चीनी दबाव के बाद बैंकॉक की कला प्रदर्शनी पर सेंसरशिप: क्या हुआ?
जुलाई 2025 के आखिर में, बैंकॉक के प्रमुख कला केंद्रों में से एक, बैंकॉक आर्ट्स एंड कल्चरल सेंटर (BACC), अंतरराष्ट्रीय सेंसरशिप और कलात्मक स्वतंत्रता पर बढ़ते विवाद का केंद्र बन गया। यह विवाद तब शुरू हुआ जब Constellation of Complicity: Visualising the Global Machinery of Authoritarian Solidarity शीर्षक वाली प्रदर्शनी खुलने के कुछ ही दिनों बाद चीनी दूतावास के अधिकारी थाई शहर के अधिकारियों के साथ BACC पहुंचे। उनकी मांग थी कि उन कलाकृतियों और संदर्भों को हटाया या बदला जाए, जिनमें चीन के तिब्बत, शिनजियांग (जहां उइगर अल्पसंख्यक रहते हैं) और हांगकांग जैसे क्षेत्रों में जातीय अल्पसंख्यकों के साथ व्यवहार और राजनीतिक असहमति का जिक्र था।
विषय-सूची
- चीनी दबाव के बाद बैंकॉक की कला प्रदर्शनी पर सेंसरशिप: क्या हुआ?
- प्रदर्शनी को निशाना क्यों बनाया गया?
- चीन की आधिकारिक प्रतिक्रिया
- सेंसरशिप कैसे लागू हुई?
- कलाकार कौन हैं और क्या खो गया?
- कलाकारों ने उठाई आवाज़
- यह क्यों मायने रखता है? व्यापक असर
- क्षेत्रीय और वैश्विक संदर्भ
- जनता और कला समुदाय की क्या प्रतिक्रिया रही?
- दक्षिण-पूर्व एशिया में कलात्मक स्वतंत्रता का आगे क्या होगा?
- संक्षेप में
चीनी दूतावास और बैंकॉक मेट्रोपॉलिटन एडमिनिस्ट्रेशन, दोनों के दबाव में गैलरी ने मांग मान ली। कलाकृतियां हटा दी गईं, “Hong Kong,” “Tibet,” और “Uyghur” जैसे शब्दों पर काली स्याही फेर दी गई और कई कलाकारों के नाम मिटा दिए गए। इस सेंसरशिप ने अंतरराष्ट्रीय बहस छेड़ दी है और स्थानीय सांस्कृतिक स्थलों पर विदेशी सरकारों के प्रभाव, कलात्मक अभिव्यक्ति की सीमाओं और असंतुष्टों तथा निर्वासित कलाकारों की शरणस्थली के रूप में दक्षिण-पूर्व एशिया के भविष्य पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
प्रदर्शनी को निशाना क्यों बनाया गया?
