इंदिरा गांधी, संवैधानिक बदलाव और वह गणराज्य जो बन नहीं पाया

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इंदिरा गांधी, संवैधानिक बदलाव और वह गणराज्य जो बन नहीं पाया

आपातकाल: भारतीय लोकतंत्र का निर्णायक मोड़

जून 1975 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भारत में आपातकाल घोषित किया। यह देश के स्वतंत्रता-पश्चात इतिहास के सबसे विवादास्पद और परिवर्तनकारी दौरों में से एक था। नागरिक स्वतंत्रताएं निलंबित कर दी गईं, राजनीतिक विरोधियों को जेल में डाल दिया गया और प्रेस पर लगाम कस दी गई। आपातकाल को अक्सर उसके खुले अधिनायकवाद के लिए याद किया जाता है, लेकिन एक कम चर्चित, फिर भी उतनी ही अहम घटना थी: कांग्रेस सरकार की भारत की शासन-व्यवस्था को बुनियादी तौर पर बदलने की गुप्त कोशिश—संसदीय लोकतंत्र से केंद्रीकृत राष्ट्रपति प्रणाली की ओर।

विषय-सूची
  1. आपातकाल: भारतीय लोकतंत्र का निर्णायक मोड़
  2. इंदिरा गांधी की सरकार ने राष्ट्रपति प्रणाली पर विचार क्यों किया?
  3. नई व्यवस्था कैसी होती?
  4. 42वां संशोधन: राष्ट्रपति प्रणाली की छाया
  5. कांग्रेस के वफादार और नेतृत्व का व्यक्तिपूजक चलन
  6. आपातकाल के बाद: संसदीय लोकतंत्र की बहाली और मजबूती
  7. राष्ट्रपति प्रणाली की ओर फिर झुकाव
  8. राष्ट्रपति प्रणाली भारत में जड़ें क्यों नहीं जमा सकी?
  9. व्यापक मायने: आपातकाल की विरासत और शासन-व्यवस्था पर बहस
  10. सारांश

यह लेख इस कोशिश की शुरुआत, महत्वाकांक्षाओं और अंततः इसकी विफलता की पड़ताल करता है। इसमें नवीनतम ऐतिहासिक शोध और उस दौर के वृत्तांतों का सहारा लिया गया है। लेख देखता है कि आपातकाल संवैधानिक प्रयोगों की कसौटी कैसे बना, राष्ट्रपति प्रणाली की ओर बढ़ने के पीछे क्या प्रेरणाएं थीं और भारत के राजनीतिक परिदृश्य पर इसका स्थायी प्रभाव क्या पड़ा।

इंदिरा गांधी की सरकार ने राष्ट्रपति प्रणाली पर विचार क्यों किया?

1950 में अपनाए गए भारत के मूल संविधान ने ब्रिटिश व्यवस्था की तर्ज पर संसदीय लोकतंत्र स्थापित किया। सरकार के प्रमुख के रूप में प्रधानमंत्री निर्वाचित विधायिका के प्रति जवाबदेह थे, जबकि राष्ट्रपति मुख्यतः औपचारिक राष्ट्राध्यक्ष थे। इस व्यवस्था का उद्देश्य शक्तियों पर नियंत्रण और संतुलन सुनिश्चित करना था। स्वतंत्र न्यायपालिका और स्वतंत्र प्रेस अतिरिक्त सुरक्षा उपायों के तौर पर काम करते थे।

हालांकि, 1970 के दशक के मध्य तक यह व्यवस्था दबाव में आ गई थी। कांग्रेस पार्टी का वर्चस्व घट रहा था, गठबंधन की राजनीति बढ़ रही थी और न्यायपालिका कार्यपालिका की शक्ति पर अंकुश लगाने की अपनी भूमिका निभाने लगी थी। अदालत के एक फैसले से इंदिरा गांधी की अपनी स्थिति खतरे में पड़ गई थी, जिसने उनके चुनाव को अवैध ठहराया था। उनकी सरकार के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन भी बढ़ रहे थे। इस माहौल में गांधी के कुछ करीबी सलाहकारों और पार्टी के वफादार नेताओं ने यह तर्क देना शुरू किया कि भारत की संसदीय व्यवस्था देश की जरूरतों के अनुकूल नहीं है।

