और अन्य कामों के लिए उपकरण इस्तेमाल करने के बीच स्पष्ट अंतर किया गया है। काम, पढ़ाई, घर के काम या जरूरी कार्यों के लिए स्मार्टफोन पर बिताया गया समय रोज़ाना की दो घंटे की सीमा में नहीं गिना जाएगा। उदाहरण के लिए, रात का खाना बनाते समय खाना पकाने से जुड़ा वीडियो देखना या ऑनलाइन कक्षा में हिस्सा लेना इस सीमा में शामिल नहीं होगा। इसका जोर मनोरंजन के लिए स्क्रीन पर बिताया जाने वाला समय घटाने पर है, खासकर शाम के उन घंटों में, जब उपकरणों का इस्तेमाल नींद और पारिवारिक मेलजोल में बाधा डालने की अधिक आशंका होती है।

सुझाई गई सीमा से अधिक इस्तेमाल करने पर कोई दंड नहीं है। शहर ने स्पष्ट किया है कि अध्यादेश गैर-बाध्यकारी है और जुर्माने या अन्य प्रतिबंधों के जरिए लागू नहीं किया जाएगा। इसके बजाय, इसका उद्देश्य निवासियों के बीच उनकी डिजिटल आदतों को लेकर बातचीत और आत्ममंथन को बढ़ावा देना है।

विज्ञापन

अध्यादेश में बच्चों और किशोरों के लिए कुछ खास सिफारिशें भी हैं, जो युवाओं के विकास पर स्क्रीन समय के प्रभाव को लेकर चिंताओं को दर्शाती हैं। प्राथमिक स्कूल के विद्यार्थियों को रात 9 बजे तक उपकरणों का इस्तेमाल बंद करने की सलाह दी गई है, जबकि जूनियर हाई स्कूल के विद्यार्थियों और उनसे बड़े लोगों को रात 10 बजे तक ऐसा कर देना चाहिए। इन दिशा-निर्देशों का मकसद युवाओं को पर्याप्त नींद लेने और स्वस्थ दिनचर्या बनाए रखने में मदद करना है।

जनता की प्रतिक्रिया: विरोध और समर्थन

तोयोआके के प्रस्ताव की निवासियों और सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं ने व्यापक आलोचना की है। उनमें से कई इसे स्थानीय सरकार की हद से ज्यादा दखलंदाजी मानते हैं। जनता से राय लेने की अवधि के दौरान शहर के अधिकारियों को 120 से अधिक फोन कॉल और ईमेल मिले, जिनमें करीब 80% में नकारात्मक राय व्यक्त की गई। आलोचकों का कहना है कि दो घंटे की सीमा अव्यावहारिक है और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन करती है।

एक निवासी ने सोशल मीडिया पर लिखा, "स्मार्टफोन पर किताब पढ़ने या फिल्म देखने के लिए दो घंटे भी काफी नहीं हैं।" एक अन्य ने टिप्पणी की, "मैं उनका इरादा समझता हूं, लेकिन दो घंटे की सीमा असंभव है।" कुछ लोगों ने सवाल उठाया है कि क्या शहर के पास निजी तौर पर उपकरणों के इस्तेमाल पर निगरानी रखने या उसे प्रभावित करने का अधिकार या व्यावहारिक साधन हैं।

विरोध के बावजूद, कुछ निवासियों ने स्मार्टफोन की लत और पारिवारिक जीवन तथा मानसिक स्वास्थ्य पर उसके असर को लेकर चिंताएं जताते हुए अध्यादेश का समर्थन किया है। समर्थकों का कहना है कि गैर-बाध्यकारी दिशा-निर्देश भी जागरूकता बढ़ाने और खासकर बच्चों में स्वस्थ आदतों को प्रोत्साहित करने में मदद कर सकता है।

विवाद पर प्रतिक्रिया देते हुए मेयर मासाफुमी कोकी ने कहा, "मुझे उम्मीद है कि इससे हर परिवार को स्मार्टफोन पर बिताए जाने वाले समय और दिन के उस वक्त के बारे में सोचने और चर्चा करने का अवसर मिलेगा, जब इन उपकरणों का इस्तेमाल किया जाता है।"

यह बहस राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया तक पहुंच गई है। बीबीसी, द गार्डियन और जापान टाइम्स जैसे समाचार संस्थानों ने इस खबर को कवर किया और डिजिटल युग में तकनीक, स्वास्थ्य और शासन से जुड़े व्यापक सवालों को रेखांकित किया।