विवाद के केंद्र में रही इस प्रदर्शनी का संयोजन म्यांमार पीस म्यूज़ियम ने किया था। इसमें दुनिया भर के कलाकारों की रचनाएं शामिल थीं, जिनमें चीन, हांगकांग, तिब्बत, शिनजियांग, ईरान, रूस और सीरिया से निर्वासन में रह रहे कलाकार भी थे। प्रदर्शनी का मुख्य विषय था कि किस तरह सत्तावादी सरकारें असहमति दबाने और सत्ता बनाए रखने के लिए सीमाओं के पार मिलकर काम करती हैं। इसमें मल्टीमीडिया इंस्टॉलेशन, फिल्में और ग्राफिक्स शामिल थे, जो राज्य की हिंसा, प्रतिरोध और सत्तावादी शासन के वैश्विक संबंधों पर सीधे बात करते थे।
सबसे संवेदनशील कृतियों में शामिल थीं:
- तिब्बती कलाकार तेनज़िन मिंग्युर पाल्ड्रोन का मल्टीमीडिया इंस्टॉलेशन, जिसमें तिब्बतियों के फ़िलिस्तीनी झंडे उठाने और नरसंहार के लिए जवाबदेही की मांग करने के वीडियो फुटेज शामिल थे।
- चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की तस्वीर वाले पोस्टकार्ड।
- तिब्बत और उइगर क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले झंडे।
- हांगकांग के कलाकार क्लारा चेउंग और गम चेंग यी मान तथा उइगर कलाकार मुकद्दस मिजित की कृतियां; इन सभी के नाम प्रदर्शनी से मिटा दिए गए या हटा दिए गए।
सह-संयोजक साई, जो म्यांमार के कलाकार और कार्यकर्ता हैं, के अनुसार प्रदर्शनी का उद्देश्य “वैश्विक सत्तावादी नेटवर्क का नक्शा तैयार करना” और यह दिखाना था कि चीन, रूस और ईरान जैसे शासन एक-दूसरे की दमनकारी रणनीतियों को कैसे मजबूत करते हैं। साई ने कहा कि विडंबना यह थी कि सत्तावादी एकजुटता पर बनी प्रदर्शनी को खुद सत्तावादी दबाव में सेंसर कर दिया गया।
चीन की आधिकारिक प्रतिक्रिया
चीन के विदेश मंत्रालय ने प्रदर्शनी के आयोजकों पर “तिब्बत, शिनजियांग और हांगकांग के बारे में उसकी नीतियों को तोड़-मरोड़कर पेश करने” और स्वतंत्रता आंदोलनों तथा राज्य के दमन को लेकर “भ्रामक दावे” फैलाने का आरोप लगाया। Bangkok Post की खबर के मुताबिक, मंत्रालय ने एक बयान में कहा:
चीन उन लोगों का विरोध करता है जो सांस्कृतिक और कलात्मक आदान-प्रदान को राजनीतिक हेरफेर और चीन के आंतरिक मामलों में दखल देने के बहाने के तौर पर इस्तेमाल करते हैं।
मंत्रालय ने चीनी दूतावास की प्रत्यक्ष भूमिका की न तो पुष्टि की, न ही इससे इनकार किया। हालांकि, उसने चीन के “मुख्य हितों और राजनीतिक गरिमा” को कमजोर होने से रोकने के लिए “समय पर कदम” उठाने पर थाईलैंड की सराहना की।
सेंसरशिप कैसे लागू हुई?
घटनाक्रम 24 जुलाई 2025 को प्रदर्शनी खुलने के महज तीन दिन बाद शुरू हुआ। चीनी दूतावास के कर्मचारी बैंकॉक के शहर अधिकारियों के साथ BACC पहुंचे और प्रदर्शनी बंद करने की मांग की। Reuters द्वारा देखे गए ईमेल और संदेशों के मुताबिक, गैलरी को चेतावनी दी गई कि प्रदर्शनी से थाईलैंड और चीन के बीच राजनयिक तनाव पैदा हो सकता है। यह दबाव थाईलैंड के विदेश मंत्रालय और प्रदर्शनी के मुख्य प्रायोजक बैंकॉक मेट्रोपॉलिटन एडमिनिस्ट्रेशन के जरिए पहुंचाया गया।
