इंडोनेशिया ने जंगलों में अवैध खनन के खिलाफ व्यापक अभियान शुरू किया
दुनिया के कुछ सबसे समृद्ध प्राकृतिक संसाधनों और सबसे बड़े उष्णकटिबंधीय जंगलों का घर इंडोनेशिया, अपने वन क्षेत्रों में अवैध खनन और बागान गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए महत्वाकांक्षी और विवादास्पद अभियान शुरू कर रहा है। 1 सितंबर, 2025 से एक सरकारी कार्यबल लगभग 4.27 मिलियन हेक्टेयर जंगल में बिना उचित परमिट चल रही खदानों को निशाना बनाएगा। यह क्षेत्र स्विट्जरलैंड से भी बड़ा है। इस कदम से पहले वर्ष के शुरुआती महीनों में अवैध पाम ऑयल बागानों के खिलाफ इसी तरह का अभियान चलाया गया था। यह राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो के नेतृत्व में संसाधन शासन के नए दौर का संकेत है।
विषय-सूची
- इंडोनेशिया ने जंगलों में अवैध खनन के खिलाफ व्यापक अभियान शुरू किया
- इंडोनेशिया अवैध खनन और बागानों को निशाना क्यों बना रहा है?
- यह कार्रवाई कैसे की जा रही है?
- कौन-से खनिज और जिंस इसमें शामिल हैं?
- किसे फायदा, किसे नुकसान: कार्रवाई का असर किन पर पड़ेगा?
- आदिवासी समुदायों और छोटे किसानों पर असर
- कॉरपोरेट जवाबदेही और चुनिंदा कार्रवाई
- सरकार का जवाब और औचित्य
- मानवाधिकार और सैन्यीकरण: बढ़ता विवाद
- आर्थिक और पर्यावरणीय प्रभाव
- संक्षेप में
सेना, पुलिस, अभियोजकों और सरकारी कर्मचारियों से बने बहु-एजेंसी कार्यबल के नेतृत्व में चलाया जा रहा यह अभियान प्राकृतिक संसाधनों पर राज्य का नियंत्रण फिर से स्थापित करने, पर्यावरण की रक्षा करने और यह सुनिश्चित करने की व्यापक कोशिश का हिस्सा है कि इंडोनेशिया के खनिज और कृषि संसाधनों से होने वाला लाभ पूरे देश को मिले। हालांकि, अभियान के तरीकों, स्थानीय समुदायों पर इसके असर और इंडोनेशिया के जंगलों तथा संसाधन उद्योगों के भविष्य को लेकर इसने तीखी बहस भी छेड़ दी है।
इंडोनेशिया अवैध खनन और बागानों को निशाना क्यों बना रहा है?
प्राकृतिक संसाधनों के मामले में इंडोनेशिया वैश्विक महाशक्ति है। यह दुनिया का सबसे बड़ा पाम ऑयल उत्पादक और निर्यातक है तथा तापीय कोयला, निकल, टिन और तांबे का प्रमुख आपूर्तिकर्ता भी है। ये उद्योग देश की अर्थव्यवस्था के लिए अहम हैं। इनसे अरबों डॉलर का निर्यात राजस्व मिलता है और लाखों लोगों को रोजगार मिलता है। लेकिन दशकों से कमजोर नियमन, भ्रष्टाचार और भूमि-अधिकार विवादों के चलते अवैध खनन और बागान गतिविधियां फलती-फूलती रही हैं, अक्सर इसकी कीमत पर्यावरण और स्थानीय समुदायों को चुकानी पड़ी है।
सरकारी अनुमानों के मुताबिक, अवैध खनन से ही करों, रॉयल्टी और अनियंत्रित दोहन के रूप में इंडोनेशिया को हर साल 300 ट्रिलियन रुपिया (करीब 19 अरब डॉलर) तक का नुकसान होता है। पर्यावरण को भारी क्षति पहुंच रही है: अवैध गतिविधियों से वनों की कटाई होती है, नदियां प्रदूषित होती हैं, प्राकृतिक आवास नष्ट होते हैं और जलवायु परिवर्तन बढ़ता है। उदाहरण के लिए, पाम ऑयल क्षेत्र में उचित परमिट के बिना 3 मिलियन हेक्टेयर से अधिक जंगलों को बागानों में बदला गया है। इससे इंडोनेशिया की जलवायु प्रतिबद्धताएं कमजोर हुई हैं और उसे अंतरराष्ट्रीय आलोचना का सामना करना पड़ा है।
राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो ने व्यवस्था बहाल करने और इंडोनेशिया के संसाधनों से राष्ट्रीय लाभ अधिकतम करने के वादे के साथ पद संभाला था। उन्होंने इस कार्रवाई को अपने प्रशासन का प्रमुख एजेंडा बनाया है। अपने पहले राष्ट्र के नाम संबोधन में उन्होंने 1,000 से अधिक अवैध खनन स्थलों को खत्म करने और गैरकानूनी दोहन से लाखों हेक्टेयर जंगल वापस लेने का संकल्प जताया।
यह कार्रवाई कैसे की जा रही है?
