कगार पर सीमा: 2025 में थाईलैंड-कंबोडिया संघर्षों ने दक्षिण-पूर्व एशिया को कैसे झकझोर दिया
2025 की गर्मियों में दक्षिण-पूर्व एशिया में एक दशक से भी अधिक समय का सबसे खतरनाक सीमा संघर्ष भड़क उठा। थाईलैंड और कंबोडिया के बीच लंबे समय से सुलगता क्षेत्रीय विवाद खुले युद्ध में बदल गया। इस लड़ाई में दर्जनों लोग मारे गए और लाखों लोग विस्थापित हुए। इससे न केवल क्षेत्रीय स्थिरता को खतरा हुआ, बल्कि थाईलैंड राजनीतिक उथल-पुथल में घिर गया, अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता की नाजुकता उजागर हुई और औपनिवेशिक दौर की सीमाओं के स्थायी घाव फिर सामने आए।
विषय-सूची
- कगार पर सीमा: 2025 में थाईलैंड-कंबोडिया संघर्षों ने दक्षिण-पूर्व एशिया को कैसे झकझोर दिया
- संघर्ष कैसे भड़का?
- तनाव बढ़ने की समयरेखा
- यह सीमा इतनी विवादित क्यों है?
- राष्ट्रवाद और ऐतिहासिक स्मृति
- मानवीय कीमत: गोलीबारी के बीच फंसे नागरिक
- थाईलैंड में राजनीतिक उथल-पुथल: शिनावात्रा सरकार पर संकट
- राजनयिक दांव-पेच और अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता
- स्थायी शांति क्यों इतनी मुश्किल है?
- आर्थिक और सामाजिक असर: पर्यटन, व्यापार और आजीविका
- मानवीय सहायता
- ऐतिहासिक विरासत और आगे का रास्ता
- सारांश
संघर्ष कैसे भड़का?
2025 के थाईलैंड-कंबोडिया सीमा संघर्ष की जड़ें सदियों पुरानी हैं, लेकिन तत्काल चिंगारी मई के आखिर में लगी। विवादित ढलान पर स्थित यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल प्रीह विहियर मंदिर के पास हुई झड़प में एक कंबोडियाई सैनिक मारा गया। दोनों पक्षों ने हिंसा के लिए एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराया और इस घटना के बाद तनाव तेजी से बढ़ा: कंबोडिया ने थाई सामान पर प्रतिबंध लगाया, थाईलैंड ने सीमा चौकियां बंद कर दीं और राजनयिक संबंध बिगड़ गए।
जुलाई तक तनाव चरम पर पहुंच गया। 23 जुलाई को उबोन रत्चथानी प्रांत में थाई गश्ती दल बारूदी सुरंग की चपेट में आ गया, जिसमें पांच सैनिक घायल हुए। थाईलैंड ने कंबोडिया पर नई सुरंगें बिछाने का आरोप लगाया, जबकि कंबोडिया ने कहा कि वे पिछली लड़ाइयों के दौरान बिछाई गई सुरंगों के अवशेष थे। अगले दिन ता मुएन थॉम मंदिर के पास बड़े पैमाने पर लड़ाई छिड़ गई, जो तेजी से 800 किलोमीटर लंबी सीमा पर कम-से-कम एक दर्जन स्थानों तक फैल गई।
तनाव बढ़ने की समयरेखा
दोनों पक्षों और अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों की रिपोर्टों के अनुसार, हिंसा तेजी से फैली:
- 24 जुलाई, सुबह-सुबह: दोनों पक्षों ने ता मुएन थॉम मंदिर के पास ड्रोन घुसपैठ और उकसावे की कार्रवाई के लिए एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराया।
- सुबह 8:20 बजे: खबरों के मुताबिक, कंबोडियाई बलों ने गोलीबारी शुरू की; थाईलैंड ने जवाबी कार्रवाई की।
- सुबह 10:30 बजे तक: कम-से-कम छह स्थानों पर झड़पें शुरू हो चुकी थीं। भारी हथियारों, तोपखाने और रॉकेटों का इस्तेमाल किया गया।
- थाई एफ-16 विमानों ने कंबोडियाई सैन्य ठिकानों पर बमबारी की, जबकि कंबोडिया ने थाई क्षेत्र में बीएम-21 रॉकेट दागे, जो नागरिक इलाकों में गिरे।
- दोपहर तक: थाई अधिकारियों ने सभी सीमा चौकियां बंद कर दीं और दोनों देशों ने अपने राजदूतों को वापस बुला लिया।
हिंसा में कम-से-कम 43 लोग मारे गए, जिनमें अधिकांश नागरिक थे, और सीमा के दोनों ओर 300,000 से अधिक लोग विस्थापित हुए। अस्पताल, स्कूल और घर नष्ट हो गए। तोपों और रॉकेटों की गोलाबारी से बचने के लिए लोग भागे तो पूरे-के-पूरे गांव खाली हो गए।
यह सीमा इतनी विवादित क्यों है?