अनुभवी राजनयिक और गांधी के करीबी बी.के. नेहरू ने सितंबर 1975 में लिखे एक पत्र में यह विचार रखा। उन्होंने आपातकाल को “जनसमर्थन से हासिल अपार साहस और शक्ति का अद्भुत प्रदर्शन” बताया और कहा कि संसदीय लोकतंत्र निर्णायक शासन देने में विफल रहा है। नेहरू ने ऐसे सीधे निर्वाचित राष्ट्रपति की वकालत की जो विधायिका पर निर्भरता की बंदिशों से मुक्त हो और राष्ट्रीय हित में “कठिन, अप्रिय और अलोकप्रिय फैसले” ले सके। उन्होंने फ्रांस के चार्ल्स द गॉल के मॉडल का हवाला दिया, जहां पांचवें गणराज्य ने संसदीय अस्थिरता की जगह एक शक्तिशाली कार्यकारी राष्ट्रपति पद स्थापित किया था।

इन विचारों को कांग्रेस नेतृत्व में कई लोगों का समर्थन मिला। वे न्यायपालिका को “बाधा डालने वाली” और संसद को “प्रतीकात्मक समूहगान” मानते थे। हरियाणा के मुख्यमंत्री ने तो और भी साफ शब्दों में सुझाव दिया कि इंदिरा गांधी को बस “आजीवन राष्ट्रपति” बना दिया जाए।

नई व्यवस्था कैसी होती?

इन चर्चाओं से निकले प्रस्ताव आमूलचूल बदलाव वाले थे। नेहरू ने एक ही सात साल के राष्ट्रपति कार्यकाल, संसद और राज्य विधानसभाओं में आनुपातिक प्रतिनिधित्व, सीमित शक्तियों वाली न्यायपालिका और सख्त मानहानि कानूनों से नियंत्रित प्रेस की कल्पना की। समानता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे मौलिक अधिकारों को अदालतों में लागू कराने का अधिकार खत्म कर दिया जाता। यानी नागरिक अदालत में उनके उल्लंघन को चुनौती नहीं दे पाते।

“हमारे संविधान पर एक नई नजर: कुछ सुझाव” शीर्षक से एक गोपनीय दस्तावेज तैयार किया गया और भरोसेमंद सलाहकारों के बीच प्रसारित किया गया। इसमें अमेरिकी राष्ट्रपति से भी अधिक शक्तियों वाले राष्ट्रपति का प्रस्ताव था, जिन्हें न्यायिक नियुक्तियों और कानून बनाने पर नियंत्रण हासिल होता। राष्ट्रपति की अध्यक्षता में एक नई “न्यायपालिका की सर्वोच्च परिषद” कानूनों और संविधान की व्याख्या करती, जिससे सर्वोच्च न्यायालय की शक्ति प्रभावी रूप से निष्प्रभावी हो जाती।

इंदिरा गांधी ने इन विचारों पर आगे पड़ताल की अनुमति दी, लेकिन सार्वजनिक रूप से कोई प्रतिबद्धता नहीं जताई। उन्होंने अपने सहयोगियों को निर्देश दिया कि ऐसा आभास न दें कि इन प्रस्तावों को उनकी आधिकारिक मंजूरी हासिल है। फिर भी, कांग्रेस पार्टी के भीतर संवैधानिक बदलाव की मांग वास्तविक थी और बढ़ रही थी।

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42वां संशोधन: राष्ट्रपति प्रणाली की छाया

पूर्ण राष्ट्रपति प्रणाली की मांग कभी औपचारिक प्रस्ताव का रूप नहीं ले पाई, लेकिन 1976 के 42वें संविधान संशोधन अधिनियम में उसका प्रभाव साफ दिखा। आपातकाल के चरम दौर में पारित यह संशोधन भारत के इतिहास में संवैधानिक बदलावों का सबसे व्यापक पैकेज था।

42वें संशोधन ने:

  • न्यायपालिका और राज्यों की कीमत पर संसद की शक्तियां बढ़ाईं
  • सर्वोच्च न्यायालय के लिए कानूनों को रद्द करना काफी मुश्किल बना दिया; इसके लिए पांच या सात न्यायाधीशों का विशेष बहुमत जरूरी कर दिया
  • “मूल संरचना सिद्धांत” को कमजोर करने की कोशिश की, जो संविधान में संशोधन करने की संसद की शक्ति को सीमित करता था
  • केंद्र सरकार को राज्यों में सशस्त्र बल तैनात करने और किसी खास क्षेत्र में आपातकाल घोषित करने के व्यापक अधिकार दिए
  • राज्यों में राष्ट्रपति शासन (केंद्र का प्रत्यक्ष शासन) की अवधि छह महीने से बढ़ाकर एक साल की
  • चुनाव संबंधी विवादों को न्यायपालिका के दायरे से बाहर रखा

नाम के तौर पर यह राष्ट्रपति प्रणाली नहीं थी, लेकिन संशोधन पर उसकी “आनुवंशिक छाप” थी—शक्तिशाली कार्यपालिका, हाशिये पर धकेली गई न्यायपालिका और कमजोर नियंत्रण एवं संतुलन। अखबार द स्टेट्समैन ने चेतावनी दी थी कि “एक ही निर्णायक वार से यह संशोधन संवैधानिक संतुलन को संसद के पक्ष में झुका देता है।”

कांग्रेस के वफादार और नेतृत्व का व्यक्तिपूजक चलन

इस दौर में गांधी के वफादार आधिकारिक प्रस्तावों से भी आगे निकल गए। रक्षा मंत्री बंसी लाल ने गांधी के लिए प्रधानमंत्री के तौर पर “आजीवन सत्ता” की मांग की, जबकि हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश के कांग्रेस सदस्यों ने सर्वसम्मति से संविधान को नए सिरे से लिखने के लिए नई संविधान सभा बुलाने की मांग की। बताया जाता है कि प्रधानमंत्री इन सुझावों की हद देखकर चौंक गईं और उन्होंने इसके बजाय संसद से संशोधन विधेयक को तेजी से पारित कराने का फैसला किया।

दिसंबर 1976 तक 42वां संशोधन संसद के दोनों सदनों से पारित हो चुका था, 13 राज्य विधानसभाओं ने इसकी पुष्टि कर दी थी और राष्ट्रपति ने इसे कानून का रूप दे दिया था। राष्ट्रपति प्रणाली का पूरा मॉडल कभी लागू नहीं हुआ, फिर भी इन बदलावों ने भारत की संवैधानिक व्यवस्था में शक्ति-संतुलन को बुनियादी तौर पर बदल दिया।

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आपातकाल के बाद: संसदीय लोकतंत्र की बहाली और मजबूती

1977 में इंदिरा गांधी ने अचानक आपातकाल खत्म कर चुनाव कराए और उन्हें अप्रत्याशित हार का सामना करना पड़ा। गांधी-विरोधी ताकतों के गठबंधन जनता पार्टी ने सत्ता संभाली और आपातकाल की अधिनायकवादी विरासत को मिटाने के लिए तेजी से कदम उठाए। 43वें और 44वें संशोधनों के जरिए नई सरकार ने 42वें संशोधन के कई अहम प्रावधान वापस लिए और न्यायिक समीक्षा तथा लोकतांत्रिक नियंत्रण एवं संतुलन बहाल किए।

हालांकि, जनता पार्टी का कार्यकाल ज्यादा नहीं चला। पार्टी अंदरूनी मतभेदों और नेतृत्व की खींचतान से जूझती रही। जनवरी 1980 तक गांधी फिर सत्ता में लौट आईं और कांग्रेस पार्टी एक बार फिर भारतीय राजनीति पर हावी हो गई। राष्ट्रपति प्रणाली का विचार निष्क्रिय जरूर पड़ा, लेकिन खत्म नहीं हुआ।

