चीन का दुर्लभ मृदा निर्यात नियंत्रण: संकट में वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएँ और विकल्पों की तलाश

पढ़ने में 12 मिनट
Rare Earth Metal Disruptions: Impacts to High-Tech Supply Chain

चीन का दुर्लभ मृदा निर्यात नियंत्रण: वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में व्यवधान का नया दौर

अप्रैल 2025 में चीन ने सात दुर्लभ मृदा तत्वों और उनसे जुड़े उत्पादों, जिनमें उच्च-प्रदर्शन वाले चुंबक भी शामिल हैं, पर व्यापक निर्यात नियंत्रण लगा दिए। अमेरिका के साथ बढ़ते व्यापार तनाव और दंडात्मक शुल्कों के जवाब में लागू किए गए इन उपायों ने वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं को झकझोर दिया है। इन महत्वपूर्ण खनिजों के लिए चीन पर दुनिया की भारी निर्भरता उजागर हो गई है। ये खनिज इलेक्ट्रिक वाहनों, नवीकरणीय ऊर्जा, उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स और रक्षा प्रणालियों के लिए आवश्यक हैं। ऑटोमोबाइल से लेकर एयरोस्पेस तक के उद्योग अचानक पैदा हुई कमी और नौकरशाही की अड़चनों से निपटने की कोशिश कर रहे हैं।

विषय-सूची
  1. चीन का दुर्लभ मृदा निर्यात नियंत्रण: वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में व्यवधान का नया दौर
  2. चीन के निर्यात नियंत्रण कैसे लागू हुए
  3. दुर्लभ मृदा क्यों अहम है: आधुनिक तकनीक की रीढ़
  4. प्रशासनिक अव्यवस्था: लालफीताशाही और अंदरूनी राजनीति
  5. वैश्विक असर: वाहन उद्योग और उससे आगे
  6. आर्थिक और भू-राजनीतिक परिणाम
  7. यूरोप, भारत और विकल्पों की तलाश
  8. अमेरिका की दुविधा: घरेलू क्षमता फिर से खड़ी करना
  9. ऑस्ट्रेलिया और नए आपूर्तिकर्ताओं की तलाश
  10. आगे क्या? आपूर्ति में विविधता लाने की लंबी राह
  11. सारांश

दुर्लभ मृदा तत्व (REEs) रासायनिक रूप से एक-दूसरे से मिलती-जुलती 17 धातुओं का समूह हैं, जिनमें चुंबकीय, प्रकाशीय और उत्प्रेरक गुण विशिष्ट होते हैं। नाम के बावजूद, पृथ्वी की पर्पटी में ये अपेक्षाकृत प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं, लेकिन इन्हें निकालकर उपयोगी रूप में परिष्कृत करना जटिल, महंगा और पर्यावरण के लिहाज से चुनौतीपूर्ण है। खनन और प्रसंस्करण, दोनों में चीन के प्रभुत्व ने उसे दुनिया की दुर्लभ मृदा आपूर्ति शृंखला की धुरी बना दिया है। चीन वैश्विक उत्पादन का लगभग 60% और परिष्करण का करीब 90% नियंत्रित करता है।

चीन के निर्यात नियंत्रण कैसे लागू हुए

चीन की नई निर्यात व्यवस्था में सात दुर्लभ मृदा तत्वों और उनसे जुड़े उत्पादों को दोहरे उपयोग वाले निर्यात लाइसेंस प्रणाली में शामिल किया गया। इसका उद्देश्य अमेरिकी शुल्कों के जवाब में रणनीतिक कदम उठाना और जारी व्यापार विवाद में बीजिंग के दबदबे का प्रदर्शन करना था। हालांकि, इसे लागू करने में कई अप्रत्याशित जटिलताएँ आईं। चीनी अधिकारियों को निर्यात लाइसेंस आवेदनों की अचानक बढ़ी संख्या निपटाने में मुश्किल हुई। इसके चलते निर्यात कोड को लेकर भ्रम, खेपों की संरचना की पुष्टि में कठिनाई और सीमा शुल्क पर नौकरशाही देरी पैदा हुई।

