इंडोनेशिया का कचरा प्रबंधन संकट: एक तात्कालिक राष्ट्रीय चुनौती
दुनिया का चौथा सबसे अधिक आबादी वाला देश इंडोनेशिया, कचरा प्रबंधन के गहराते संकट का सामना कर रहा है। देश के केवल लगभग 10 प्रतिशत कचरे का उचित प्रसंस्करण हो पाता है। देशभर के लैंडफिल तेजी से अपनी क्षमता के करीब पहुंच रहे हैं और पर्यावरण प्रदूषण चिंताजनक स्तर तक पहुंच रहा है। विशेषज्ञों की चेतावनी है कि तत्काल और व्यापक कदम नहीं उठाए गए तो देश के लैंडफिल 2030 तक अपनी अधिकतम क्षमता तक पहुंच सकते हैं। इससे जनस्वास्थ्य, पर्यावरण और स्थिरता के प्रति इंडोनेशिया की वैश्विक प्रतिबद्धताएं खतरे में पड़ सकती हैं।
विषय-सूची
- इंडोनेशिया का कचरा प्रबंधन संकट: एक तात्कालिक राष्ट्रीय चुनौती
- इंडोनेशिया इस स्थिति तक कैसे पहुंचा? कचरा प्रबंधन की खाई को समझना
- खुले में कचरा जलाना: व्यापक और खतरनाक चलन
- प्लास्टिक कचरा और माइक्रोप्लास्टिक: पर्यावरण के लिए बढ़ता खतरा
- खाद्य कचरा: इंडोनेशिया के कचरे में छिपा सबसे बड़ा हिस्सा
- सरकारी प्रतिक्रिया: नए लक्ष्य, नियम और तकनीकें
- नवाचार और निजी क्षेत्र की भूमिका
- प्रगति की बाधाएं: ढांचा, शासन और जन-जागरूकता
- क्षेत्रीय और वैश्विक संदर्भ: सबक और अवसर
- संक्षेप में
उप पर्यावरण मंत्री डियाज़ हेंड्रोप्रियनो ने हाल में स्थिति की गंभीरता को रेखांकित करते हुए कहा कि कचरा प्रबंधन की बेहद कम दर के कारण हर साल 34 मिलियन टन कचरा पर्यावरण को प्रदूषित कर रहा है। इसके दूरगामी परिणाम सामने आ रहे हैं: नदियों, जलस्रोतों और यहां तक कि मानव अपरा तथा स्तन के दूध में भी माइक्रोप्लास्टिक पाया गया है। बहुत देर होने से पहले कचरा प्रबंधन प्रणाली में व्यापक बदलाव के लिए सरकार, कारोबारी क्षेत्र और जनता को मिलकर काम करना होगा।
इंडोनेशिया इस स्थिति तक कैसे पहुंचा? कचरा प्रबंधन की खाई को समझना
इंडोनेशिया में हर साल अनुमानित 56.6 मिलियन टन कचरा पैदा होता है, जिसमें करीब 10.8 मिलियन टन, यानी लगभग 20 प्रतिशत, प्लास्टिक है। सरकार के महत्वाकांक्षी लक्ष्यों के बावजूद कचरा प्रबंधन की वास्तविक दर लगातार कम बनी हुई है। पर्यावरण मंत्री हनीफ फैसल नूरोफिक के मुताबिक, 343 लैंडफिल के निरीक्षण में पता चला कि केवल 9 से 10 प्रतिशत कचरे का प्रभावी ढंग से प्रबंधन होता है। यह आंकड़ा हर स्थल पर पुनर्चक्रण और पुनर्प्राप्ति सुविधाओं की उपलब्धता और क्षमता का आकलन करके निकाला गया है।
इंडोनेशिया के ज्यादातर लैंडफिल में अब भी खुले में कचरा डालने की व्यवस्था है। इससे न केवल लैंडफिल की जगह तेजी से भरती है, बल्कि मीथेन उत्सर्जन में भी काफी बढ़ोतरी होती है। यह ग्रीनहाउस गैस 100 साल की अवधि में कार्बन डाइऑक्साइड से 34 गुना तक अधिक गर्मी रोक सकती है। इस कारण खुले में कचरा डालना वैश्विक तापमान वृद्धि का एक बड़ा कारण है।
