जापान में ‘असमान संधि’ पर बवाल: ट्रंप का व्यापार समझौता और इसके दूरगामी परिणाम

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जापान में ‘असमान संधि’ पर बवाल: ट्रंप का व्यापार समझौता और इसके दूरगामी परिणाम

जापान और अमेरिका: व्यापार समझौते ने पुराने घाव कुरेदे

जापान और अमेरिका के बीच व्यापार वार्ता के ताज़ा दौर ने टोक्यो में राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया है। इससे उन “असमान संधियों” की यादें फिर ताज़ा हो गई हैं, जिन्होंने कभी पूर्वी एशिया और पश्चिमी शक्तियों के रिश्तों को परिभाषित किया था। विवाद के केंद्र में जापानी कारों के निर्यात पर अमेरिकी शुल्क में कथित कटौती है। जापानी अधिकारियों ने इसे उपलब्धि बताया, लेकिन अमेरिकी आधिकारिक दस्तावेज़ों में इसकी पुष्टि नहीं हुई। इस घटनाक्रम ने न सिर्फ जापान की घरेलू राजनीति को झकझोर दिया है, बल्कि अमेरिका-जापान गठबंधन और वैश्विक आर्थिक व्यवस्था के भविष्य पर भी सवाल खड़े किए हैं।

विषय-सूची
  1. जापान और अमेरिका: व्यापार समझौते ने पुराने घाव कुरेदे
  2. असमान संधियों पर बहस क्यों छिड़ी?
  3. इतिहास की गूंज: असमान संधियां क्या थीं?
  4. ट्रंप के व्यापार समझौते के केंद्र में क्या दांव पर है?
  5. जापान और अन्य देशों पर आर्थिक असर
  6. जापान में राजनीतिक असर: राष्ट्रवाद और गठबंधनों पर नए सिरे से विचार
  7. सुरक्षा तनाव: दबाव में गठबंधन
  8. वैश्विक असर: क्या आर्थिक दबाव का नया दौर शुरू हो रहा है?
  9. 19वीं सदी के उपनिवेशवाद से तुलना
  10. जापान के विकल्प: विदेश नीति और आर्थिक रणनीति पर नए सिरे से विचार
  11. विशेषज्ञों की राय: आगे क्या होगा?
  12. संक्षेप में

असमान संधियों पर बहस क्यों छिड़ी?

जापानी व्यापार वार्ताकार अकाज़ावा र्योसेई तत्काल बातचीत के लिए वॉशिंगटन लौटे। इसकी वजह थी कि ट्रंप प्रशासन ने एक अहम वादे की पुष्टि नहीं की थी: जापानी कारों पर अमेरिकी शुल्क को 27.5% से घटाकर 15% करना। प्रधानमंत्री शिगेरू इशिबा ने इसे बड़ी जीत बताया था, लेकिन लिखित समझौता न होने के कारण जापान के पास केवल मौखिक आश्वासन रह गए। यह अस्पष्टता जल्द ही इशिबा के लिए राजनीतिक मुसीबत बन गई। संसद (जापान की डाइट) में उन्हें तीखे सवालों का सामना करना पड़ा और शुल्क वास्तव में न घटाए जाने पर अविश्वास प्रस्ताव लाने की धमकी दी गई।

इस विवाद ने जापानी राजनीतिक विमर्श में “असमान संधि” शब्द को फिर प्रचलित कर दिया है। यह शब्द ऐतिहासिक रूप से 19वीं सदी में पश्चिमी शक्तियों द्वारा पूर्वी एशियाई देशों पर थोपी गई उन संधियों से जुड़ा है, जिनके पीछे अक्सर बल प्रयोग की धमकी होती थी। आज यह जापान के प्रभावशाली वर्गों में बेबसी और हताशा की भावना को दर्शाता है। उन्हें ट्रंप प्रशासन की रणनीति उन अपमानजनक संधियों जैसी लगती है।

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इतिहास की गूंज: असमान संधियां क्या थीं?