विज्ञापन

जापान की डिजिटल दुविधा: संदर्भ और तुलना

जापान में स्क्रीन पर अत्यधिक समय बिताने की चिंताओं से निपटने की यह पहली कोशिश नहीं है, लेकिन तोयोआके का प्रस्ताव अपने दायरे के लिहाज से अनूठा है। 2020 में पश्चिमी जापान के कागावा प्रांत ने बच्चों के गेम खेलने के समय को सीमित करने वाला ऐसा ही गैर-बाध्यकारी अध्यादेश पारित किया था, लेकिन तोयोआके का उपाय उम्र की परवाह किए बिना सभी निवासियों को लक्षित करने वाला पहला प्रस्ताव है।

कई विकसित देशों की तरह जापान में भी पिछले दशक के दौरान स्मार्टफोन और इंटरनेट का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। बाल एवं परिवार एजेंसी के एक सर्वेक्षण के अनुसार, जापानी युवा सप्ताह के दिनों में रोज़ाना औसतन पांच घंटे से कुछ अधिक समय ऑनलाइन बिताते हैं। कोविड-19 महामारी ने डिजिटल तकनीक को अपनाने की रफ्तार और तेज कर दी। कई घरों में दूरस्थ काम, ऑनलाइन पढ़ाई और वर्चुअल मेलजोल आम हो गए।

जापान और विदेशों के स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने स्क्रीन पर अत्यधिक समय बिताने के जोखिमों को लेकर चेतावनी दी है, खासकर बच्चों और किशोरों के लिए। अध्ययनों में उपकरणों के ज्यादा इस्तेमाल का संबंध नींद की समस्याओं, ध्यान केंद्रित करने में दिक्कत, अवसाद और सामाजिक अलगाव से जोड़ा गया है। जापान के स्वास्थ्य मंत्रालय ने भी अपने दिशा-निर्देशों में इन जोखिमों का उल्लेख किया है। मंत्रालय मनोरंजन के लिए स्क्रीन पर बिताया जाने वाला समय सीमित करने और आमने-सामने बातचीत को बढ़ावा देने की सिफारिश करता है।

स्क्रीन समय की सीमाओं पर अंतरराष्ट्रीय नजरिया

दुनियाभर में सरकारों और स्वास्थ्य संगठनों को व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन किए बिना डिजिटल लत से निपटने के प्रभावी तरीके खोजने में कठिनाई हुई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन गेमिंग डिसऑर्डर को मानसिक स्वास्थ्य की एक स्थिति मानता है, और कुछ देशों ने नाबालिगों के ऑनलाइन गेम खेलने या सोशल मीडिया इस्तेमाल करने पर सीमाएं लगाने वाले नियम पेश किए हैं। हालांकि, इनमें से ज्यादातर उपाय अनिवार्य करने के बजाय सलाह के रूप में हैं। यह उनके क्रियान्वयन की चुनौतियों और व्यक्तिगत पसंद के महत्व को दर्शाता है।

गैर-बाध्यकारी अध्यादेश के जरिए लोगों को खुद अपने इस्तेमाल पर नियंत्रण रखने के लिए प्रोत्साहित करने का तोयोआके का तरीका इसी वैश्विक रुझान के अनुरूप है। दो घंटे की सीमा को कानून के बजाय दिशा-निर्देश के रूप में पेश करके शहर सार्वजनिक स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं और व्यक्तिगत स्वायत्तता के सम्मान के बीच संतुलन बनाने की उम्मीद करता है।

विज्ञापन

क्या दिशा-निर्देश व्यवहार बदल सकते हैं? डिजिटल आदतों का विज्ञान

व्यवहार वैज्ञानिकों का कहना है कि दिशा-निर्देश और जन-जागरूकता अभियान आदतें बदलने में प्रभावी हो सकते हैं, खासकर तब, जब उन्हें शिक्षा और सामुदायिक भागीदारी का समर्थन मिले। परिवारों को अपनी डिजिटल दिनचर्या पर चर्चा करने और अपनी सीमाएं तय करने के लिए प्रोत्साहित करके तोयोआके का अध्यादेश निवासियों को स्क्रीन पर बिताए जाने वाले समय के प्रति अधिक सजग बना सकता है।