2017 में तत्कालीन राष्ट्रपति जोको विडोडो ने 2025 तक 100 प्रतिशत कचरा प्रबंधन का लक्ष्य रखने वाला राष्ट्रपति आदेश जारी किया था। इसके तहत 70 प्रतिशत कचरे का प्रबंधन छंटाई, संग्रह और उसे कच्चे माल या ऊर्जा में बदलकर किया जाना था, जबकि बाकी 30 प्रतिशत को पुनर्चक्रण के जरिए कम करना था। हालांकि, 2023 तक केवल 60.2 प्रतिशत कचरे के उचित प्रबंधन की सूचना दी गई थी। आंकड़ों के हालिया पुनर्मूल्यांकन में, जिसमें कुप्रबंधित लैंडफिल को शामिल नहीं किया गया, यह आंकड़ा घटकर केवल 39 प्रतिशत रह गया।
देश में जावा द्वीप 31 प्रतिशत पुनर्चक्रण दर के साथ सबसे आगे है। इसके बाद बाली-नुसा तेंगारा में 22.5 प्रतिशत और सुमात्रा में 12 प्रतिशत पुनर्चक्रण होता है। हालांकि, प्लास्टिक की राष्ट्रीय पुनर्चक्रण दर केवल 22 प्रतिशत है, जो प्रदूषण के बढ़ते प्रवाह को रोकने के लिए जरूरी स्तर से काफी कम है।
खुले में कचरा जलाना: व्यापक और खतरनाक चलन
इंडोनेशिया के कचरा संकट का एक सबसे चिंताजनक पहलू खुले में कचरा जलाने का व्यापक चलन है। सार्वजनिक कचरा निपटान और प्रबंधन सुविधाओं की कमी के चलते लगभग आधे (48 प्रतिशत) इंडोनेशियाई परिवार कचरा जलाते हैं, जबकि यह प्रतिबंधित है। इससे ब्लैक कार्बन, जो जलवायु के लिए एक शक्तिशाली प्रदूषक है, और तथाकथित “हमेशा बने रहने वाले रसायन” निकलते हैं। ये रसायन लंबी दूरी तक जा सकते हैं और मानव स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
लॉयड्स रजिस्टर फाउंडेशन के वर्ल्ड रिस्क पोल के अनुसार, कम आय वाले देशों में कुप्रबंधित कचरे से जुड़ी बीमारियों के कारण हर साल अनुमानित दस लाख मौतों के पीछे खुले में कचरा जलाना एक प्रमुख कारण है। लॉयड्स की साक्ष्य और अंतर्दृष्टि निदेशक नैन्सी हे ने खतरनाक खुले में कचरा जलाने की जगह बेहतर संग्रह ढांचे और नियंत्रित निपटान व्यवस्था की तत्काल जरूरत पर जोर दिया है।
प्लास्टिक कचरा और माइक्रोप्लास्टिक: पर्यावरण के लिए बढ़ता खतरा
इंडोनेशिया और पूरे दक्षिण-पूर्व एशिया में प्लास्टिक कचरा खास तौर पर गंभीर समस्या है। यह क्षेत्र प्लास्टिक प्रदूषण का वैश्विक केंद्र है और समुद्र में पहुंचने वाले प्लास्टिक कचरे में इंडोनेशिया का योगदान सबसे अधिक देशों में शामिल है। प्लास्टिक टिकाऊ होने के कारण दशकों तक पर्यावरण में बना रहता है और धीरे-धीरे टूटकर माइक्रोप्लास्टिक बन जाता है, जो पानी, मिट्टी और खाद्य शृंखलाओं को दूषित करता है।
वैज्ञानिक अध्ययनों में इंडोनेशिया की नदियों, तटीय जल और यहां तक कि समुद्री जीवों तथा मनुष्यों के शरीर में भी माइक्रोप्लास्टिक पाया गया है। खुले लैंडफिल और जलमार्गों में प्लास्टिक कचरे का जमाव न केवल जैव विविधता के लिए खतरा है, बल्कि इससे पारिस्थितिक विषाक्तता का जोखिम भी है और खाद्य सुरक्षा कमजोर होती है।