“असमान संधियों” से आशय 19वीं और 20वीं सदी की शुरुआत में एशियाई देशों—जैसे छिंग चीन, तोकुगावा जापान और जोसॉन कोरिया—और पश्चिमी शक्तियों के बीच हुए समझौतों की एक शृंखला से है। ये संधियां आम तौर पर सैन्य हार के बाद या धमकी के बीच की जाती थीं और उनकी शर्तें लगभग पूरी तरह एशियाई पक्ष पर थोपी जाती थीं। इनमें क्षेत्र सौंपना, हर्जाना देना, बंदरगाह खोलना, शुल्क तय करने का अधिकार छोड़ना और विदेशियों को अपने देश के कानूनों से छूट देना शामिल था। जापान में 1854 का कानागावा समझौता और 1858 की हैरिस संधि इस दौर की शुरुआत थे। इनके तहत देश को अपने बाज़ार खोलने और अपनी संप्रभुता सीमित करने के लिए मजबूर किया गया।

जापान की राष्ट्रीय चेतना में इन संधियों की स्मृति गहराई से बसी है। “असमान संधि” का मुहावरा खोई हुई संप्रभुता और राष्ट्रीय अपमान का सशक्त प्रतीक है। ट्रंप के व्यापार समझौते के संदर्भ में इसका फिर उभरना दुनिया में जापान की हैसियत और अमेरिका के साथ उसके रिश्ते को लेकर गहरी चिंता का संकेत है।

ट्रंप के व्यापार समझौते के केंद्र में क्या दांव पर है?

ट्रंप प्रशासन की व्यापार नीति “पारस्परिक शुल्क” पर आधारित रही है। इसमें व्यापारिक साझेदारों पर ऊंचे शुल्क लगाए जाते हैं और दबाव बनाने के लिए इससे भी अधिक शुल्क लगाने की धमकी दी जाती है। जापान के मामले में अमेरिका ने पहले कारों के निर्यात पर 27.5% शुल्क लगाने की धमकी दी और बाद में इसे घटाकर 15% करने की पेशकश की। इसके बदले जापान से बड़ी रियायतें मांगी गईं, जिनमें अमेरिका में निवेश बढ़ाना और अमेरिकी कृषि उत्पादों की खरीद बढ़ाना शामिल है।

प्रधानमंत्री इशिबा की सरकार ने शुरू में इस समझौते का जश्न मनाया। उसका दावा था कि इससे जापान के अहम वाहन उद्योग को सुरक्षा मिलेगी और महीनों की अनिश्चितता के बाद स्थिरता आएगी। लेकिन अमेरिका की ओर से लिखित प्रतिबद्धता न मिलने से जापान की सरकार जल्द ही राजनीतिक रूप से कमजोर पड़ गई। जापान के विपक्षी नेताओं ने इस मुद्दे को उठाते हुए चेतावनी दी है कि वॉशिंगटन के अलिखित वादों पर भरोसा करना जोखिम भरा है और यह अतीत की असमान संधियों के तहत देश की अधीनता की याद दिलाता है।

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जापान और अन्य देशों पर आर्थिक असर

जापान दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और कारों, इलेक्ट्रॉनिक्स तथा मशीनरी का बड़ा निर्यातक है। अमेरिका उसका सबसे बड़ा निर्यात बाज़ार है। बीबीसी के मुताबिक, अगर नया समझौता लागू होता है, तो अमेरिकी बाज़ार में जापानी कारें चीन जैसे प्रतिद्वंद्वियों की कारों के मुकाबले सस्ती होंगी। इससे टोयोटा, होंडा और निसान जैसी जापानी वाहन कंपनियों को फायदा हो सकता है। इसके बदले जापान ने अमेरिका में 550 अरब डॉलर निवेश करने का प्रस्ताव रखा है, ताकि दवा और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों में अधिक मजबूत आपूर्ति शृंखलाएं बनाई जा सकें।