हालांकि, विशेषज्ञ आगाह करते हैं कि केवल समय-सीमा तय करना डिजिटल लत के मूल कारणों से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता। तनाव, अकेलापन और वैकल्पिक गतिविधियों की कमी जैसे कारक उपकरणों के अत्यधिक इस्तेमाल को बढ़ावा दे सकते हैं। प्रभावी उपायों में अक्सर दिशा-निर्देशों के साथ स्वस्थ विकल्पों को समर्थन देना भी शामिल होता है, जैसे बाहरी गतिविधियां, सामाजिक कार्यक्रम और मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं।

जापान में, जहां काम के लंबे घंटे और पढ़ाई का दबाव आम हैं, स्मार्टफोन उत्पादकता का साधन भी हो सकते हैं और वास्तविकता से बचने का जरिया भी। नीति-निर्माताओं के सामने चुनौती है कि वे कठोर नियमन का सहारा लिए बिना संतुलित इस्तेमाल को बढ़ावा दें।

आगे क्या? विधायी प्रक्रिया और भविष्य की संभावनाएं

तोयोआके शहर की विधानसभा सितंबर के आखिर में अध्यादेश पर मतदान करने वाली है। मंजूरी मिलने पर यह उपाय अक्टूबर में लागू होने वाला है। मेयर कोकी ने निवासियों को अध्यादेश के बारे में सावधानी से समझाने और विधानसभा में चर्चा तथा जनता की राय के आधार पर संभावित संशोधनों पर विचार करने की मंशा जताई है।

अध्यादेश पारित होने पर भी उसका असर काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि निवासी उस पर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं। शहर की व्यक्तिगत रूप से उपकरणों के इस्तेमाल पर निगरानी रखने या नियम न मानने पर दंड लगाने की कोई योजना नहीं है। इसके बजाय, अधिकारी उम्मीद करते हैं कि प्रस्ताव को मिल रहे प्रचार से डिजिटल स्वास्थ्य पर बातचीत शुरू होगी और लोग स्वेच्छा से अपना व्यवहार बदलने के लिए प्रेरित होंगे।

विज्ञापन

जापान और विदेशों की अन्य नगरपालिकाएं तोयोआके के मामले पर करीबी नजर रख रही हैं, क्योंकि समुदाय डिजिटल जीवन की चुनौतियों से जूझ रहे हैं। दो घंटे का यह दिशा-निर्देश दूसरे शहरों के लिए मिसाल बनता है या एक स्थानीय प्रयोग बनकर रह जाता है, यह अभी देखना बाकी है। लेकिन इसने स्क्रीन समय और स्वास्थ्य, शिक्षा तथा पारिवारिक जीवन पर उसके प्रभाव के मुद्दे को राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में जरूर ला दिया है।

संक्षेप में

  • जापान के तोयोआके शहर ने गैर-बाध्यकारी अध्यादेश का प्रस्ताव रखा है, जिसमें सभी निवासियों से काम और पढ़ाई के अलावा स्मार्टफोन का इस्तेमाल रोज़ाना दो घंटे तक सीमित रखने का आग्रह किया गया है।
  • इस उपाय का मकसद डिजिटल आदतों पर चर्चा और आत्ममंथन को बढ़ावा देना है; यह लागू किया जा सकने वाला कानून नहीं, बल्कि एक दिशा-निर्देश है।
  • अध्यादेश में शाम को उपकरणों का इस्तेमाल बंद करने के समय की भी सिफारिश है: प्राथमिक स्कूल के विद्यार्थियों के लिए रात 9 बजे और बड़े विद्यार्थियों तथा वयस्कों के लिए रात 10 बजे।
  • जनता की प्रतिक्रिया काफी हद तक नकारात्मक रही है। कई निवासियों और सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं ने प्रस्ताव को अव्यावहारिक या दखलंदाजी वाला बताया है।
  • अधिकारी दिशा-निर्देश के पीछे स्वास्थ्य और सामाजिक चिंताओं का हवाला देते हैं, जिनमें नींद की कमी, स्कूल न जाना और परिवार के सदस्यों के बीच कमजोर संवाद शामिल हैं।
  • शहर की विधानसभा सितंबर के आखिर में अध्यादेश पर मतदान करेगी। मंजूरी मिलने पर इसे अक्टूबर में लागू किया जा सकता है।
  • यह प्रस्ताव जापान और दुनियाभर में डिजिटल लत, सार्वजनिक स्वास्थ्य और निजी जीवन में सरकारी हस्तक्षेप की सीमाओं को लेकर जारी व्यापक बहस को दर्शाता है।
यह लेख शेयर करें

आपको यह भी पसंद आ सकता है