प्लास्टिक कचरे के प्रबंधन की कोशिशें सीमित ढांचे के कारण बाधित हैं, खासकर शहरी केंद्रों से बाहर। इंडोनेशिया के प्लास्टिक कचरे का केवल लगभग 10 प्रतिशत पुनर्चक्रित होता है। बाकी लैंडफिल में पहुंचता है, जलाया जाता है या पर्यावरण में फैल जाता है। 2017 में चीन द्वारा प्लास्टिक आयात पर प्रतिबंध लगाए जाने के बाद वैश्विक प्लास्टिक कचरा व्यापार का रुख बदल गया। इससे कम गुणवत्ता वाले प्लास्टिक कचरे की बड़ी मात्रा दक्षिण-पूर्व एशिया, जिसमें इंडोनेशिया भी शामिल है, की ओर मोड़ दी गई और स्थिति और बिगड़ गई।
खाद्य कचरा: इंडोनेशिया के कचरे में छिपा सबसे बड़ा हिस्सा
प्लास्टिक सुर्खियां बटोरता है, लेकिन इंडोनेशिया के घरेलू कचरे में सबसे बड़ा हिस्सा खाद्य कचरे का है। हर साल अनुमानित 20.8 मिलियन टन खाद्य कचरा पैदा होता है। खाद बनाने और लैंडफिल में डालने जैसे मौजूदा निपटान के तरीके पर्याप्त नहीं हैं। मीथेन उत्सर्जन और रिसाव से होने वाले प्रदूषण के कारण लैंडफिल का पर्यावरण पर सबसे अधिक असर पड़ता है।
ब्लैक सोल्जर फ्लाई के लार्वा से खाद बनाने, अवायवीय पाचन और तापीय उपचार जैसी उभरती तकनीकों में संभावनाएं हैं, लेकिन इनका इस्तेमाल अब भी सीमित है। खाद्य कचरे की समस्या से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए एकीकृत और व्यापक नियमों के साथ-साथ छोटे और बड़े, दोनों स्तरों की उपचार तकनीकों में निवेश की जरूरत है।
सरकारी प्रतिक्रिया: नए लक्ष्य, नियम और तकनीकें
संकट के पैमाने को देखते हुए इंडोनेशिया सरकार ने कचरा प्रबंधन के अपने लक्ष्यों में बदलाव किया है। राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो के नेतृत्व में 100 प्रतिशत कचरा प्रबंधन हासिल करने का लक्ष्य बढ़ाकर 2029 कर दिया गया है। नई राष्ट्रीय मध्यम अवधि विकास योजना (RPJMN) में 343 लैंडफिल में खुले में कचरा डालना बंद करने को प्राथमिकता दी गई है। पहले चरण में 37 स्थलों पर ध्यान दिया जाएगा और इन्हें छह महीने के भीतर पूरा करने का लक्ष्य है।
कचरा प्रबंधन को आधुनिक बनाने के लिए सरकार एक नया राष्ट्रपति आदेश तैयार कर रही है। इसमें समुद्री कचरे, कचरे से ऊर्जा उत्पादन और घरेलू कचरा प्रबंधन से जुड़े मौजूदा नियमों को एक साथ लाकर अद्यतन किया जाएगा। बड़े शहरों में, जहां पारंपरिक तरीके पर्याप्त नहीं हैं, उन्नत तकनीकों, खासकर कचरे से ऊर्जा बनाने वाले संयंत्रों (WTE), को बढ़ावा दिया जा रहा है। ये संयंत्र सभी प्रकार के कचरे को उच्च तापमान पर संसाधित कर बिजली में बदल सकते हैं और लैंडफिल में जाने वाले कचरे की मात्रा घटा सकते हैं।
ऊर्जा और खनिज संसाधन मंत्रालय का अनुमान है कि इंडोनेशिया कचरे से 3 गीगावाट तक बिजली पैदा कर सकता है। हालांकि, WTE संयंत्रों की आर्थिक व्यवहार्यता सब्सिडी और नियामकीय समर्थन पर निर्भर करती है, क्योंकि फिलहाल कचरे से बिजली बनाने की लागत औसत बाजार मूल्य से अधिक है।