उद्योग जगत के सूत्रों के अनुसार, चीनी नौकरशाही इन नियंत्रणों को लागू करने की जटिलता के लिए तैयार नहीं थी। ग्लोबल रेयर अर्थ इंडस्ट्री एसोसिएशन के संस्थापक नबील मांचेरी ने कहा:

इससे बीजिंग की नौकरशाही हैरान रह गई। उन्हें नहीं लगा था कि इसमें इतना काम होगा। चीन की ओर से मुझे जो सुनने को मिला है, उसके मुताबिक यह उनके लिए भी एक झटका था।

चीनी सीमा शुल्क के आंकड़ों के मुताबिक, मई 2025 में दुर्लभ मृदा चुंबकों की खेप अप्रैल की तुलना में 50% से अधिक घट गई। 2012 के बाद यह महीने-दर-महीने सबसे बड़ी गिरावट थी। प्रमुख खरीदारों को निर्यात में भारी कमी आई: जर्मनी को 55%, अमेरिका को 77%, दक्षिण कोरिया को 81% और जापान को 57%। इसका असर तुरंत और गंभीर रहा है: अमेरिका, जापान, भारत और यूरोप की वाहन निर्माता कंपनियों ने उत्पादन रोक दिया है या घटा दिया है। आपूर्ति शृंखला प्रबंधकों ने आगाह किया है कि भंडार घटने के साथ और व्यवधान हो सकते हैं।

विज्ञापन

दुर्लभ मृदा क्यों अहम है: आधुनिक तकनीक की रीढ़

उन्नत तकनीकों की एक विस्तृत शृंखला के लिए दुर्लभ मृदा अपरिहार्य है। नियोडिमियम, डिस्प्रोसियम और टर्बियम से बने उच्च-प्रदर्शन वाले चुंबक इलेक्ट्रिक वाहन मोटरों, पवन टर्बाइनों, लड़ाकू विमानों और यहां तक कि कार की सीटों व विंडशील्ड वाइपर चलाने वाली छोटी मोटरों में इस्तेमाल होते हैं। एक F-35 लड़ाकू विमान में करीब 900 पाउंड दुर्लभ मृदा होती है, जबकि वर्जीनिया श्रेणी की पनडुब्बी में 9,000 पाउंड से अधिक। स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ते रुझान और इलेक्ट्रिक वाहनों के प्रसार ने इन सामग्रियों की वैश्विक मांग और बढ़ा दी है।

चीन का प्रभुत्व सिर्फ खनन तक सीमित नहीं, बल्कि महत्वपूर्ण रूप से प्रसंस्करण और परिष्करण में भी है। देश के सरकारी समर्थन वाले उद्योग ने परिष्करण क्षमता, अनुसंधान और शिक्षा में भारी निवेश किया है, जिससे उसे लागत और तकनीक के मामले में मजबूत बढ़त मिली है। सिनोलिटिक्स के मैनेजिंग पार्टनर योस्ट वुबेके ने कहा:

पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था चीन के इन चुंबकों पर निर्भर है। अगर आप उनका निर्यात रोक दें, तो इसका असर पूरी दुनिया में महसूस होगा।

दशकों तक पश्चिमी देशों ने कम लागत और कम पर्यावरणीय नियमों के चलते अपने दुर्लभ मृदा उद्योगों को चीन जाने दिया। उदाहरण के लिए, अमेरिका अब अपने बहुत कम दुर्लभ मृदा चुंबक बनाता है और इसके बजाय चीन तथा कुछ हद तक जापान और वियतनाम से आयात पर निर्भर है।

