दक्षिण एशिया में प्रेस की स्वतंत्रता: घेराबंदी में एक क्षेत्र
प्रेस की स्वतंत्रता, लोकतंत्र और सार्वजनिक जवाबदेही का आधारस्तंभ, पूरे दक्षिण एशिया में अभूतपूर्व संकट का सामना कर रही है। इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट्स (IFJ) और अन्य वैश्विक संगठनों के सहयोग से तैयार एशिया प्रेस फ्रीडम रिपोर्ट 2024–2025 एक गंभीर तस्वीर पेश करती है: पत्रकारों को लगातार निशाना बनाया जा रहा है, मीडिया के अधिकारों का नियमित रूप से उल्लंघन हो रहा है और स्वतंत्र पत्रकारिता का पूरा ढांचा खतरे में है। यह लेख रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्षों की पड़ताल करता है, इसके मूल कारणों को देखता है और क्षेत्र के लोकतंत्र तथा समाज पर इसके व्यापक प्रभावों का विश्लेषण करता है।
विषय-सूची
- दक्षिण एशिया में प्रेस की स्वतंत्रता: घेराबंदी में एक क्षेत्र
- बढ़ते हमले और उल्लंघन: मानवीय कीमत
- कानूनी और राजनीतिक दबाव: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए सिकुड़ती जगह
- आर्थिक दबाव और रोजगार की अनिश्चितता
- सूचना तक पहुंच: बढ़ती चुनौती
- डिजिटल मीडिया: अवसर और जोखिम
- लैंगिक असमानता और भेदभाव
- देशवार: प्रेस की स्वतंत्रता की रैंकिंग और रुझान
- सुधार के प्रयास: संकट के बीच उम्मीद की किरणें
- व्यापक प्रभाव: खतरे में लोकतंत्र
- संक्षेप में
बढ़ते हमले और उल्लंघन: मानवीय कीमत
2024 से 2025 के बीच दक्षिण एशिया में मीडिया के अधिकारों के कम से कम 250 उल्लंघन दर्ज किए गए। पत्रकारों पर इसका गंभीर असर पड़ा: 69 को जेल में डाला गया या हिरासत में लिया गया और 20 ने काम के दौरान अपनी जान गंवाई—जो पिछले वर्षों की तुलना में नाटकीय वृद्धि है। बांग्लादेश फेडरल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (BFUJ) के अनुसार, बांग्लादेश में करीब 300 पत्रकार और मीडिया कर्मी घायल हुए, जिनमें से कई को विरोध प्रदर्शनों के दौरान गोली लगी। अफगानिस्तान में पत्रकारों और मीडिया संस्थानों के खिलाफ कम से कम 172 उल्लंघन दर्ज किए गए, जो देश में प्रेस की स्वतंत्रता की नाजुक स्थिति को रेखांकित करते हैं।
ये आंकड़े भय और डराने-धमकाने के व्यापक माहौल की केवल एक झलक देते हैं। पूरे क्षेत्र में पत्रकारों को धमकियों, उत्पीड़न और हिंसा का सामना करना पड़ता है, अक्सर कानून प्रवर्तन एजेंसियों या राजनीतिक ताकतों के हाथों। IFJ के अनुसार, रिपोर्ट प्रकाशित होने के समय कम से कम 19 पत्रकार सलाखों के पीछे थे, जबकि कई अन्य कानूनी उत्पीड़न या मनमानी हिरासत का सामना कर रहे थे।
कानूनी और राजनीतिक दबाव: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए सिकुड़ती जगह
दक्षिण एशिया की सरकारें स्वतंत्र पत्रकारिता को दबाने के लिए कानूनी और राजनीतिक औजारों का तेजी से इस्तेमाल कर रही हैं। भारत में डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) अधिनियम, 2023 लागू किए जाने से सार्वजनिक जानकारी तक पहुंच को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं। इस कानून को कथित तौर पर निजता की रक्षा के लिए बनाया गया है। सूचना का अधिकार अधिनियम में किए गए संशोधन अब अधिकारियों को ऐसी सामग्री रोकने की अनुमति देते हैं जिसे "व्यक्तिगत जानकारी" माना जाए। इससे सरकार को जवाबदेह ठहराने के प्रयास कमजोर पड़ सकते हैं।