राष्ट्रपति प्रणाली की ओर फिर झुकाव

1982 में, जब राष्ट्रपति संजीव रेड्डी का कार्यकाल खत्म होने वाला था, गांधी ने प्रधानमंत्री पद छोड़कर भारत का राष्ट्रपति बनने पर गंभीरता से विचार किया। उनकी प्रधान सचिव ने बाद में बताया कि वह इस कदम को लेकर “बहुत गंभीर” थीं। उन्हें लगता था कि राष्ट्रपति पद के जरिए अपनी पार्टी को “झटका देकर सुधारने” और उसके नेतृत्व को नया रूप देने का मौका मिलेगा। आखिरकार, गांधी ने अपने वफादार गृह मंत्री जैल सिंह को राष्ट्रपति बनाने का फैसला किया। इससे वह खुद प्रधानमंत्री बनी रहीं और राष्ट्रपति पद पर भी अपना प्रभाव बनाए रखा।

1984 में गांधी की हत्या के बाद भी कांग्रेस पार्टी के भीतर राष्ट्रपति प्रणाली की मांग बनी रही। वरिष्ठ मंत्री वसंत साठे ने राष्ट्रपति प्रणाली की ओर बदलाव के पक्ष में देशव्यापी बहस छेड़ी, लेकिन गांधी की मौत के बाद यह चर्चा फीकी पड़ गई। उस दौर की जटिल राजनीतिक परिस्थितियों और संस्थागत मजबूती से आकार लेते हुए भारत संसदीय लोकतंत्र बना रहा।

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राष्ट्रपति प्रणाली भारत में जड़ें क्यों नहीं जमा सकी?

गंभीर विचार-विमर्श और कुछ संस्थागत बदलावों के बावजूद भारत ने राष्ट्रपति प्रणाली की ओर कदम नहीं बढ़ाया। इसके पीछे कई कारण थे:

  • राजनीतिक सावधानी: इंदिरा गांधी रणनीतिक और महत्वाकांक्षी नेता थीं, लेकिन उन्होंने हद से आगे बढ़ने से परहेज किया। उन्होंने राष्ट्रपति प्रणाली के विचारों की पड़ताल की अनुमति तो दी, पर सार्वजनिक रूप से उनका समर्थन नहीं किया। संभव है कि उन्हें आमूलचूल बदलाव के जोखिमों का अंदाजा था।
  • राष्ट्रीय सहमति का अभाव: कांग्रेस के कुछ नेता इसके पक्ष में उत्साहित थे, लेकिन अन्य—खासकर पार्टी से बाहर के लोग—संदेह में थे या विरोध कर रहे थे। तमिलनाडु के गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि इन प्रस्तावों से खासे प्रभावित नहीं हुए।
  • संस्थागत जड़ता: स्वतंत्रता आंदोलन में गहरी जड़ें रखने वाली और लोकतांत्रिक मॉडल के रूप में प्रतीकात्मक महत्व वाली भारत की संसदीय व्यवस्था “जड़ पकड़ चुकी” थी। आपातकाल के बाद भी यह व्यवस्था फिर मजबूत हुई और सत्ता को केंद्रीकृत करने की कोशिशें पलट दी गईं।
  • जनता की प्रतिक्रिया: आपातकाल की ज्यादतियों—नागरिक स्वतंत्रताओं के निलंबन और सत्ता के केंद्रीकरण समेत—से व्यापक जन असंतोष पैदा हुआ। कई मायनों में 1977 का चुनाव अधिनायकवाद पर जनमत संग्रह था और मतदाताओं ने उसे निर्णायक रूप से खारिज कर दिया।

इतिहासकार श्रीनाथ राघवन, जिनके शोध से ये घटनाक्रम सामने आए हैं, का तर्क है कि राष्ट्रपति प्रणाली की मांग मुख्य रूप से गांधी की अपनी सत्ता मजबूत करने की रणनीतिक चाल थी। राघवन ने बीबीसी से कहा, “मकसद व्यवस्था को इस तरह बदलना था कि उनकी सत्ता पर पकड़ तुरंत मजबूत हो जाए। इसके पीछे कोई बड़ी दीर्घकालिक योजना नहीं थी—उनके शासन के ज्यादातर दूरगामी नतीजे शायद अनचाहे थे। आपातकाल के दौरान उनका मुख्य लक्ष्य अल्पकालीन था: अपने पद को हर चुनौती से बचाना। 42वें संशोधन को यह सुनिश्चित करने के लिए तैयार किया गया था कि न्यायपालिका भी उनके रास्ते में न आ सके।”