प्रशासनिक अव्यवस्था: लालफीताशाही और अंदरूनी राजनीति

चीन के निर्यात नियंत्रण लागू करने में प्रशासनिक उलझनों और सरकार के भीतर मतभेदों ने बाधा डाली है। दोहरे उपयोग वाली निर्यात प्रणाली के तहत निर्यातकों को आगे के खरीदारों और उत्पादों के अंतिम उपयोग के बारे में विस्तृत जानकारी देनी होती है। इससे व्यापार वार्ताएँ जटिल हुई हैं और बौद्धिक संपदा को लेकर चिंताएँ बढ़ी हैं। सभी स्थायी दुर्लभ मृदा चुंबकों के लिए एक ही अंतरराष्ट्रीय उत्पाद कोड (HS कोड) इस्तेमाल होता है, चाहे उनमें नियंत्रित तत्व हों या नहीं। इससे चीनी बंदरगाहों पर भ्रम पैदा हुआ है और समय लेने वाली जाँच की जरूरत पड़ रही है।

प्रोजेक्ट ब्लू के डेविड मेरिमैन ने कहा कि निर्यातकों के लिए जरूरी परीक्षणों की संख्या चीनी आधिकारिक संस्थानों की क्षमता से अधिक हो गई है, जिससे प्रक्रिया और धीमी हुई है। कुछ खेपों को सूचीबद्ध दुर्लभ मृदा तत्वों की सूक्ष्म अशुद्धियों के कारण रोक दिया गया, भले ही उत्पादों में जानबूझकर इन तत्वों की मिश्रधातु न बनाई गई हो। अंदरूनी राजनीति ने भी भूमिका निभाई है: अलग-अलग सरकारी एजेंसियों में उपायों को कितनी सख्ती से लागू करना है, इसे लेकर मतभेद हैं। खास तौर पर, सुरक्षा तंत्र विदेशी कंपनियों को निर्यात लाइसेंस देने में हिचकिचा रहा है और अमेरिका के साथ व्यापार वार्ताओं में सौदेबाजी की ताकत बनाए रखना चाहता है।

चीन के वाणिज्य मंत्रालय ने मंजूरी की प्रक्रिया सरल करने का वादा किया है, लेकिन निर्यात लाइसेंस के केवल करीब एक चौथाई आवेदन मंजूर हुए हैं। प्रांतों के बीच प्रक्रियाएँ अब भी अपारदर्शी और असंगत हैं। कुछ लाइसेंस प्रक्रियागत आधार पर खारिज किए गए हैं, जबकि कुछ के लिए संवेदनशील जानकारी का खुलासा जरूरी है।

विज्ञापन

वैश्विक असर: वाहन उद्योग और उससे आगे

चीन के निर्यात नियंत्रण का सबसे तात्कालिक और स्पष्ट असर वैश्विक वाहन उद्योग पर पड़ा है। यूरोपीय वाहन आपूर्तिकर्ताओं के कारखाने और उत्पादन लाइनें पहले ही बंद हो चुकी हैं। भंडार खत्म होने पर और ठहराव की आशंका है। मई में शिकागो स्थित अपने कारखाने में फोर्ड को एक्सप्लोरर एसयूवी का उत्पादन एक सप्ताह के लिए रोकना पड़ा। जापानी वाहन निर्माता सुजुकी ने अपनी स्विफ्ट कार का उत्पादन निलंबित कर दिया। कुछ लाइसेंस मंजूर होने के बावजूद, सीमा शुल्क निकासी की धीमी गति और बनी हुई अनिश्चितता ने निर्माताओं को मुश्किल स्थिति में डाल दिया है।

यूरोपीय वाहन आपूर्तिकर्ता संघ (CLEPA) के महासचिव बेंजामिन क्रिगर ने चेतावनी दी:

वैश्विक आपूर्ति शृंखला एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई है। चीन के निर्यात प्रतिबंधों के चलते यूरोप के आपूर्तिकर्ता क्षेत्र में उत्पादन पहले ही बंद हो रहा है।