पाकिस्तान में पत्रकारों के खिलाफ हिंसा में तेज बढ़ोतरी हुई है और 2024 दो दशकों का सबसे खतरनाक साल रहा। इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च, एडवोकेसी एंड डेवलपमेंट (IRADA) ने बताया कि पाकिस्तान में 250,000 से अधिक डिजिटल मीडिया कर्मियों के पास उचित वेतन या सुरक्षित कामकाजी परिस्थितियों के लिए कानूनी सुरक्षा नहीं है। आलोचनात्मक आवाजों को चुप कराने के लिए मानहानि कानूनों, देशद्रोह के आरोपों और आतंकवाद-रोधी कानूनों का व्यापक इस्तेमाल होता है, जिससे पत्रकारों में आत्म-सेंसरशिप बढ़ती है और खोजी पत्रकारिता पर दबाव पड़ता है।
श्रीलंका के विवादास्पद ऑनलाइन सेफ्टी अधिनियम की अस्पष्ट भाषा से यह आशंका बढ़ी है कि इसका इस्तेमाल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को दबाने के लिए किया जा सकता है। मालदीव में अटॉर्नी जनरल का कार्यालय सूचना अनुरोधों के अनुपालन को चुनौती दे रहा है, जिससे पत्रकारों को नौकरशाही की बाधाओं का सामना करना पड़ता है। बांग्लादेश में सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (ICT) अधिनियम, 2006 से साइबर सुरक्षा अधिनियम 2023 की ओर बदलाव से पारदर्शिता या पत्रकारों की सुरक्षा में बहुत कम सुधार हुआ है।
आर्थिक दबाव और रोजगार की अनिश्चितता
स्वतंत्र मीडिया की वित्तीय टिकाऊपन भी एक बड़ी चिंता है। विज्ञापन से होने वाली आमदनी में गिरावट, सरकारी दखल और डिजिटल मंचों के बढ़ते प्रभाव के कारण बड़े पैमाने पर नौकरियां गई हैं और कई मीडिया संस्थान बंद होने को मजबूर हुए हैं। कई पत्रकारों को बिना वेतन या अस्थिर परिस्थितियों में काम करना पड़ता है, खासकर तब जब मीडिया संस्थान सरकारी विज्ञापनों पर तेजी से निर्भर हो रहे हैं—एक ऐसा माध्यम जिसका इस्तेमाल अक्सर संपादकीय सामग्री को प्रभावित करने के लिए किया जाता है।
IFJ ने गिग वर्करों और फ्रीलांस पत्रकारों की बेहद अस्थिर स्थिति को रेखांकित किया है। उन्हें आर्थिक अनिश्चितता के साथ-साथ कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और डिजिटल बदलाव से जुड़ी चुनौतियों का भी सामना करना पड़ता है। भारत जैसे देशों में नई श्रम संहिताएं ठेका आधारित काम को बढ़ावा देती हैं, जिससे रोजगार की सुरक्षा और पेशेवर मानक और कमजोर होते हैं।
सूचना तक पहुंच: बढ़ती चुनौती
विश्वसनीय जानकारी तक पहुंच एक मौलिक अधिकार और लोकतांत्रिक भागीदारी की अनिवार्य शर्त है। फिर भी, पूरे दक्षिण एशिया में यह अधिकार खतरे में है। सरकारी अधिकारी अक्सर जवाब नहीं देते या पर्याप्त जानकारी देने में सक्षम नहीं होते, और पारदर्शिता को बढ़ावा देने के बजाय उस तक पहुंच सीमित करने के लिए कानूनी ढांचों का तेजी से इस्तेमाल किया जा रहा है।
