अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड से चीन की दूरी: वैश्विक वित्त का नया दौर?
कभी अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड का दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा विदेशी धारक रहा चीन, अमेरिकी सरकारी कर्ज में अपनी हिस्सेदारी लगातार घटा रहा है। हाल के वर्षों में तेज हुई इस प्रवृत्ति से वैश्विक वित्त के भविष्य, अमेरिकी ऋण बाजारों की स्थिरता और दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच बदलती आर्थिक प्रतिस्पर्धा को लेकर सवाल उठ रहे हैं। चीन की हिस्सेदारी 2009 के बाद के सबसे निचले स्तर पर पहुंचने के साथ, विश्लेषक और नीति निर्माता इसके व्यापक निहितार्थों पर करीब से नजर रख रहे हैं।
विषय-सूची
- अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड से चीन की दूरी: वैश्विक वित्त का नया दौर?
- चीन अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड क्यों बेच रहा है?
- चीन की रणनीति पर विशेषज्ञों की राय
- वैश्विक ट्रेजरी बाजार ने कैसी प्रतिक्रिया दी है?
- चीन का पोर्टफोलियो: अल्पकालीन और दीर्घकालीन ट्रेजरी बॉन्ड
- इसके जोखिम और निहितार्थ क्या हैं?
- क्या चीन अपने ट्रेजरी बॉन्ड को "हथियार" बना सकता है?
- अमेरिका-चीन वित्तीय संबंधों का अगला रुख क्या होगा?
- दीर्घकालीन रुझान: क्या बहुध्रुवीय मौद्रिक व्यवस्था की ओर बढ़ रही है दुनिया?
- सारांश
चीन अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड क्यों बेच रहा है?
अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड में चीन की हिस्सेदारी में कमी अचानक उठाया गया कदम नहीं, बल्कि लंबे समय से जारी रणनीति का हिस्सा है। अमेरिकी वित्त मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, मई 2025 में चीन की हिस्सेदारी घटकर 756.3 अरब डॉलर रह गई, जो फरवरी 2009 के बाद सबसे कम है। यह 2012 से 2016 के बीच 1.3 ट्रिलियन डॉलर से अधिक के शिखर से तेज गिरावट है। लगातार तीसरे महीने इसमें कमी आई है और जापान तथा ब्रिटेन के बाद चीन अब अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड का तीसरा सबसे बड़ा विदेशी धारक रह गया है।
इस बदलाव के पीछे कई कारण हैं:
- आर्थिक और व्यापारिक तनाव: अमेरिका और चीन के बीच जारी व्यापार विवाद, जिनमें बढ़ते शुल्क और जवाबी कदम शामिल हैं, ने वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता और उतार-चढ़ाव बढ़ाया है। अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड में चीन की हिस्सेदारी धीरे-धीरे घटाना इन तनावों की आंशिक प्रतिक्रिया है। चीन अपने विदेशी मुद्रा भंडार में विविधता लाना और अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करना चाहता है।
- युआन को सहारा देना: कोविड के बाद आर्थिक सुस्ती और निर्यात से डॉलर की आवक घटने के कारण चीन की अर्थव्यवस्था दबाव का सामना कर रही है। अपनी मुद्रा युआन को सहारा देने के लिए सरकार ट्रेजरी बॉन्ड बेच रही है। युआन के कमजोर होने से पूंजी का पलायन हो सकता है और चीन की वित्तीय प्रणाली और अस्थिर हो सकती है, इसलिए मुद्रा स्थिरता बनाए रखना सर्वोच्च प्राथमिकता है।
- भंडार में विविधता: चीन अपने भंडार में सक्रिय रूप से विविधता ला रहा है और सोने तथा अन्य रणनीतिक परिसंपत्तियों में हिस्सेदारी बढ़ा रहा है। मई 2025 में चीन ने लगातार सातवें महीने अपना स्वर्ण भंडार बढ़ाया, जो 73.83 मिलियन औंस तक पहुंच गया। इस बदलाव को वैश्विक उतार-चढ़ाव से बचाव और अधिक बहुध्रुवीय मौद्रिक व्यवस्था की ओर कदम के रूप में देखा जा रहा है।