शुरू में गैलरी ने हांगकांग, तिब्बत और शिनजियांग के कलाकारों के नामों के साथ-साथ “Hong Kong,” “Tibet,” और “Uyghur” शब्दों पर काली स्याही फेरकर समझौता करने की कोशिश की। लेकिन चीनी दूतावास की आगे की मांगों के बाद पूरे इंस्टॉलेशन हटा दिए गए। इनमें तेनज़िन मिंग्युर पाल्ड्रोन के सभी वीडियो कार्य और राष्ट्रपति शी जिनपिंग से जुड़ी हर सामग्री शामिल थी। इन बदलावों के बाद भी दूतावास के अधिकारी अतिरिक्त सामग्री हटाने की मांग करने और संस्थान को “एक चीन नीति” का पालन करने की याद दिलाने के लिए गैलरी लौटे।
“एक चीन नीति” एक राजनयिक सिद्धांत है, जिसके तहत चीन के जनवादी गणराज्य को चीन की एकमात्र वैध सरकार माना जाता है। इसमें ताइवान, तिब्बत और शिनजियांग पर चीन के दावे भी शामिल हैं। थाईलैंड समेत अधिकांश देश बीजिंग के साथ आधिकारिक संबंधों में इस नीति का पालन करते हैं।
पत्रकारों के दौरों के दौरान, पहले सेंसर की गई कृतियां दिखाने वाले वीडियो मॉनिटर पर सिर्फ काली स्क्रीन दिखाई देती थी। उइगर कलाकारों की फिल्में उनके नाम छिपाकर चलाई गईं। गैलरी के कर्मचारी और संयोजक संभावित कार्रवाई के डर से सार्वजनिक रूप से टिप्पणी करने से बचते रहे। सह-संयोजक साई समेत कुछ लोग थाईलैंड छोड़कर चले गए, क्योंकि खबरों के मुताबिक थाई पुलिस उन्हें ढूंढने की कोशिश कर रही थी।
कलाकार कौन हैं और क्या खो गया?
इस सेंसरशिप से कई कलाकार प्रभावित हुए, जिनमें से अनेक ने अपनी सक्रियता या राजनीतिक विचारों के चलते वर्षों निर्वासन में बिताए हैं। इनमें शामिल हैं:
- तेनज़िन मिंग्युर पाल्ड्रोन (तिब्बती कलाकार): “Listen to Indigenous People” नाम की फिल्म समेत उनकी कृतियां हटा दी गईं। पाल्ड्रोन के इंस्टॉलेशन में दलाई लामा से जुड़े एक विवादित वायरल वीडियो की पृष्ठभूमि और मूलनिवासी अधिकारों तथा राज्य की हिंसा से जुड़े व्यापक मुद्दों को परखा गया था।
- मुकद्दस मिजित (उइगर कलाकार): प्रदर्शनी से उनका नाम मिटा दिया गया और शिनजियांग में उइगरों के दमन पर आधारित उनकी कृति में बड़े पैमाने पर बदलाव किए गए।
- क्लारा चेउंग और गम चेंग यी मान (हांगकांग के कलाकार): उनके नाम और हांगकांग के संदर्भ मिटा दिए गए तथा उनकी कृतियों में बदलाव किए गए।
सेंसर की गई अन्य कृतियों में चीन और इज़राइल द्वारा मुस्लिम समुदायों की निगरानी और दमन को जोड़ने वाले ग्राफिक्स तथा तिब्बत और उइगर क्षेत्र के झंडे शामिल थे। अब प्रदर्शनी की वेबसाइट पर इन कलाकारों का उल्लेख केवल उनके निवास के देश के नाम से किया गया है, जिससे उनकी पहचान और उनकी कृतियों का संदर्भ मिट गया है।
कलाकारों ने उठाई आवाज़
प्रेस को दिए बयानों में प्रभावित कलाकारों ने सेंसरशिप की निंदा की। तेनज़िन मिंग्युर पाल्ड्रोन ने Reuters से कहा:
मेरी कृति के अहम हिस्से हटाने के लिए गैलरी को मजबूर करके चीनी सरकार ने एक बार फिर दिखाया है कि वह तिब्बतियों को बाकी दुनिया से काट देना चाहती है और अन्य उपनिवेशवादों तथा नरसंहारों में अपनी मिलीभगत को मान्यता नहीं मिलने देना चाहती।
पाल्ड्रोन ने संग्रहालयों की भूमिका पर भी सवाल उठाते हुए कहा:
संग्रहालय जनता के लिए होने चाहिए, किसी भी विचारधारा के तानाशाहों के लिए नहीं।
सह-संयोजक साई ने इस स्थिति को “दुखद विडंबना” बताया। उन्होंने कहा कि थाईलैंड लंबे समय से असंतुष्टों की शरणस्थली रहा है, लेकिन अब वह “क्षेत्र के सभी निर्वासित कलाकारों और कार्यकर्ताओं को डराने वाला संदेश” दे रहा है।
यह क्यों मायने रखता है? व्यापक असर
BACC की घटना कोई अकेला मामला नहीं है। यह चीन के अपने सीमाओं से बाहर बढ़ते प्रभाव की व्यापक प्रवृत्ति को दर्शाती है, खासकर दक्षिण-पूर्व एशिया में, जहां सरकारें अक्सर बीजिंग के साथ आर्थिक सहयोग और राजनीतिक संप्रभुता तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ी चिंताओं के बीच संतुलन बनाती हैं।
अधिकार समूह और अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षक लंबे समय से चीन पर विदेशों में अपने आलोचकों को परेशान करने और दबाने का सुनियोजित अभियान चलाने का आरोप लगाते रहे हैं। इसमें राजनयिक दबाव, आर्थिक प्रभाव और कुछ मामलों में सीमा-पार दमन के जरिए असंतुष्टों, कार्यकर्ताओं और कलाकारों को चुप कराने की कोशिशें शामिल हैं। बीजिंग इन आरोपों को लगातार खारिज करता है और कहता है कि वह केवल अपनी संप्रभुता और आंतरिक मामलों की रक्षा कर रहा है।
चीनी मांगों के आगे थाईलैंड का झुकना खास तौर पर अहम है, क्योंकि उसका इतिहास पड़ोसी देशों के राजनीतिक निर्वासितों को शरण देने का रहा है। किसी विदेशी सरकार के कहने पर कला को सेंसर करने की थाईलैंड की तैयारी से देश की खुलेपन की परंपरा कमजोर पड़ने और उसकी सीमाओं के भीतर रह रहे असंतुष्टों की सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं।
क्षेत्रीय और वैश्विक संदर्भ
दक्षिण-पूर्व एशिया में चीन का बढ़ता प्रभाव व्यापार और निवेश से लेकर सांस्कृतिक कूटनीति और सुरक्षा सहयोग तक कई क्षेत्रों में दिखाई देता है। BACC की घटना विदेशों में आलोचनात्मक आवाज़ों को दबाने की चीन की कोशिशों से जुड़ी अन्य खबरों के बीच सामने आई है, जैसे न्यूज़ीलैंड और फिलीपींस में दक्षिण चीन सागर पर बनी डॉक्यूमेंट्री फिल्मों की स्क्रीनिंग रोकने की कोशिशें।
2025 की शुरुआत में थाईलैंड ने संयुक्त राष्ट्र की उन चेतावनियों के बावजूद चुपचाप 40 उइगरों को चीन निर्वासित कर दिया था, जिनमें कहा गया था कि उन्हें यातना और दुर्व्यवहार का गंभीर खतरा है। चीन ने शिनजियांग में दुर्व्यवहार के आरोपों को लगातार खारिज करते हुए उन्हें राजनीतिक मंशा से प्रेरित बताया है।
बैंकॉक की प्रदर्शनी पर सेंसरशिप यह भी दिखाती है कि वैश्विक कला जगत राजनीतिक दखल के प्रति कितना असुरक्षित है। जैसे-जैसे गैलरियां और संग्रहालय सरकारी फंडिंग या प्रायोजन पर अधिक निर्भर होते हैं, उन पर विवादित विषयों से बचने या असहमति जताने वाली आवाज़ों को चुप कराने का दबाव बढ़ सकता है। इस प्रवृत्ति से आलोचनात्मक चिंतन, प्रतिरोध और संवाद के मंच के रूप में कला की भूमिका खतरे में पड़ती है।
जनता और कला समुदाय की क्या प्रतिक्रिया रही?