जर्मनी के वाहन उद्योग का प्रतिनिधित्व करने वाले VDA ने भी चिंता जताई है। उसने चेतावनी दी कि हालात नहीं सुधरे तो उत्पादन जल्द ठप हो सकता है। वाहन निर्माता अब दुर्लभ मृदा पर निर्भरता घटाने के तरीके तलाश रहे हैं और ऐसे मोटर विकसित कर रहे हैं जिनमें इन तत्वों की मात्रा बहुत कम हो या वे बिल्कुल न हों। हालांकि, इन समाधानों को बड़े पैमाने पर अपनाना अभी संभव नहीं है और वे लागत के लिहाज से भी व्यवहार्य नहीं हैं।

इस व्यवधान का असर वाहन क्षेत्र से आगे तक है। एयरोस्पेस निर्माता, सेमीकंडक्टर कंपनियाँ और सैन्य ठेकेदार सभी प्रभावित हैं। खास तौर पर, अमेरिकी रक्षा उद्योग असुरक्षित स्थिति में है, क्योंकि उन्नत हथियारों और संचार प्रणालियों के लिए दुर्लभ मृदा अहम है। चीन में अमेरिकन चैंबर ऑफ कॉमर्स के एक सर्वेक्षण में पाया गया कि 75% अमेरिकी कंपनियों को आशंका है कि उनका दुर्लभ मृदा भंडार तीन महीने के भीतर खत्म हो जाएगा।

विज्ञापन

आर्थिक और भू-राजनीतिक परिणाम

निर्यात नियंत्रणों से दुर्लभ मृदा की कीमतें बढ़ गई हैं। वैश्विक निर्यात की मात्रा में बड़ा बदलाव आया है और खरीद लागत बढ़ रही है। कमी के चलते अमेरिका, यूरोपीय संघ और भारत को विनिर्माण संबंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इससे दुर्लभ मृदा तत्वों पर निर्भर उद्योगों में आर्थिक मुश्किलें पैदा हुई हैं। हालात ने तत्काल कूटनीतिक प्रयासों को जन्म दिया है: अमेरिका और चीन व्यापार मतभेद सुलझाने के लिए बातचीत कर रहे हैं, जबकि यूरोपीय संघ अपनी कंपनियों के लाइसेंस जल्द मंजूर कराने की कोशिश कर रहा है।

चीन के कदमों को व्यापक रूप से व्यापार वार्ताओं में अपना दबदबा बनाए रखने की रणनीतिक कोशिश माना जा रहा है। गेवेकल ड्रैगोनॉमिक्स के संस्थापक साझेदार आर्थर क्रोएबर ने कहा:

इसकी काफी संभावना है कि वे वाणिज्यिक उपयोगकर्ताओं के लिए निर्यात फिर शुरू कर देंगे, लेकिन इतनी मात्रा में नहीं कि भंडार जमा किया जा सके।

फिलहाल, चीन की निर्यात लाइसेंस व्यवस्था अस्थायी शुल्क प्रतिक्रिया के बजाय स्थायी व्यवस्था बनती दिख रही है। टेनेओ के मैनेजिंग डायरेक्टर गेब्रियल वाइल्डौ ने चेतावनी दी कि आपूर्ति रोकने का खतरा लगातार बना रहेगा। यह वाशिंगटन और अन्य वैश्विक शक्तियों पर अपना दबदबा बनाए रखने के चीन के इरादे का संकेत है।

यूरोप, भारत और विकल्पों की तलाश

यूरोपीय संघ अपनी असुरक्षा से पूरी तरह वाकिफ है और दुर्लभ मृदा चुंबकों के लिए चीन पर 98% निर्भर है। यूरोपीय आयोग का लक्ष्य 2030 तक यूरोपीय संघ में 7,000 टन चुंबक बनाना है। एस्टोनिया और फ्रांस में खनन, परिष्करण और पुनर्चक्रण की नई परियोजनाएँ चल रही हैं। हालांकि, विशेषज्ञ आगाह करते हैं कि निकट भविष्य में चीन से पूरी तरह अलग होना नामुमकिन है और वैकल्पिक स्रोत विकसित करने में वर्षों लगेंगे।