सरकार का तरीका अपने पैमाने और समन्वय के लिहाज से अभूतपूर्व है। राष्ट्रपति के एक नियमन के तहत गठित कार्यबल में सेना, पुलिस, अभियोजक तथा वानिकी, ऊर्जा और सरकारी उपक्रमों के मंत्रालयों के अधिकारी शामिल हैं। उसका दायित्व अवैध खनन और बागान गतिविधियों की पहचान करना, उन्हें जब्त करना और उनका प्रबंधन करना है। इसके लिए कानूनी और प्रशासनिक उपायों के साथ-साथ जरूरत पड़ने पर सैन्य साधनों का भी इस्तेमाल किया जाएगा।
इस कार्रवाई के प्रमुख तत्वों में शामिल हैं:
- जब्ती और हस्तांतरण: अवैध रूप से चलती पाई गई खदानों और बागानों को राज्य अपने कब्जे में लेकर अस्थायी प्रबंधन के लिए सरकारी उपक्रम मंत्रालय को सौंप देता है। पाम ऑयल क्षेत्र में वापस ली गई जमीन का बड़ा हिस्सा नई सरकारी कंपनी एग्रीनास पाल्मा नुसंतारा को हस्तांतरित किया गया है।
- आर्थिक दंड: अवैध गतिविधियों के मालिकों को मुनाफा राज्य को लौटाने का आदेश दिया जाता है। हालांकि हर मामले में आपराधिक मुकदमा नहीं चलता, लेकिन सरकार का लक्ष्य खोया राजस्व वापस पाना और भविष्य में उल्लंघन रोकना है।
- सेना की भागीदारी: कार्रवाई लागू कराने के लिए सैन्यकर्मियों का इस्तेमाल एक उल्लेखनीय बढ़ोतरी है। अधिकारियों का कहना है कि प्रभावशाली हित समूहों के प्रतिरोध और अवैध गतिविधियों के बड़े पैमाने को देखते हुए यह जरूरी है।
- तकनीकी निगरानी: अवैध गतिविधियों का पता लगाने और नियमों के पालन पर नजर रखने के लिए उपग्रह चित्रों और ड्रोन का इस्तेमाल किया जा रहा है।
- कानूनी सुधार: सरकार नियमों की खामियां दूर करने और पारदर्शिता बढ़ाने के लिए परमिट प्रक्रिया को सरल बना रही है, दंड कड़े कर रही है और नियमों को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप कर रही है।
हाल के एक मामले में मध्य सुलावेसी के अधिकारियों ने संरक्षित जंगल में अवैध सोने की खदानों को बंद कर भारी मशीनरी जब्त की और संदिग्धों को गिरफ्तार किया। जानलेवा बाढ़ से जुड़ी पर्यावरणीय क्षति के बाद यह कार्रवाई की गई, जिसने नियम लागू करने की तात्कालिक जरूरत को रेखांकित किया।
कौन-से खनिज और जिंस इसमें शामिल हैं?