थाईलैंड-कंबोडिया सीमा विवाद औपनिवेशिक दौर की संधियों और सदियों पुरानी प्रतिद्वंद्विता की विरासत है। सबसे ज्यादा विवाद प्रीह विहियर और ता मुएन थॉम मंदिरों को लेकर है। दोनों का निर्माण 9वीं से 12वीं सदी के बीच खमेर साम्राज्य ने कराया था। 19वीं सदी में जब फ्रांस ने कंबोडिया पर उपनिवेश बनाया, तो उसने सियाम (अब थाईलैंड) से क्षेत्र छोड़ने को मजबूर किया। इसका परिणाम 1907 की फ्रांको-सियामी संधि के रूप में सामने आया। इस संधि के तहत प्रीह विहियर मंदिर कंबोडिया को मिला, लेकिन आसपास की जमीन की स्थिति स्पष्ट नहीं हुई।
1953 में कंबोडिया की स्वतंत्रता के बाद थाईलैंड ने प्रीह विहियर मंदिर पर फिर कब्जा कर लिया। इसके बाद कंबोडिया यह विवाद अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (आईसीजे) में ले गया। 1962 में आईसीजे ने फैसला दिया कि मंदिर कंबोडिया का है, लेकिन उसके आसपास की सीमा स्पष्ट नहीं की। इस अस्पष्टता के कारण बार-बार झड़पें हुई हैं, जिनमें हालिया संघर्ष 2008–2011 और फिर 2025 में हुए।
राष्ट्रवाद और ऐतिहासिक स्मृति
दोनों ओर राष्ट्रवादी भावनाएं प्रबल हैं। कंबोडियाई लोगों का आरोप है कि थाई खमेर संस्कृति और क्षेत्र पर अपना दावा जताते हैं, जबकि थाई लोगों का तर्क है कि उनकी ऐतिहासिक विजय कुछ सीमावर्ती इलाकों पर उनके दावों को सही ठहराती है। 2008 में कंबोडिया द्वारा प्रीह विहियर को यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में दर्ज कराए जाने से तनाव फिर बढ़ गया। थाईलैंड ने इस कदम का विरोध किया और इसके बाद के वर्षों में दोनों पक्षों के बीच गोलीबारी हुई।
मानवीय कीमत: गोलीबारी के बीच फंसे नागरिक
2025 की झड़पें नागरिकों के लिए खास तौर पर विनाशकारी रहीं। तोपों और रॉकेटों के हमलों में अस्पताल, स्कूल, पेट्रोल पंप और घर निशाना बने। थाईलैंड के सुरिन और सीसाकेत प्रांतों में एक ही दिन में कम-से-कम 13 नागरिक और एक सैनिक मारे गए, जबकि दर्जनों अन्य घायल हुए। कंबोडियाई अधिकारियों ने भी ऐसी ही तबाही की खबर दी, हालांकि आधिकारिक हताहतों के आंकड़े तुरंत जारी नहीं किए गए।
300,000 से अधिक लोग विस्थापित हुए और लड़ाई से दूर अस्थायी शिविरों, पगोडाओं और स्कूलों में शरण लेने पहुंचे। बहुत से लोगों ने अपने घर और आजीविका खो दी। युद्धविराम के बाद भी हजारों लोग सैनिकों की तैनाती और फिर से हिंसा भड़कने के डर के कारण लौटने में असमर्थ या अनिच्छुक रहे।
उबोन रत्चथानी की निवासी फियान सोमस्री ने तोपों और रॉकेटों के हमलों के बीच घर से भागने का जिक्र करते हुए कहा: "मुझे बहुत चिंता है कि बम गिरने और गोली लगने से हम मारे जाएंगे। मुझे अपने लोगों, बच्चों, रिश्तेदारों और खास तौर पर लड़ रहे सैनिकों की चिंता है।"
थाईलैंड में राजनीतिक उथल-पुथल: शिनावात्रा सरकार पर संकट