भूटान में पारदर्शिता को बढ़ावा देने के लिए सरकार के दिशानिर्देश जारी करने के बावजूद, पत्रकारों का कहना है कि सरकारी प्रवक्ता अक्सर जवाब नहीं देते। हालांकि, भूटान की एक खास प्रथा इसे अलग पहचान देती है: प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल के सदस्य हर महीने मीडिया को जानकारी देते हैं—यहां तक कि वैश्विक स्तर पर भी एक दुर्लभ पहल। फिर भी, प्रेस की स्वतंत्रता की रैंकिंग में भूटान 2021 के 33वें स्थान से गिरकर 2025 में 152वें स्थान पर आ गया, जो दुनिया की सबसे बड़ी गिरावटों में से एक है।
डिजिटल मीडिया: अवसर और जोखिम
डिजिटल बदलाव ने वैकल्पिक मीडिया के लिए नए अवसर पैदा किए हैं। पूरे क्षेत्र में ब्लॉग, पॉडकास्ट और यूट्यूब चैनल तेजी से बढ़ रहे हैं। ये मंच ठहराव का शिकार पारंपरिक मीडिया को एक जवाबी विकल्प देते हैं और विविध आवाजों को जगह देते हैं। हालांकि, संपादकीय निगरानी और पेशेवर मानकों की कमी अब भी चिंता का विषय है, साथ ही गलत जानकारी और नफरत फैलाने वाली सामग्री का प्रसार भी।
टेलीग्राम और सिग्नल जैसे एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप निगरानी या सेंसरशिप के डर के बिना संवाद करने और खबरें प्रकाशित करने की कोशिश कर रहे पत्रकारों के लिए बेहद अहम हो गए हैं। फिर भी, AI उपकरणों का बढ़ता इस्तेमाल और राजनीतिक ताकतों द्वारा जानकारी में हेरफेर पत्रकारिता की विश्वसनीयता और मीडिया पर जनता के भरोसे के लिए नए जोखिम पैदा करते हैं।
लैंगिक असमानता और भेदभाव
एशिया प्रेस फ्रीडम रिपोर्ट मीडिया नेतृत्व में कायम लैंगिक अंतर को भी उजागर करती है। निर्णय लेने वाली भूमिकाओं में बहुत कम महिलाएं हैं और महिला पत्रकारों के साथ भेदभाव व्यापक है। विविधता की यह कमी न केवल पत्रकारिता की गुणवत्ता को कमजोर करती है, बल्कि सार्वजनिक विमर्श में शामिल दृष्टिकोणों को भी सीमित करती है।
देशवार: प्रेस की स्वतंत्रता की रैंकिंग और रुझान
रिपोर्ट में 2025 के लिए दक्षिण एशिया में प्रेस की स्वतंत्रता की रैंकिंग की चिंताजनक तस्वीर पेश की गई है:
- नेपाल: 90वां
- मालदीव: 104वां
- श्रीलंका: 139वां
- बांग्लादेश: 149वां
- भारत: 151वां
- भूटान: 152वां (2021 के 33वें स्थान से नीचे)
- पाकिस्तान: 158वां
- अफगानिस्तान: 175वां
ये रैंकिंग पत्रकारों को सीधे तौर पर झेलने वाले खतरों के साथ-साथ दंडमुक्ति, कानूनी पाबंदियों और आर्थिक दबावों के उस व्यापक माहौल को भी दर्शाती हैं, जो स्वतंत्र मीडिया को कमजोर करता है।
सुधार के प्रयास: संकट के बीच उम्मीद की किरणें
गंभीर स्थिति के बावजूद उम्मीद की कुछ किरणें भी हैं। कई देशों में सुधार के प्रयास जारी हैं:
- बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने सूचना तक पहुंच बढ़ाने और सरकारी संस्थानों का पुनर्निर्माण करने के लिए मीडिया सुधार नीति 2025 का मसौदा तैयार किया है।
- भारत के प्रस्तावित मीडिया पारदर्शिता विधेयक 2024 का उद्देश्य मीडिया के एकाधिकार से निपटना और सरकारी विज्ञापनों के वितरण को विनियमित करना है।