दुनिया में दुर्लभ मृदा के पांचवें सबसे बड़े भंडार होने के बावजूद, भारत में उच्च-तकनीक अनुप्रयोगों के लिए इन्हें संसाधित करने की परिष्करण क्षमता नहीं है और वह चीनी निर्यात पर निर्भर बना हुआ है। अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और मध्य एशियाई देशों के साथ साझेदारी के जरिए आपूर्ति में विविधता लाने के प्रयास जारी हैं, लेकिन अब तक इनके उल्लेखनीय नतीजे नहीं मिले हैं।

G7 नेताओं ने दुर्लभ मृदा की कमी से पैदा आर्थिक और राष्ट्रीय सुरक्षा के खतरे को पहचाना है। उन्होंने जानबूझकर बाजार में व्यवधान पैदा करने की कोशिशों का मिलकर जवाब देने और उत्पादन व आपूर्ति में विविधता लाने का संकल्प लिया है। फिर भी, चीन की खदान से लेकर चुंबक तक की एकीकृत आपूर्ति शृंखला का पैमाना उसे कड़ी टक्कर देने वाला प्रतिस्पर्धी बनाता है।

विज्ञापन

अमेरिका की दुविधा: घरेलू क्षमता फिर से खड़ी करना

अमेरिका अब अपने दुर्लभ मृदा उद्योग को चीन जाने देने के नतीजों का सामना कर रहा है। दो दशक पहले, दुर्लभ मृदा चुंबक बनाने वाले अमेरिकी कारखाने विदेश चले गए। घरेलू उत्पादन फिर शुरू करने के प्रयासों में ऊँची लागत, पर्यावरण संबंधी चिंताओं और तकनीकी विशेषज्ञता की कमी के कारण बाधा आई है। अमेरिका की एकमात्र दुर्लभ मृदा खदान, कैलिफोर्निया की माउंटेन पास, चीन की कम लागत वाली प्रसंस्करण क्षमता से प्रतिस्पर्धा करने में संघर्ष करती रही है। हाल ही में उसने खदान स्थल पर ही दुर्लभ मृदा तत्वों को अलग करना शुरू किया है।

मैसाचुसेट्स की फीनिक्स टेलिंग्स जैसी नई कंपनियाँ देश में दुर्लभ मृदा धातुएँ बनाने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन उनका उत्पादन चीनी कारखानों की तुलना में बेहद कम है। उत्पादन बढ़ाने के लिए बड़े निवेश, सरकारी सहायता और समय की जरूरत होगी। कमी के इस दौर में ये सभी संसाधन सीमित हैं।

वाहन उद्योग के सलाहकार माइकल डन ने कहा:

चीन अमेरिका के वाहन असेंबली कारखानों को ठप कर सकता है।

ऑस्ट्रेलिया और नए आपूर्तिकर्ताओं की तलाश

इस उथल-पुथल के बीच ऑस्ट्रेलिया संभावित वैकल्पिक आपूर्तिकर्ता बनकर उभरा है। यहां दुर्लभ मृदा के समृद्ध भंडार हैं और सरकार का समर्थन बढ़ रहा है। देश नई खनन और प्रसंस्करण सुविधाओं में निवेश कर रहा है। चीन के बाहर की सबसे बड़ी उत्पादक कंपनी लायनस रेयर अर्थ्स पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया में माउंट वेल्ड खदान चलाती है और मलेशिया में दुर्लभ मृदा का परिष्करण करती है। इलुका रिसोर्सेज और अराफुरा रेयर अर्थ्स जैसी अन्य कंपनियाँ नए प्रसंस्करण संयंत्र बना रही हैं, जिनके विस्तार में सरकारी ऋण मदद कर रहे हैं।