सरकार ने निशाने पर रखे गए सभी खनिजों की जानकारी नहीं दी है, लेकिन इंडोनेशिया का अवैध खनन क्षेत्र उच्च मूल्य वाली वस्तुओं पर केंद्रित माना जाता है, जैसे:
- निकल: बैटरियों और इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए जरूरी निकल के दुनिया के सबसे बड़े भंडार इंडोनेशिया में हैं।
- कोयला: यह प्रमुख निर्यात वस्तु है, हालांकि इसके पर्यावरणीय प्रभाव को लेकर विवाद बढ़ रहा है।
- टिन, तांबा और सोना: इनका इस्तेमाल इलेक्ट्रॉनिक्स, निर्माण और आभूषणों में होता है।
- पाम ऑयल: इंडोनेशिया इसका दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक है, लेकिन अवैध बागानों ने बड़े पैमाने पर वनों की कटाई में योगदान दिया है।
इस कार्रवाई से वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं, खासकर निकल, कोयले और पाम ऑयल की आपूर्ति में व्यवधान आने की आशंका है। इससे कीमतों में उतार-चढ़ाव हो सकता है और इंडोनेशिया के संसाधन शासन पर अंतरराष्ट्रीय निगरानी बढ़ सकती है।
किसे फायदा, किसे नुकसान: कार्रवाई का असर किन पर पड़ेगा?
सरकार इस कार्रवाई को पर्यावरण की रक्षा और संसाधनों से मिलने वाली संपत्ति का उचित बंटवारा सुनिश्चित करने के लिए जरूरी कदम बताती है। वहीं, आलोचकों का कहना है कि इसे असमान तरीके से और कभी-कभी अन्यायपूर्ण ढंग से लागू किया गया है।
आदिवासी समुदायों और छोटे किसानों पर असर
इस अभियान का सबसे विवादास्पद पहलू उन आदिवासी लोगों और छोटे किसानों पर इसका असर है, जो पीढ़ियों से वन क्षेत्रों में रहते और काम करते आए हैं। नागरिक समाज समूहों और पर्यावरण संगठनों का कहना है कि कार्रवाई में अक्सर बड़े कॉरपोरेट उल्लंघनों और स्थानीय समुदायों की आजीविका के लिए की जाने वाली गतिविधियों के बीच फर्क नहीं किया जाता।
उदाहरण के लिए, आचे प्रांत में कार्यबल ने 15,000 हेक्टेयर जमीन जब्त की, जिसका बड़ा हिस्सा स्थानीय समुदायों द्वारा उगाई जाने वाली फसलों, जैसे डूरियन और कैंडलनट, के अधीन था। कार्यकर्ताओं का कहना है कि छोटे किसानों और आदिवासी समूहों को बेदखली और आजीविका के नुकसान का सामना करना पड़ रहा है, जबकि उन्हीं इलाकों में काम करने वाली बड़ी कंपनियों पर काफी हद तक कार्रवाई नहीं हुई है। कुछ मामलों में समुदायों को सरकारी कंपनियों के साथ मुनाफा बांटने की योजनाओं की पेशकश की गई है, लेकिन कार्यकर्ताओं के मुताबिक ये व्यवस्थाएं शोषणकारी हैं और उचित प्रक्रिया का पालन नहीं करतीं।
पश्चिम कालीमंतन और रियाउ में पारंपरिक भूमि बिना मुआवजे के जब्त की गई है और हजारों परिवार विस्थापित हुए हैं। स्कूल बंद होने और बच्चों की शिक्षा पर खतरे की खबरें भी आई हैं। आलोचकों का कहना है कि नियमन पारंपरिक भूमि उपयोग को अपराध बनाता है और भूमि असमानता को बढ़ाता है। साथ ही, बुनियादी अन्याय दूर किए बिना नियंत्रण निजी एकाधिकारों से सरकारी उपक्रमों को सौंपता है।
इंडोनेशिया के सबसे बड़े पर्यावरण संगठन वाल्ही की आचे शाखा के वकालत प्रमुख अफीफुद्दीन अचल ने कहा, “नियमन कॉरपोरेट और सामुदायिक गतिविधियों में कोई फर्क नहीं करता। इससे बड़ी कंपनियों को बचाते हुए आदिवासी और स्थानीय समुदायों को विस्थापित किया जा रहा है।”
कॉरपोरेट जवाबदेही और चुनिंदा कार्रवाई