हालांकि, इस समझौते के आलोचक भी हैं। अमेरिकी वाहन निर्माताओं को चिंता है कि कनाडा और मेक्सिको में स्थित उनके कारखानों से आयात पर जापान की 15% दर की तुलना में अधिक शुल्क लगेगा। वहीं, जापानी किसानों को अमेरिकी कृषि उत्पादों के बढ़ते आयात से प्रतिस्पर्धा की चिंता है। समझौते को लेकर अनिश्चितता ने वित्तीय बाज़ारों को भी हिला दिया है और वैश्विक व्यापार नियमों की स्थिरता पर सवाल उठाए हैं।

जापान में राजनीतिक असर: राष्ट्रवाद और गठबंधनों पर नए सिरे से विचार

व्यापार समझौते के विवाद का जापान में तत्काल राजनीतिक असर पड़ा है। प्रधानमंत्री इशिबा के नेतृत्व पर सवाल उठ रहे हैं। विपक्षी दलों ने वादा किए गए शुल्क कटौती लागू न होने पर अविश्वास प्रस्ताव लाने की धमकी दी है। इशिबा की अपनी पार्टी के कुछ सदस्यों ने भी वार्ता संभालने के उनके तरीके की आलोचना की और कहा कि जापान को वॉशिंगटन के अलिखित समझौते स्वीकार नहीं करने चाहिए।

इस बहस से राष्ट्रवादी भावना को भी बल मिला है। कुछ नेताओं ने अधिक स्वतंत्र विदेश नीति की मांग की है। इसमें अमेरिका के साथ जापान के सुरक्षा गठबंधन पर फिर से विचार करना और यहां तक कि स्वतंत्र परमाणु प्रतिरोधक क्षमता की संभावना तलाशना शामिल है। सान्सेइतो पार्टी का उभार—जो अप्रवासी-विरोधी और अमेरिका-विरोधी बयानबाज़ी को जोड़ती है—जापान की मुख्यधारा की राजनीति में बदलाव का संकेत है। जनता भले ही बड़े बदलावों को लेकर सतर्क हो, लेकिन “असमान संधि” की भाषा का मुख्यधारा में आना बताता है कि जापान के प्रभावशाली वर्ग अमेरिका-जापान गठबंधन की बुनियाद पर नए सिरे से विचार कर रहे हैं।

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सुरक्षा तनाव: दबाव में गठबंधन

व्यापार विवाद का असर सुरक्षा के मुद्दों पर भी पड़ा है। राष्ट्रपति ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से अमेरिका-जापान सुरक्षा संधि की आलोचना करते हुए कहा है कि इसके तहत अमेरिका को जापान की रक्षा करनी पड़ती है, जबकि उसे बदले में ऐसी कोई गारंटी नहीं मिलती। इससे अमेरिकी समर्थन की विश्वसनीयता को लेकर जापान की चिंता बढ़ी है, खासकर तब जब अमेरिका अपनी रणनीतिक प्राथमिकता चीन और प्रशांत क्षेत्र की ओर कर रहा है। जापान ने रक्षा खर्च बढ़ाया है और सामूहिक आत्मरक्षा की अनुमति दी है, लेकिन ट्रंप प्रशासन के लेन-देन पर आधारित रवैये ने गठबंधन में भरोसा कमज़ोर किया है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा, “जापान के साथ हमारे बहुत अच्छे संबंध हैं, लेकिन जापान के साथ हमारा एक दिलचस्प समझौता है। हमें उनकी रक्षा करनी है, लेकिन उन्हें हमारी रक्षा नहीं करनी पड़ती।”

इस बात को जापान के कुछ नेताओं का समर्थन मिला है। उनका कहना है कि जापान को अपनी रक्षा की अधिक ज़िम्मेदारी उठानी चाहिए और अमेरिका पर निर्भरता घटानी चाहिए।

वैश्विक असर: क्या आर्थिक दबाव का नया दौर शुरू हो रहा है?