इस सेंसरशिप पर थाईलैंड और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कलाकारों, कार्यकर्ताओं और अधिकार समूहों ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। कई लोग इसे एक खतरनाक मिसाल मानते हैं, जो क्षेत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दबाने की आगे की कोशिशों को बढ़ावा दे सकती है।
Hyperallergic और ArtReview जैसे कला-केंद्रित प्रकाशनों ने निर्वासन में रह रहे कलाकारों पर पड़ने वाले दमनकारी असर और वैश्विक कला समुदाय के लिए इसके व्यापक निहितार्थों पर जोर दिया है। ह्यूमन राइट्स फाउंडेशन और अन्य पैरवी करने वाले संगठनों ने कलात्मक स्वतंत्रता की बेहतर सुरक्षा और बुनियादी अधिकारों को कमजोर करने वाले बाहरी दबाव का विरोध करने की मांग की है।
कुछ थाई टिप्पणीकारों ने चिंता जताई है कि असहमति जताने वालों की सुरक्षित शरणस्थली के रूप में देश की प्रतिष्ठा खतरे में है। अन्य लोगों को आशंका है कि यह घटना आत्म-सेंसरशिप और शक्तिशाली विदेशी हितों के आगे झुकने की व्यापक प्रवृत्ति का संकेत है।
दक्षिण-पूर्व एशिया में कलात्मक स्वतंत्रता का आगे क्या होगा?
Constellation of Complicity प्रदर्शनी का भविष्य अनिश्चित बना हुआ है। BACC ने सार्वजनिक रूप से कोई टिप्पणी नहीं की है, लेकिन यह प्रदर्शनी भारी सेंसरशिप के साथ अक्टूबर 2025 तक चलने वाली है। संयोजक और कई कलाकार अपनी सुरक्षा के डर से थाईलैंड छोड़ चुके हैं।
इस घटना ने सांस्कृतिक संस्थानों की जिम्मेदारियों, राजनयिक प्रभाव की सीमाओं और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए जगहों की रक्षा की जरूरत पर नई बहस छेड़ दी है। चीन का वैश्विक प्रभाव बढ़ता रहने के साथ, ऐसी घटनाएं अन्य जगहों पर भी सामने आ सकती हैं। इससे समाजों को संप्रभुता, सेंसरशिप और सत्ता को चुनौती देने में कला की भूमिका से जुड़े कठिन सवालों का सामना करना पड़ेगा।
संक्षेप में
- चीनी दूतावास के अधिकारियों और थाई अधिकारियों के दबाव के बाद बैंकॉक आर्ट्स एंड कल्चरल सेंटर ने चीन की आलोचना करने वाली कलाकृतियों को सेंसर किया और हटा दिया।
- म्यांमार पीस म्यूज़ियम द्वारा संयोजित इस प्रदर्शनी का विषय सत्तावादी शासन था। इसमें तिब्बत, शिनजियांग, हांगकांग और अन्य जगहों के निर्वासित कलाकारों की कृतियां शामिल थीं।
- “Hong Kong,” “Tibet,” और “Uyghur” के संदर्भों के साथ कई कलाकारों के नामों पर काली स्याही फेर दी गई या उन्हें हटा दिया गया।
- चीन के विदेश मंत्रालय ने प्रदर्शनी पर उसकी नीतियों को तोड़-मरोड़कर पेश करने का आरोप लगाया और “समय पर कदम” उठाने के लिए थाईलैंड की सराहना की।
- कलाकारों और संयोजकों ने इस सेंसरशिप की निंदा करते हुए इसे दक्षिण-पूर्व एशिया में कलात्मक स्वतंत्रता और असहमति के लिए डराने वाला संकेत बताया।
- यह घटना विदेशों में चीन के बढ़ते प्रभाव और राजनीतिक दबाव के आगे सांस्कृतिक संस्थानों की असुरक्षा को उजागर करती है।
- अधिकार समूहों और वैश्विक कला समुदाय ने कलात्मक अभिव्यक्ति की बेहतर सुरक्षा और बाहरी सेंसरशिप के विरोध की मांग की है।