- अमेरिकी राजकोषीय चिंताएं: अमेरिकी सरकारी कर्ज में तेज बढ़ोतरी, जो हाल ही में 34 ट्रिलियन डॉलर से अधिक हो गया, ने अमेरिकी राजकोषीय नीति की दीर्घकालीन टिकाऊ क्षमता पर चिंताएं बढ़ाई हैं। चीनी शोधकर्ताओं और अधिकारियों ने चेताया है कि लगातार बजट और व्यापार घाटे तथा राजनीतिक अनिश्चितता से सुरक्षित निवेश के रूप में अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड की विश्वसनीयता कमजोर हो सकती है।
चीन की रणनीति पर विशेषज्ञों की राय
वित्तीय विश्लेषकों का कहना है कि चीन का तरीका अचानक या टकरावपूर्ण होने के बजाय सोच-समझकर अपनाई गई रणनीति है। बैंक ऑफ अमेरिका सिक्योरिटीज के दर रणनीतिकार मार्क कबाना के अनुसार, चीन और जापान जैसे पारंपरिक विदेशी खरीदारों की मांग घटी है और निजी निवेशक तेजी से इस कमी को पूरा कर रहे हैं। डॉयचे बैंक के जॉर्ज सारावेलोस का मानना है कि अमेरिकी नीतियां, खासकर शुल्क बढ़ाने के कदम, अनजाने में बड़े विदेशी निवेशकों को अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड बेचने के लिए प्रोत्साहित कर रही हैं।
हालांकि, विशेषज्ञ इस धारणा से सावधान करते हैं कि चीन अपने ट्रेजरी बॉन्ड को "हथियार" बना रहा है। मर्केटर इंस्टीट्यूट फॉर चाइना स्टडीज (MERICS) का तर्क है कि अचानक बड़े पैमाने पर बिक्री से अमेरिका जितना ही चीन को भी नुकसान होगा, क्योंकि इससे उसके शेष भंडार का मूल्य घटेगा और वैश्विक वित्तीय संकट पैदा हो सकता है। इसके बजाय, चीन धीरे-धीरे हिस्सेदारी घटाकर अपनी मुद्रा को सहारा देना और जोखिम का प्रबंधन करना चाहता है, न कि अमेरिकी बाजारों को अस्थिर करना।
वैश्विक ट्रेजरी बाजार ने कैसी प्रतिक्रिया दी है?
चीन की हिस्सेदारी घटने के बावजूद, अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड में कुल विदेशी निवेश बढ़ता रहा है और मई 2025 में 9 ट्रिलियन डॉलर से अधिक के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। खासकर जापान और ब्रिटेन सहित अन्य देशों ने अपनी खरीद बढ़ाई है। ब्रिटेन की हिस्सेदारी बढ़कर 809.4 अरब डॉलर हो गई, जो 2000 के बाद पहली बार चीन से अधिक है। जापान 1.135 ट्रिलियन डॉलर के अमेरिकी सरकारी कर्ज के साथ सबसे बड़ा विदेशी धारक बना हुआ है।
यह बदलाव वैश्विक पूंजी प्रवाह में व्यापक परिवर्तन को दिखाता है। ब्रिटेन की बढ़ी हुई हिस्सेदारी का कारण अक्सर वैश्विक वित्तीय केंद्र के रूप में लंदन की भूमिका को माना जाता है, जहां हेज फंड और अन्य संस्थागत निवेशकों की परिसंपत्तियों का अभिरक्षण किया जाता है। इस बीच, कनाडाई और यूरोपीय निवेशकों ने भी अपनी खरीद बढ़ाई है और अमेरिकी शुल्क नीतियों के कारण पहले हुई पूंजी निकासी का रुख पलटा है।
बाजारों में उतार-चढ़ाव बढ़ा है, खासकर प्रमुख नीतिगत घोषणाओं और क्रेडिट रेटिंग में बदलाव के बाद। अप्रैल 2025 में मूडीज ने बढ़ते सरकारी कर्ज और ब्याज भुगतान का हवाला देते हुए अमेरिका की सॉवरेन क्रेडिट रेटिंग Aaa से घटाकर Aa1 कर दी। इस कदम से ट्रेजरी बॉन्ड पर प्रतिफल बढ़ा और बड़े पैमाने पर बिकवाली हुई, खासकर लंबी अवधि के बॉन्ड में। हालांकि, ट्रेजरी बॉन्ड के प्रतिफल को प्रभावित करने वाले बुनियादी कारक अमेरिकी व्यापक आर्थिक परिदृश्य और फेडरल रिजर्व की नीति ही हैं; व्यापार और भू-राजनीतिक जोखिम अनिश्चितता की अतिरिक्त परतें जोड़ते हैं।
चीन का पोर्टफोलियो: अल्पकालीन और दीर्घकालीन ट्रेजरी बॉन्ड
एक और उल्लेखनीय रुझान यह है कि चीन अब कम अवधि वाले ट्रेजरी बिलों में अधिक निवेश कर रहा है। ये अधिक तरल होते हैं और संकट के समय इन्हें जल्दी बेचा जा सकता है। उद्योग विशेषज्ञों का कहना है कि इस रणनीति से चीन दीर्घकालीन अमेरिकी राजकोषीय जोखिमों में अपना निवेश घटाते हुए लचीलापन बनाए रख सकता है। साथ ही, चीन ने अमेरिकी एजेंसी बॉन्ड और सोने जैसी अन्य परिसंपत्तियों में अपना निवेश बढ़ाया है, जिससे उसके भंडार में और विविधता आई है।
इसके जोखिम और निहितार्थ क्या हैं?
अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड में चीन की हिस्सेदारी में धीरे-धीरे हो रही कमी के दोनों देशों और वैश्विक वित्तीय प्रणाली पर महत्वपूर्ण असर पड़ सकते हैं।
- अमेरिका के लिए: चीन जैसे बड़े कर्जदाता की मांग घटने से अमेरिका की उधारी लागत बढ़ सकती है, खासकर अगर दूसरे विदेशी खरीदार इसकी पूरी भरपाई न करें। हालांकि, अब तक निजी निवेशकों और अन्य देशों ने इस कमी को पूरा किया है। जरूरत पड़ने पर अमेरिकी फेडरल रिजर्व बाजारों को स्थिर करने के लिए ट्रेजरी बॉन्ड खरीदकर हस्तक्षेप भी कर सकता है।
- चीन के लिए: ट्रेजरी बॉन्ड बहुत तेजी से बेचने से उलटा असर हो सकता है: चीन की बची हुई हिस्सेदारी का मूल्य घट सकता है और वैश्विक बाजार अस्थिर हो सकते हैं। चीन का संतुलित तरीका जोखिम प्रबंधन, अपनी मुद्रा को सहारा देने और भंडार में विविधता लाने की जरूरतों के बीच तालमेल बनाने का लक्ष्य रखता है।
- वैश्विक बाजारों के लिए: सोने और गैर-डॉलर मुद्राओं जैसी परिसंपत्तियों पर अधिक निर्भरता वाली बहुध्रुवीय मौद्रिक व्यवस्था की ओर बदलाव से समय के साथ अमेरिकी डॉलर का वर्चस्व घट सकता है। यह बदलाव धीरे-धीरे होने की संभावना है, लेकिन इससे वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में गहरे परिवर्तन झलकते हैं।
क्या चीन अपने ट्रेजरी बॉन्ड को "हथियार" बना सकता है?
आर्थिक विवादों में चीन अपने अमेरिकी कर्ज के विशाल भंडार को "परमाणु विकल्प" के तौर पर इस्तेमाल कर सकता है या नहीं, इस पर लंबे समय से बहस होती रही है। सिद्धांत रूप में, बड़े पैमाने पर बिकवाली से अमेरिकी वित्तीय बाजार अस्थिर हो सकते हैं और उधारी लागत बढ़ सकती है। लेकिन व्यवहार में, इस कदम से चीन को भी भारी नुकसान होगा और वैश्विक संकट का जोखिम पैदा होगा।
MERICS के विश्लेषकों के अनुसार, "चीन धीरे-धीरे अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड मुख्य रूप से युआन को स्थिर रखने के लिए बेच रहा है, क्योंकि व्यापार विवाद के चलते निवेशक अपना पैसा दूसरी जगह ले जा रहे हैं। अगर चीन यह रास्ता जारी रखता है, तो बाजार स्थिर रखने के लिए अमेरिकी फेडरल रिजर्व ये बॉन्ड खरीद सकता है, लेकिन अन्य देशों के बॉन्ड में चीन के निवेश बढ़ाने से डॉलर कमजोर होगा।"
अधिकांश विशेषज्ञ सहमत हैं कि चीन की मौजूदा रणनीति बाजारों में उथल-पुथल से बचते हुए चुपचाप अपना निवेश घटाने की है। इससे चीन वित्तीय टकराव भड़काए बिना अपने जोखिमों का प्रबंधन कर सकता है।
अमेरिका-चीन वित्तीय संबंधों का अगला रुख क्या होगा?