सीमा पर लड़ाई जारी रहने के बीच थाईलैंड का राजनीतिक तंत्र उथल-पुथल में घिर गया। प्रभावशाली पूर्व नेता थाकसिन शिनावात्रा की बेटी, प्रधानमंत्री पेतोंग्तार्न शिनावात्रा को कंबोडिया के पूर्व प्रधानमंत्री हुन सेन के साथ फोन पर हुई बातचीत लीक होने के बाद पद से निलंबित कर दिया गया। बातचीत में वह अपनी ही सेना की कार्रवाई की आलोचना करती और हुन सेन के अनुरोधों का "ध्यान रखने" की पेशकश करती दिखीं। इससे उन पर देश के प्रति निष्ठा न रखने और शक्तिशाली थाई सेना को कमजोर करने के आरोप लगे।
संवैधानिक न्यायालय ने पेतोंग्तार्न को निलंबित कर दिया और गठबंधन के एक अहम साझेदार ने उनकी सरकार से समर्थन वापस ले लिया। प्यू थाई पार्टी के वफादार कार्यवाहक प्रधानमंत्री फुमथम वेचायाचाई के लिए व्यवस्था बनाए रखना मुश्किल हो गया। राष्ट्रवादी बयानबाजी तेज हो गई और विपक्षी दलों ने अविश्वास प्रस्ताव लाने की मांग की। इस संकट ने थाईलैंड के सत्तारूढ़ गठबंधन में गहरी दरारें उजागर कीं और एक और सैन्य तख्तापलट की आशंका बढ़ा दी, जो थाई राजनीति की बार-बार लौटने वाली विशेषता रही है।
आईएसईएएस–युसोफ इशाक इंस्टीट्यूट की एसोसिएट फेलो तिता संगली ने कहा, "उनकी पार्टी, फ्यू थाई, इस समय बहुत नाजुक स्थिति में है। सेना जो चाहती है, उसके साथ चलने के अलावा उनके पास ज्यादा विकल्प नहीं हैं।"
इस बीच, हाल ही में निर्वासन से लौटे थाकसिन शिनावात्रा पर राजशाही का अपमान करने और अपनी बेटी के प्रशासन को प्रभावित करने के नए आरोप लगे। विश्लेषकों ने कहा कि शिनावात्रा परिवार को मिलने वाला शाही संरक्षण शायद वापस ले लिया गया है, जिससे वे राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के निशाने पर आ सकते हैं।
राजनयिक दांव-पेच और अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता
सीमा संघर्ष में जल्द ही क्षेत्रीय और वैश्विक शक्तियां शामिल हो गईं। कंबोडिया ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से अपील करते हुए हिंसा को क्षेत्रीय शांति के लिए गंभीर खतरा बताया। सुरक्षा परिषद ने तत्काल एक बंद कमरे में बैठक की, जिसमें सदस्यों ने संयम और बातचीत की अपील की। आसियान (दक्षिण-पूर्व एशियाई राष्ट्रों का संगठन) के अध्यक्ष के रूप में मलेशिया ने चीन और अमेरिका के समर्थन से युद्धविराम कराने में मदद की।
28 जुलाई को कुआलालंपुर में हुए समझौते के तहत युद्धविराम ने सीमा पर सैनिकों की तैनाती रोक दी और पकड़े गए सैनिकों को तुरंत रिहा करने की मांग की। दोनों पक्षों ने नागरिकों और नागरिक बुनियादी ढांचे पर हमले रोकने का वादा किया। हालांकि, संघर्षविराम नाजुक बना रहा। इसके बाद के हफ्तों में छिटपुट झड़पें, बारूदी सुरंगों की घटनाएं और उल्लंघन के एक-दूसरे पर आरोप जारी रहे।
स्थायी शांति क्यों इतनी मुश्किल है?
अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के बावजूद, मूल मुद्दे अनसुलझे हैं। थाईलैंड ने सीमा पर अंतिम फैसला देने की कंबोडिया की आईसीजे से अपील को खारिज करते हुए द्विपक्षीय वार्ता पर जोर दिया है। आसियान की आंतरिक मामलों में दखल न देने की नीति शांति लागू कराने की उसकी क्षमता सीमित करती है। चीन का दोनों देशों पर प्रभाव है, लेकिन उसे कंबोडिया के ज्यादा करीब माना जाता है। इससे बैंकॉक और बीजिंग की क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं से सतर्क पड़ोसी देशों में चिंता बढ़ती है।
इस बीच, दोनों सरकारों ने राष्ट्रवादी समर्थन जुटाने और घरेलू चुनौतियों से ध्यान हटाने के लिए संकट का इस्तेमाल किया है। प्रधानमंत्री हुन मानेत और उनके पिता हुन सेन (जो अब सीनेट के अध्यक्ष हैं) के नेतृत्व वाले कंबोडिया ने आर्थिक मुश्किलों और विपक्ष की कमी के बीच अपनी वैधता मजबूत करने के लिए सीमा विवाद का सहारा लिया है। थाईलैंड में सेना और रूढ़िवादी गुटों ने इस संघर्ष का इस्तेमाल शिनावात्रा परिवार को कमजोर करने और अपना प्रभाव फिर स्थापित करने के लिए किया है।
आर्थिक और सामाजिक असर: पर्यटन, व्यापार और आजीविका
सीमा पर हुई झड़पों का दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर विनाशकारी असर पड़ा है, खासकर प्रभावित प्रांतों में। सिर्फ थाईलैंड के पर्यटन क्षेत्र को हर महीने करीब 92 मिलियन डॉलर का नुकसान हो रहा है। 5,000 से अधिक होटल कमरों की बुकिंग रद्द हो चुकी है और प्रमुख पर्यटन स्थल बंद हैं। जो होटल खुले हैं, उनमें पर्यटकों के बजाय राहतकर्मी और पत्रकार ठहरे हैं, जबकि समूह यात्राओं की बुकिंग ध्वस्त हो गई है।
सीमा पार व्यापार में भारी गिरावट आई है। सीमा चौकियां बंद हैं या सख्त नियंत्रण के तहत काम कर रही हैं। कंबोडिया ने थाई फल और सब्जियों के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया है, जबकि थाईलैंड ने कंबोडिया के साथ इंटरनेट और बिजली के संपर्क सीमित कर दिए हैं। दोनों ओर के स्थानीय कारोबारियों, किसानों और व्यापारियों को भारी नुकसान हुआ है। कई विस्थापित लोगों ने अपने घर और आय के साधन खो दिए हैं।
मानवीय सहायता
सरकारें और राहत संगठन विस्थापित लोगों को आश्रय, भोजन और चिकित्सा सहायता देने के लिए तेजी से काम कर रहे हैं। थाईलैंड के सुरिन प्रांत में कार्यवाहक प्रधानमंत्री फुमथम वेचायाचाई ने निकासी केंद्रों का दौरा किया और क्षतिग्रस्त घरों के लिए बढ़ा हुआ मुआवजा देने का वादा किया। स्थानीय अधिकारी नुकसान का आकलन कर रहे हैं और विस्थापित लोगों की चरणबद्ध वापसी की तैयारी कर रहे हैं, हालांकि सुरक्षा संबंधी चिंताओं के कारण कई लोग अब भी हिचक रहे हैं।