हालांकि, ऑस्ट्रेलिया की अपनी चुनौतियाँ हैं। अधिकांश प्रसंस्करण अब भी विदेश में होता है और पर्यावरण संबंधी चिंताओं के चलते घरेलू परिष्करण क्षमता का विकास धीमा पड़ा है। पूरी तरह एकीकृत आपूर्ति शृंखला बनाने में वर्षों लगेंगे और फिलहाल चीन की लागत संबंधी बढ़त की बराबरी करना मुश्किल है।

दुर्लभ मृदा का पुनर्चक्रण भी एक विकल्प है, खासकर यूरोपीय संघ में, जिसका लक्ष्य 2050 तक पुनर्चक्रित सामग्रियों से अपनी मांग का 50% तक पूरा करना है। लेकिन मौजूदा बुनियादी ढाँचा अपर्याप्त है और कानूनी तथा वित्तीय बाधाएँ अब भी मौजूद हैं।

आगे क्या? आपूर्ति में विविधता लाने की लंबी राह

पिछले दशक में ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और कनाडा में नई परियोजनाओं के चलते वैश्विक दुर्लभ मृदा खनन में चीन की हिस्सेदारी 80% से घटकर 60% हुई है। फिर भी, बाजार में उसका दबदबा कायम है। वैकल्पिक आपूर्ति शृंखलाएँ बनाने के लिए व्यापक बुनियादी ढाँचे, अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों और सरकारी समर्थन की जरूरत होगी। इस प्रक्रिया में कम से कम एक दशक लगने का अनुमान है।

इस बीच, उद्योग सामग्री का भंडार जमा कर रहे हैं, दुर्लभ मृदा का इस्तेमाल घटाने के लिए अनुसंधान में निवेश कर रहे हैं और सरकारों से सहायता मांग रहे हैं। मौजूदा संकट ने दुर्लभ मृदा के रणनीतिक महत्व और किसी एक आपूर्तिकर्ता पर अत्यधिक निर्भरता के जोखिमों को उजागर किया है।

सारांश

  • दुर्लभ मृदा पर चीन के निर्यात नियंत्रणों से वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में गंभीर व्यवधान आया है, खासकर वाहन, इलेक्ट्रॉनिक्स और रक्षा क्षेत्रों में।
  • नौकरशाही की देरी, प्रशासनिक उलझनों और अंदरूनी राजनीति ने असर बढ़ाया है। निर्यात लाइसेंस के केवल कुछ ही आवेदन मंजूर हुए हैं।
  • अमेरिका, यूरोप और जापान के वाहन निर्माताओं ने उत्पादन रोक दिया है या घटा दिया है। भंडार खत्म होने के साथ उद्योगों ने और कमी की चेतावनी दी है।
  • इस संकट ने महत्वपूर्ण खनिजों के लिए चीन पर दुनिया की निर्भरता उजागर की है और वैकल्पिक आपूर्ति शृंखलाएँ बनाने की चुनौतियों को सामने रखा है।
  • अमेरिका, यूरोपीय संघ, ऑस्ट्रेलिया और भारत में आपूर्ति में विविधता लाने, नई खनन और प्रसंस्करण सुविधाओं में निवेश करने तथा पुनर्चक्रण क्षमता विकसित करने के प्रयास जारी हैं। लेकिन इन समाधानों को साकार होने में वर्षों लगेंगे।
  • व्यापार वार्ताओं में चीन के निर्यात नियंत्रण एक शक्तिशाली औजार बने रहने की संभावना है। आपूर्ति रोकने का खतरा वैश्विक उद्योगों के लिए बना रहेगा।
  • वैकल्पिक स्रोत सुरक्षित करने और निर्भरता घटाने की होड़ जारी है, लेकिन फिलहाल चीन दुनिया की दुर्लभ मृदा महाशक्ति बना हुआ है।
यह लेख शेयर करें

आपको यह भी पसंद आ सकता है