अमेरिका-चीन वित्तीय संबंधों के बदलते समीकरण वैश्विक बाजारों के लिए अहम विषय बने रहने की संभावना है। दोनों देशों के बीच व्यापार वार्ता ठहरी हुई है। दोनों पक्षों ने ऊंचे शुल्क लगाए हैं और रणनीतिक क्षेत्रों तक पहुंच सीमित की है। चीन ने अमेरिका से कृषि आयात घटाकर, दुर्लभ मृदा तत्वों के निर्यात पर पाबंदियां लगाकर और अमेरिकी कंपनियों की जांच शुरू करके जवाब दिया है। वहीं, अमेरिका ने सेमीकंडक्टर जैसी उन्नत प्रौद्योगिकियों के निर्यात पर प्रतिबंध लगाए हैं।
इन तनावों ने बाजारों में उतार-चढ़ाव बढ़ाया है और निवेशकों के लिए पोर्टफोलियो में विविधता के महत्व को रेखांकित किया है। दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं कुछ क्षेत्रों में एक-दूसरे से दूरी बढ़ा रही हैं और वैश्विक वित्तीय प्रणाली नई परिस्थितियों के अनुरूप ढल रही है।
दीर्घकालीन रुझान: क्या बहुध्रुवीय मौद्रिक व्यवस्था की ओर बढ़ रही है दुनिया?
अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड में चीन की हिस्सेदारी धीरे-धीरे घटाना, भंडार में विविधता लाने और अधिक बहुध्रुवीय मौद्रिक व्यवस्था की ओर बढ़ने के व्यापक रुझान का हिस्सा है। अपने स्वर्ण भंडार में वृद्धि और अन्य मुद्राओं में निवेश के जरिए चीन अमेरिकी वित्तीय और राजनीतिक दबावों के प्रति अपनी संवेदनशीलता घटाना चाहता है। वैश्विक व्यापार और निवेश प्रवाह में अधिक विविधता आने के साथ दूसरे देश भी इसी दिशा में बढ़ रहे हैं।
अमेरिकी डॉलर दुनिया की प्रमुख आरक्षित मुद्रा बना हुआ है, लेकिन वैश्विक भंडार में इसकी हिस्सेदारी हाल के वर्षों में घटी है। यूरो, युआन और अन्य मुद्राओं का उभार आर्थिक शक्ति के बदलते संतुलन को दिखाता है। फिलहाल अमेरिकी ट्रेजरी बाजार गहरा और तरल बना हुआ है, लेकिन दीर्घकालीन रुझान वैश्विक वित्त में बढ़ती प्रतिस्पर्धा और जटिलता की ओर इशारा करता है।
सारांश
- चीन ने अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड में अपनी हिस्सेदारी घटाकर 756.3 अरब डॉलर कर दी है, जो 2009 के बाद सबसे कम है। जापान और ब्रिटेन के बाद अब वह तीसरा सबसे बड़ा विदेशी धारक है।
- इस कमी के पीछे व्यापारिक तनाव, युआन को सहारा देने की जरूरत, भंडार में विविधता और अमेरिकी राजकोषीय स्थिति की टिकाऊ क्षमता को लेकर चिंताएं हैं।
- चीन की बिकवाली के बावजूद, अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड में कुल विदेशी निवेश रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गया है; अन्य देशों और निजी निवेशकों ने कमी पूरी की है।
- चीन की रणनीति धीरे-धीरे और जोखिम से बचने वाली है। इसका लक्ष्य वैश्विक बाजारों को अस्थिर किए बिना अपनी वित्तीय स्थिरता बनाए रखना है।
- यह बदलाव बहुध्रुवीय मौद्रिक व्यवस्था की ओर व्यापक रुझान और अमेरिका-चीन तनाव के बीच बाजारों में बढ़ते उतार-चढ़ाव को दिखाता है।
- अमेरिकी डॉलर का वर्चस्व अब भी कायम है, लेकिन वैश्विक वित्तीय परिदृश्य अधिक जटिल और प्रतिस्पर्धी होता जा रहा है।