कार्यकर्ता चुनिंदा कार्रवाई के एक पैटर्न की ओर भी ध्यान दिलाते हैं, जिसमें राजनीतिक संपर्क रखने वाली शक्तिशाली कंपनियां दंड से बच जाती हैं, जबकि कार्रवाई का सबसे भारी बोझ छोटे लोगों पर पड़ता है। 2020 से अब तक अवैध बागानों के लिए किसी कंपनी पर आपराधिक मुकदमा नहीं चला है, जबकि व्यापक स्तर पर उल्लंघन हुए हैं। पाम ऑयल कारोबारी सूर्या धरमादी के खिलाफ चर्चित जांच जैसे भ्रष्टाचार के मामले दिखाते हैं कि कॉरपोरेट अपराधियों को जवाबदेह ठहराना कितना चुनौतीपूर्ण है।
ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल और अन्य निगरानी संस्थाओं ने कार्रवाई में अधिक पारदर्शिता की मांग की है, ताकि नियमन दमन का औजार न बने और कंपनियां जवाबदेही से बच न पाएं। आलोचकों ने चेताया है कि स्पष्ट दिशानिर्देशों और सुरक्षा उपायों के अभाव में यह कार्रवाई लोकतंत्र और पर्यावरणीय न्याय को कमजोर कर सकती है।
सरकार का जवाब और औचित्य
अधिकारी इस कार्रवाई को दशकों से जारी पर्यावरणीय क्षति और सरकारी राजस्व के नुकसान से निपटने के लिए जरूरी कदम बताते हैं। ऊर्जा और खनिज संसाधन मंत्री बाहलिल लाहादालिया ने जोर देकर कहा कि अभियान इंडोनेशिया के 1945 के संविधान के अनुच्छेद 33 पर आधारित है, जिसके तहत प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन जनता की समृद्धि के लिए किया जाना चाहिए। उन्होंने पर्यावरण की रक्षा और सरकारी राजस्व सुनिश्चित करने के लिए अवैध खनन को नियमन के दायरे में लाने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने बताया कि खनन क्षेत्र इंडोनेशिया की सरकारी आय में करीब 15 प्रतिशत का योगदान देता है।
राष्ट्रपति प्रबोवो ने दुर्लभ मृदा खनिजों समेत रणनीतिक वस्तुओं के शासन और परमिट व्यवस्था में सुधार पर केंद्रित कैबिनेट बैठकें की हैं। ये खनिज उच्च तकनीक उद्योगों के लिए अहम हैं। उन्होंने वादा किया है कि राजनीतिक अभिजात वर्ग या सरकारी अधिकारियों समेत किसी को भी कानून के दायरे से बाहर नहीं रखा जाएगा। सरकार कानूनी ढांचे को बेहतर बनाने, परमिट प्रक्रिया सरल करने और टिकाऊ तौर-तरीके सुनिश्चित करने के लिए सामुदायिक निगरानी कार्यक्रम शुरू करने पर भी काम कर रही है।
मंत्री बाहलिल लाहादालिया ने अवैध खनन के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की सरकार की प्रतिबद्धता दोहराते हुए कहा, “मकसद पर्यावरण की रक्षा करना और साथ ही यह सुनिश्चित करना है कि राज्य को राजस्व मिले।”
समर्थकों का कहना है कि इस कार्रवाई से नियमों का पालन करने वाले कारोबारियों के लिए समान अवसर बनेंगे, निवेश आकर्षित होगा और बैटरी निर्माण तथा परिष्कृत धातुओं जैसे प्रसंस्करण-आधारित उद्योगों को विकसित करके इंडोनेशिया को मूल्य शृंखला में आगे बढ़ने में मदद मिलेगी।
मानवाधिकार और सैन्यीकरण: बढ़ता विवाद
नागरिक कानून लागू करने में सैन्य बल के इस्तेमाल ने इंडोनेशिया की लोकतांत्रिक दिशा और मानवाधिकारों के सम्मान को लेकर बहस फिर शुरू कर दी है। नया नियमन नागरिक मामलों में सेना की “द्वैध भूमिका” को फिर से सामने लाता है। दो दशक से अधिक समय पहले सत्तावादी शासन के पतन के साथ इस प्रथा को समाप्त किया जाना था।
मानवाधिकार समूहों ने चेतावनी दी है कि कार्रवाई का सैन्यीकरण मानवाधिकार उल्लंघनों का जोखिम बढ़ाता है, खासकर पापुआ जैसे उन क्षेत्रों में जहां भूमि विवादों का इतिहास रहा है। आशंका है कि इस अभियान का इस्तेमाल जबरन बेदखली को जायज ठहराने, आदिवासी भूमि उपयोग को अपराध बनाने और असहमति दबाने के लिए किया जा सकता है। जानकारों का कहना है कि जंगलों को सामुदायिक संसाधनों के बजाय राष्ट्रीय सुरक्षा की संपत्ति मानना लोकतंत्र और पर्यावरण संरक्षण, दोनों को कमजोर करता है।