नवाचार और निजी क्षेत्र की भूमिका
सरकार की कार्रवाई अहम है, लेकिन इंडोनेशिया में कचरा प्रबंधन के क्षेत्र में निजी क्षेत्र के नवाचार की भूमिका लगातार बढ़ रही है। Waste4Change जैसी कंपनियां पुनर्चक्रण, डिजिटल एकीकरण और अनौपचारिक कचरा संग्रहकर्ताओं के साथ सहयोग पर ध्यान देते हुए कचरा प्रबंधन के शुरू से अंत तक के समाधान विकसित कर रही हैं। उदाहरण के लिए, Waste4Change हर साल 8,000 टन से अधिक कचरे का प्रबंधन करती है और पांच साल के भीतर अपनी क्षमता बढ़ाकर प्रतिदिन 2,000 टन करने का लक्ष्य रखती है।
डिजिटल मंच और ऐप भी इस क्षेत्र को बदल रहे हैं। Waste4Change, E-Recycle, Rapel, Kepul और Octopus जैसे ऐप घरों और कारोबारों को कचरा संग्रहकर्ताओं से जोड़ते हैं, पुनर्चक्रण के लिए प्रोत्साहित करते हैं और कचरे के प्रवाह का पता लगाने की सुविधा देते हैं। ये मंच अनौपचारिक कचरा बीनने वालों (pemulungs) की भूमिका को औपचारिक स्वरूप देने में मदद करते हैं। वे सरकारी सुविधाओं से अधिक प्लास्टिक कचरा इकट्ठा करते हैं, लेकिन अक्सर असुरक्षित परिस्थितियों में काम करते हैं।
कचरा बीनने वालों को औपचारिक प्रणालियों से जोड़कर, प्रशिक्षण और उपकरण देकर तथा उचित पारिश्रमिक सुनिश्चित करके ये पहलें पुनर्चक्रण दर बढ़ाने के साथ-साथ सामाजिक कल्याण में भी सुधार करती हैं। पर्यावरण और वानिकी मंत्रालय स्टार्ट-अप और स्थानीय सरकारों के साथ साझेदारी कर रहा है, ताकि 2030 तक देश की कचरा संग्रह क्षमता तीन गुना की जा सके। राष्ट्रीय लक्ष्य हासिल करने में अनौपचारिक क्षेत्र की अहम भूमिका को स्वीकार करते हुए यह कदम उठाया जा रहा है।
प्रगति की बाधाएं: ढांचा, शासन और जन-जागरूकता
इन प्रयासों के बावजूद बड़ी बाधाएं बनी हुई हैं। कचरा प्रबंधन की कई सुविधाएं, खासकर ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में, छोड़ दी गई हैं या उनका पूरा इस्तेमाल नहीं हो रहा है। कचरा घटाने, दोबारा इस्तेमाल और पुनर्चक्रण के लिए बनी 70 प्रतिशत से अधिक सुविधाओं (TPS3R) तथा 40 प्रतिशत एकीकृत कचरा प्रबंधन सुविधाओं (TPST) की स्थिति अज्ञात है या वे काम नहीं कर रही हैं।
राष्ट्रीय और स्थानीय सरकारों के बीच बंटी जिम्मेदारियां, अपर्याप्त वित्तपोषण और कमजोर कानून प्रवर्तन जैसी शासन संबंधी चुनौतियां प्रगति में बाधा डालती हैं। जन-जागरूकता और लोगों का व्यवहार भी अहम भूमिका निभाते हैं। कचरे को बस इकट्ठा करने, ढोने और फेंकने का एकरेखीय तरीका अब भी जारी है। विकल्पों की कमी के कारण खुले में कचरा जलाने का चलन भी व्यापक है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इसके लिए एक व्यवस्थागत दृष्टिकोण जरूरी है, जिसमें कचरे के स्रोत पर ही प्रबंधन को प्राथमिकता दी जाए, शासन व्यवस्था में सुधार हो, क्षमता बढ़े और पर्याप्त धन सुनिश्चित किया जाए। लोगों के व्यवहार में बदलाव लाने और टिकाऊ कचरा प्रबंधन के लिए समर्थन जुटाने में सूचना अभियान, कानून का प्रवर्तन और समुदाय की भागीदारी अहम हैं।