- भूटान निष्पक्ष और पारदर्शी विज्ञापन नीति के प्रस्ताव की समीक्षा कर रहा है और स्वतंत्र तथा डिजिटल पत्रकारिता के लिए सहायता तंत्र तलाश रहा है।
- नेपाल ने अपने सरकारी प्रसारकों को राष्ट्रीय सार्वजनिक सेवा प्रसारण एजेंसी में समेकित किया है। इस कदम का अधिक जवाबदेह सार्वजनिक मीडिया की दिशा में पहल के तौर पर स्वागत किया गया है।
- श्रीलंका के नए प्रशासन ने पत्रकारों के खिलाफ पिछले अपराधों पर कार्रवाई करने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कमजोर करने वाले कानूनों को निरस्त करने का वादा किया है।
ये पहलें उम्मीद जगाती हैं, लेकिन क्षेत्र में प्रेस की स्वतंत्रता के लगातार गिरते स्तर को पलटने के लिए निरंतर राजनीतिक इच्छाशक्ति, मजबूत कानूनी सुरक्षा और वास्तविक पारदर्शिता जरूरी होगी।
व्यापक प्रभाव: खतरे में लोकतंत्र
दक्षिण एशिया में प्रेस की स्वतंत्रता में गिरावट के दूरगामी परिणाम हैं। सत्ता को जवाबदेह ठहराने, भ्रष्टाचार उजागर करने और जनता की आकांक्षाओं को आवाज देने के लिए स्वतंत्र मीडिया जरूरी है। IFJ का कहना है:
प्रेस की स्वतंत्रता के बिना लोकतंत्र जीवित नहीं रह सकता। दक्षिण एशिया में स्वतंत्र पत्रकारिता को सत्तावादी नीतियों, सरकारी सेंसरशिप और न्याय को कमजोर करने के प्रयासों से लगातार खतरा है, फिर भी पत्रकार उनके खिलाफ खड़े माहौल में डटे हुए हैं। दक्षिण एशियाई मीडिया अब भी ऐसी परिस्थितियों में काम कर रहा है जहां सच को छिपाया जाता है, और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अपने मौलिक अधिकार के लिए संघर्ष कर रहा है। स्वतंत्र प्रेस को टिकाऊ बनाना और पत्रकारों के लिए व्यापक सुरक्षा सुनिश्चित करना पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गया है।
प्रेस की स्वतंत्रता का क्षरण न केवल पत्रकारों को खतरे में डालता है, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करता है, जनता के भरोसे को चोट पहुंचाता है और नागरिकों की सूचित निर्णय लेने की क्षमता सीमित करता है।
संक्षेप में
- दक्षिण एशिया में प्रेस की स्वतंत्रता तेजी से घट रही है। 2024 से 2025 के बीच कम से कम 250 उल्लंघन दर्ज किए गए और 20 पत्रकारों की मौत हुई।
- कानूनी, राजनीतिक और आर्थिक दबाव स्वतंत्र पत्रकारिता के लिए जगह सिकोड़ रहे हैं, जिससे आत्म-सेंसरशिप और रोजगार की असुरक्षा बढ़ रही है।
- सरकारी नीतियों और अधिकारियों की बेरुखी के कारण सूचना तक पहुंच तेजी से सीमित हो रही है।
- डिजिटल मीडिया नए अवसर देता है, लेकिन इसके साथ गलत जानकारी और निगरानी की कमी से जुड़े जोखिम भी हैं।
- पूरे क्षेत्र में मीडिया नेतृत्व में लैंगिक असमानता और भेदभाव कायम हैं।
- कई देशों में सुधार के प्रयास उम्मीद जगाते हैं, लेकिन उनकी सफलता के लिए मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति और कानूनी सुरक्षा जरूरी है।
- प्रेस की स्वतंत्रता में गिरावट दक्षिण एशिया में लोकतंत्र, सार्वजनिक जवाबदेही और सूचना के अधिकार के लिए गंभीर खतरा है।