अमेरिका-जापान व्यापार विवाद कोई अकेला मामला नहीं है। ट्रंप प्रशासन ने यूरोपीय संघ से लेकर दक्षिण-पूर्व एशिया तक दुनिया भर के देशों पर दबाव बनाने के लिए शुल्कों का इस्तेमाल किया है। हर मामले में अमेरिका ने ऊंचे शुल्क लगाने की धमकी दी और फिर बड़ी रियायतों के बदले कम दरों की पेशकश की। आलोचकों का कहना है कि यह आर्थिक उपनिवेशवाद का नया रूप है, जिसमें एकतरफा समझौते थोपे जाते हैं और साझेदार देशों की कीमत पर अमेरिका को फायदा पहुंचता है।

उदाहरण के लिए, वियतनाम, इंडोनेशिया और फिलीपींस जैसे दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों पर ऐसे समझौतों के लिए दबाव डाला गया है, जिनमें अमेरिकी निर्यात पर शून्य शुल्क के साथ अमेरिका को अपने बाज़ारों तक पूरी पहुंच दी जाती है, जबकि उनके अपने सामान पर ऊंचे शुल्क स्वीकार करने पड़ते हैं। इससे क्षेत्रीय एकजुटता कमज़ोर हुई है और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में निष्पक्षता का सिद्धांत भी प्रभावित हुआ है।

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19वीं सदी के उपनिवेशवाद से तुलना

विश्लेषकों ने ट्रंप प्रशासन की रणनीति की तुलना 19वीं सदी की “गनबोट कूटनीति” से की है। उस दौर में पश्चिमी शक्तियां एशियाई देशों को असमान संधियों पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर करने हेतु सैन्य और आर्थिक दबाव डालती थीं। आज नौसैनिक ताकत की जगह आर्थिक ताकत ने ले ली है, लेकिन नतीजा मिलता-जुलता है: देशों को अमेरिका के साथ अधीनस्थ आर्थिक रिश्ते स्वीकार करने के लिए बाध्य किया जा रहा है।

थिंकचाइना में प्रकाशित एक टिप्पणी में कहा गया, “आज की अमेरिकी पारस्परिक शुल्क नीति को 21वीं सदी की असमान संधि का रूप कहा जा सकता है। तकनीकी तौर पर द्विपक्षीय समझौते बातचीत के जरिए होते हैं, लेकिन व्यवहार में अमेरिका अपनी विशाल आर्थिक ताकत और बाज़ार तक पहुंच का इस्तेमाल कर दूसरे देशों पर प्रतिकूल शर्तें स्वीकार करने का दबाव डालता है।”

इस रवैये से वैश्विक आर्थिक व्यवस्था पर पड़ने वाले दीर्घकालीन असर और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अमेरिका की विश्वसनीयता को लेकर भी चिंता बढ़ी है। विश्व व्यापार संगठन के भेदभाव-रहित व्यवहार और सर्वाधिक तरजीही राष्ट्र के सिद्धांत कमज़ोर पड़ रहे हैं, जबकि बहुपक्षीय व्यवस्थाओं पर भरोसा घट रहा है।

जापान के विकल्प: विदेश नीति और आर्थिक रणनीति पर नए सिरे से विचार

व्यापार वार्ता लंबी खिंचने के साथ जापान को अपने भविष्य को लेकर कठिन फैसले लेने होंगे। क्या उसे अपने मुख्य सहयोगी और आर्थिक साझेदार के रूप में अमेरिका पर निर्भर रहना जारी रखना चाहिए, या अधिक स्वायत्तता हासिल करने और अपने रिश्तों में विविधता लाने की कोशिश करनी चाहिए? कुछ जापानी नेताओं ने यूरोप और अन्य एशियाई देशों के साथ करीबी रिश्तों की मांग की है, जबकि कुछ व्यापार और सुरक्षा के मामलों में अधिक दृढ़ रुख अपनाने के पक्ष में हैं।