क्षेत्रीय और वैश्विक संदर्भ: सबक और अवसर
इंडोनेशिया का कचरा संकट अकेला नहीं है। दक्षिण-पूर्व एशिया के अन्य देश भी ऐसी ही चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। तेजी से बढ़ता शहरीकरण, आबादी में वृद्धि और सीमित ढांचा कचरे तथा प्रदूषण को बढ़ा रहे हैं। समुद्री कचरे से निपटने की ASEAN क्षेत्रीय कार्ययोजना जैसी पहलों का मकसद सीमापार समस्याओं का समाधान करना और बेहतर कचरा प्रबंधन की क्षमता बढ़ाना है।
वैश्विक स्तर पर चक्रीय अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ना स्थिरता का रास्ता दे सकता है। इसमें सामग्रियों का दोबारा इस्तेमाल और पुनर्चक्रण करके उन्हें मूल्य शृंखला में बनाए रखा जाता है। लैंडफिल और भस्मीकरण के विकल्प के तौर पर रासायनिक पुनर्चक्रण, जैव अपघटनीय प्लास्टिक और अपसाइक्लिंग तकनीकों की पड़ताल की जा रही है। हालांकि, इन समाधानों की सफलता के लिए निवेश, नियामकीय समर्थन और जनता की भागीदारी जरूरी है।
इंडोनेशिया का अनुभव अनौपचारिक कचरा संग्रहकर्ताओं को व्यवस्था से जोड़ने, तकनीक का उपयोग करने और सरकार, निजी क्षेत्र तथा नागरिक समाज के बीच सहयोग बढ़ाने का महत्व दिखाता है। देश जब 2029 के लक्ष्य की दिशा में काम कर रहा है, तब यहां से मिले सबक पूरे क्षेत्र और उससे आगे की कचरा प्रबंधन रणनीतियों के लिए उपयोगी हो सकते हैं।
संक्षेप में
- इंडोनेशिया कचरा प्रबंधन के गंभीर संकट का सामना कर रहा है। केवल लगभग 10 प्रतिशत कचरे का उचित प्रसंस्करण होता है और लैंडफिल अपनी क्षमता के करीब पहुंच रहे हैं।
- खुले में कचरा डालना और जलाना व्यापक है, जिससे प्रदूषण, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन और स्वास्थ्य संबंधी जोखिम बढ़ते हैं।
- प्लास्टिक कचरा और माइक्रोप्लास्टिक पर्यावरण के लिए बड़े खतरे हैं। पुनर्चक्रण दर कम है और काफी कचरा समुद्रों तथा जलमार्गों में पहुंच रहा है।
- घरेलू कचरे में खाद्य कचरे का हिस्सा सबसे बड़ा है, लेकिन उसके निपटान के मौजूदा तरीके पर्याप्त नहीं हैं।
- सरकार ने 100 प्रतिशत कचरा प्रबंधन का लक्ष्य बढ़ाकर 2029 कर दिया है और नए नियमों तथा कचरे से ऊर्जा बनाने वाली तकनीकों को बढ़ावा दे रही है।
- निजी क्षेत्र के नवाचार, डिजिटल मंच और अनौपचारिक कचरा संग्रहकर्ताओं को व्यवस्था से जोड़ने से पुनर्चक्रण और कचरा प्रबंधन में सुधार हो रहा है।
- अपर्याप्त ढांचा, शासन संबंधी चुनौतियां और जन-जागरूकता की कमी प्रगति में बाधाएं हैं।
- दीर्घकालीन स्थिरता के लिए क्षेत्रीय सहयोग और चक्रीय अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ना जरूरी है।