ऐतिहासिक विरासत और आगे का रास्ता
2025 का सीमा संघर्ष इस बात की स्पष्ट याद दिलाता है कि अनसुलझी औपनिवेशिक दौर की सीमाएं और राष्ट्रवादी राजनीति 21वीं सदी में भी हिंसा भड़का सकती हैं। कभी साझा विरासत के प्रतीक रहे प्रीह विहियर और ता मुएन थॉम मंदिर अब प्रतिद्वंद्विता और नाराजगी के केंद्र बन गए हैं। अंतरराष्ट्रीय अदालतों के बार-बार के फैसलों और मध्यस्थता के प्रयासों के बावजूद, सीमा की अस्पष्टता और राष्ट्रवादी आख्यानों का प्रभाव स्थायी शांति की राह में बाधा बने हुए हैं।
फर्स्टपोस्ट ने कहा, "प्रीह विहियर की त्रासदी यह है कि थाईलैंड और कंबोडिया, दोनों ने हिंदू मंदिर के इतिहास के विवादित पहलुओं पर जोर देना चुना है, न कि दोनों बौद्ध पड़ोसियों को जोड़ने की उसकी क्षमता पर।"
फिलहाल युद्धविराम कायम है, लेकिन स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है। दोनों देशों के सैनिक सीमा के पास तैनात हैं और नई बारूदी सुरंगों की घटनाओं समेत छिटपुट हिंसा नाजुक शांति के लिए खतरा बनी हुई है। विस्थापित परिवार सामान्य जीवन में लौटने की उम्मीद लगाए बैठे हैं, लेकिन कई लोगों को डर है कि कोई भी नई चिंगारी पल भर में संघर्ष फिर भड़का सकती है।
सारांश
- 2025 में थाईलैंड-कंबोडिया सीमा संघर्ष दशकों से अनसुलझे क्षेत्रीय विवादों, खासकर प्राचीन मंदिरों के आसपास, के बाद भड़का।
- 24–28 जुलाई तक चली लड़ाई में कम-से-कम 43 लोग मारे गए और 300,000 से अधिक विस्थापित हुए। हिंसा का सबसे ज्यादा असर नागरिकों पर पड़ा।
- संकट ने थाईलैंड की सरकार को अस्थिर कर दिया। प्रधानमंत्री पेतोंग्तार्न शिनावात्रा निलंबित हुईं और गहरे राजनीतिक मतभेद उजागर हुए।
- अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता से 28 जुलाई को युद्धविराम हुआ, लेकिन सैनिकों की तैनाती और छिटपुट झड़पों के बीच संघर्षविराम नाजुक बना हुआ है।
- संघर्ष ने स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं, खासकर पर्यटन और सीमा पार व्यापार, को तबाह कर दिया है। कई निवासी बेघर और भयभीत हैं।
- ऐतिहासिक शिकायतें, राष्ट्रवादी भावनाएं और औपनिवेशिक दौर की सीमाएं तनाव को बढ़ाती रहती हैं, जिससे स्थायी शांति दूर बनी हुई है।
- विवाद का शांतिपूर्ण समाधान करने के लिए दोनों देशों पर दबाव है, लेकिन मूल मुद्दे बने रहने से नए सिरे से हिंसा का खतरा अब भी अधिक है।