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व्यापक मायने: आपातकाल की विरासत और शासन-व्यवस्था पर बहस

आपातकाल और राष्ट्रपति प्रणाली की ओर झुकाव ने भारतीय राजनीति पर स्थायी छाप छोड़ी। इस घटनाक्रम ने दिखाया कि कार्यपालिका की हद से बढ़ी शक्ति के सामने संसदीय व्यवस्था कितनी कमजोर पड़ सकती है, लेकिन साथ ही इसने लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती भी साबित की। न्यायपालिका की स्वतंत्रता की बहाली, नागरिक स्वतंत्रताओं की वापसी और प्रतिस्पर्धी चुनावों की बहाली ने भारत की संवैधानिक व्यवस्था की ताकत को रेखांकित किया।

भारत में संसदीय और राष्ट्रपति प्रणालियों के गुण-दोष पर बहस आज भी जारी है। राष्ट्रपति प्रणाली के समर्थकों का तर्क है कि इससे स्थिर और निर्णायक नेतृत्व मिलेगा तथा गठबंधन की राजनीति की अव्यवस्था कम होगी। आलोचकों को आशंका है कि इससे बहुलवाद और नियंत्रण एवं संतुलन कमजोर पड़ सकते हैं, जबकि ये भारत के लोकतंत्र के लिए अनिवार्य हैं।

संवैधानिक सुधार की वकालत करने वाली वेबसाइटें और टिप्पणीकार अक्सर आपातकाल का हवाला देते हुए अनियंत्रित कार्यकारी शक्ति के खतरों से आगाह करते हैं। बहुमत के शासन और अल्पसंख्यक अधिकारों के बीच संतुलन, न्यायपालिका की भूमिका और संस्थागत सुरक्षा उपायों की जरूरत पर आज की बहसों में भी इस घटनाक्रम का जिक्र होता है।

सारांश

  • आपातकाल (1975-77) के दौरान इंदिरा गांधी की सरकार ने फ्रांस के पांचवें गणराज्य से प्रेरित होकर भारत को संसदीय से राष्ट्रपति प्रणाली में बदलने पर गंभीरता से विचार किया।
  • प्रस्तावों में व्यापक शक्तियों वाले सीधे निर्वाचित राष्ट्रपति, हाशिये पर धकेली गई न्यायपालिका और कमजोर संसद की परिकल्पना थी, लेकिन ये विचार कभी औपचारिक नीति नहीं बने।
  • 1976 का 42वां संविधान संशोधन अधिनियम इनमें से कई महत्वाकांक्षाओं को दर्शाता था। इसने कार्यपालिका की शक्ति केंद्रीकृत की और न्यायिक समीक्षा सीमित की।
  • आपातकाल के बाद जनता पार्टी सरकार ने कई अधिनायकवादी प्रावधान वापस लेकर लोकतांत्रिक नियंत्रण एवं संतुलन बहाल किए।
  • इंदिरा गांधी ने 1982 में कुछ समय के लिए खुद राष्ट्रपति बनने पर विचार किया, लेकिन अंततः प्रधानमंत्री बने रहने और अपने एक वफादार नेता को राष्ट्रपति नियुक्त करने का फैसला किया।
  • राजनीतिक सावधानी, सहमति के अभाव, संस्थागत जड़ता और अधिनायकवाद के खिलाफ जन प्रतिक्रिया के चलते भारत की संसदीय व्यवस्था बनी रही।
  • यह घटनाक्रम भारत के संवैधानिक इतिहास का अहम अध्याय है, जिसने शासन-व्यवस्था, कार्यकारी शक्ति और भारतीय लोकतंत्र के भविष्य पर जारी बहसों को आकार दिया।
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