जापान पहले से ही कई प्रमुख क्षेत्रीय व्यापार समझौतों का सदस्य है, जिनमें व्यापक और प्रगतिशील ट्रांस-पैसिफिक साझेदारी समझौता (CPTPP) और क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी (RCEP) शामिल हैं। ये व्यवस्थाएं अमेरिका के साथ द्विपक्षीय समझौतों के विकल्प देती हैं और अमेरिकी दबाव के प्रति जापान की संवेदनशीलता घटाने में मदद कर सकती हैं। हालांकि, जापानी निर्यातकों के लिए, खासकर वाहन और इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्रों में, अमेरिकी बाज़ार अब भी बेहद अहम है।

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विशेषज्ञों की राय: आगे क्या होगा?

ट्रंप के व्यापार समझौते के दीर्घकालीन असर को लेकर विशेषज्ञों की राय बंटी हुई है। कुछ का मानना है कि लागू होने पर यह समझौता वैश्विक बाज़ारों में स्थिरता और निश्चितता लाएगा, जिससे कारोबारियों को योजना बनाने और निवेश करने में मदद मिलेगी। दूसरे विशेषज्ञों की चेतावनी है कि समझौता बुनियादी तौर पर असंतुलित है और भविष्य की व्यापार वार्ताओं के लिए खतरनाक मिसाल बन सकता है।

हडसन इंस्टीट्यूट के वरिष्ठ फेलो राइली वाल्टर्स ने लिखा, “अमेरिका-जापान वार्ता एक दिलचस्प अध्ययन का विषय होगी। कुछ मायनों में, दूसरी सरकारें इससे सीख सकती हैं कि व्यापार और आर्थिक मामलों पर ट्रंप प्रशासन के साथ कैसे बातचीत की जाए। लेकिन अमेरिका और जापान का रिश्ता अनूठा भी है। ज़्यादातर देशों के अमेरिका के साथ वैसे आर्थिक, सुरक्षा या राजनीतिक संबंध नहीं हैं, जैसे जापान के हैं।”

इस बीच, जापान में “असमान संधि” की भाषा का मुख्यधारा में आना बताता है कि वहां के प्रभावशाली वर्ग अब अमेरिकी समर्थन को तय मानकर नहीं चल रहे। ट्रंप प्रशासन के लेन-देन पर आधारित रवैये ने जापान को अपने विदेश नीति के विकल्पों पर फिर से विचार करने और अधिक अनिश्चित भविष्य के लिए तैयार रहने को मजबूर किया है।

संक्षेप में

  • अमेरिका-जापान व्यापार समझौते ने टोक्यो में राजनीतिक संकट पैदा किया है और 19वीं सदी में पश्चिमी शक्तियों द्वारा थोपी गई “असमान संधियों” की यादें ताज़ा कर दी हैं।
  • अमेरिका की ओर से कारों पर शुल्क घटाने की लिखित प्रतिबद्धता न मिलने पर जापान की सरकार को घरेलू विरोध का सामना करना पड़ रहा है। विपक्षी नेताओं ने अविश्वास प्रस्ताव लाने की धमकी दी है।
  • इस विवाद से राष्ट्रवादी भावना बढ़ी है और अधिक स्वतंत्र जापानी विदेश नीति की मांग तेज हुई है। इसमें अमेरिका-जापान सुरक्षा गठबंधन पर फिर से विचार करना भी शामिल है।
  • आलोचकों की नज़र में ट्रंप प्रशासन का दबाव बनाने के लिए शुल्कों का इस्तेमाल आर्थिक उपनिवेशवाद का नया रूप है, जो बहुपक्षीय व्यापार नियमों और वैश्विक भरोसे को कमज़ोर कर रहा है।
  • गठबंधन के भविष्य को लेकर अनिश्चितता बढ़ने के बीच जापान को तय करना होगा कि वह अमेरिका पर निर्भरता जारी रखेगा या अपने आर्थिक और कूटनीतिक रिश्तों में विविधता लाएगा।
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