इंडोनेशियाई पर्यावरण कानून केंद्र में वानिकी और भूमि शासन प्रमुख दीफा शफीरा ने कहा, “जंगलों में और उनके आसपास रहने वाले समुदाय ही उनके असली संरक्षक हैं; उन्हें विस्थापित करने के बजाय सशक्त बनाया जाना चाहिए।”
कार्यकर्ता एक नए वन कानून की मांग कर रहे हैं, जो आदिवासी भूमि अधिकारों को मान्यता दे, पारिस्थितिक बहाली अनिवार्य करे और उन कानूनी खामियों को दूर करे जिनके चलते कॉरपोरेट उल्लंघनकर्ता जवाबदेही से बच निकलते हैं। उनका तर्क है कि न्याय और प्रभावी वन शासन सुनिश्चित करने के लिए व्यापक कानूनी बदलाव जरूरी हैं।
आर्थिक और पर्यावरणीय प्रभाव
इस कार्रवाई का इंडोनेशिया की अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा पर दूरगामी असर पड़ने की आशंका है। अवैध आपूर्ति शृंखलाओं में व्यवधान डालकर सरकार राजस्व बढ़ाने, जिम्मेदार निवेश आकर्षित करने और पर्यावरणीय स्थिति सुधारने की उम्मीद कर रही है। हालांकि, अनौपचारिक खनन और बागान के काम पर निर्भर स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं के लिए यह बदलाव कष्टकारी हो सकता है।
वैश्विक बाजारों की इस पर करीबी नजर है, खासकर निकल और पाम ऑयल जैसे क्षेत्रों में, जहां इंडोनेशिया प्रमुख आपूर्तिकर्ता है। नियमों का सख्त पालन और आपूर्ति में व्यवधान कीमतें बढ़ा सकते हैं और खरीदारों को दूसरे स्रोत तलाशने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। वहीं, बेहतर शासन और टिकाऊपन के मानक अंतरराष्ट्रीय भागीदारों और निवेशकों के बीच इंडोनेशिया की साख मजबूत कर सकते हैं।
पर्यावरणविद वनीकरण और परमिट पर सख्ती के जोर का स्वागत करते हैं, लेकिन आगाह करते हैं कि असली टिकाऊपन के लिए सामुदायिक अधिकारों का सम्मान और क्षतिग्रस्त भूमि की बहाली जरूरी है। जब्त की गई जमीन के कुछ हिस्से में फिर से जंगल लगाने की सरकार की योजना सकारात्मक कदम है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि कितनी जमीन बहाल होगी और कितनी सरकारी बागानों या अन्य इस्तेमाल के लिए रखी जाएगी।
संक्षेप में
- इंडोनेशिया अपने जंगलों में अवैध खनन और बागान गतिविधियों के खिलाफ बड़ा अभियान शुरू कर रहा है। इसके निशाने पर 4 मिलियन हेक्टेयर से अधिक भूमि है।
- सेना की भागीदारी वाले बहु-एजेंसी कार्यबल के नेतृत्व में चलाए जा रहे इस अभियान का लक्ष्य राज्य का नियंत्रण वापस पाना, खोया राजस्व वसूलना और पर्यावरण की रक्षा करना है।
- सरकार इसे टिकाऊपन और न्याय की दिशा में कदम बताती है, लेकिन आलोचकों को आशंका है कि इसका असमान असर आदिवासी समुदायों और छोटे किसानों पर पड़ेगा, जबकि शक्तिशाली कंपनियां बच निकलेंगी।
- मानवाधिकार समूह कार्रवाई के सैन्यीकरण और उल्लंघनों के जोखिम को लेकर चिंतित हैं तथा सामुदायिक अधिकारों की रक्षा के लिए कानूनी सुधारों की मांग कर रहे हैं।
- इस कार्रवाई से निकल और पाम ऑयल जैसी प्रमुख वस्तुओं की वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में व्यवधान आने की आशंका है, जिसके आर्थिक और पर्यावरणीय प्रभाव महत्वपूर्ण होंगे।
- कार्यकर्ता सरकार से अधिक समावेशी तरीका अपनाने की मांग करते हैं, जिसमें कॉरपोरेट और सामुदायिक गतिविधियों में फर्क किया जाए और पारिस्थितिक बहाली तथा सामाजिक न्याय को प्राथमिकता मिले।






