हस्ताक्षरित प्रमाणपत्रों से चिह्नित मतदाताओं के मामलों के निपटारे का तरीका बदला
11 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर और पश्चिम दिल्ली के कम से कम पांच विधानसभा क्षेत्रों में चुनाव अधिकारी बूथ स्तर के अधिकारियों द्वारा हस्ताक्षरित प्रमाणपत्रों के जरिए मतदाता सूची की विसंगतियों का निपटारा कर रहे हैं। इसके लिए सहायक दस्तावेज़ या आगे सुनवाई की जरूरत नहीं पड़ रही। कुछ अधिकारियों का कहना है कि उन्हें ऐसी मुद्रित सूचियां दी गईं जिन पर पहले से ही "Found Ok" लिखा था और नए सिरे से सत्यापन करने के बजाय उन पर हस्ताक्षर करने को कहा गया।
विषय-सूची
- हस्ताक्षरित प्रमाणपत्रों से चिह्नित मतदाताओं के मामलों के निपटारे का तरीका बदला
- प्रमाणपत्रों से क्या संभव होता है
- विसंगतियां अपात्रता का सबूत नहीं
- नई दिल्ली से पता चलता है कि दस्तावेज़ों में छूट कैसे दी जा रही है
- नियम सुनवाई से घर-घर यात्राओं की ओर बदले
- दैनिक लक्ष्य और असमान कार्यभार
- तेजी से निपटारे से यह नहीं पता चलता कि मामला किस आधार पर मंजूर हुआ
- मतदाताओं की स्थिति के हिसाब से समस्याएं अलग-अलग हैं
- जवाबदेही और समय-सीमाएं अहम बनी हुई हैं
- मुख्य बिंदु
इस प्रक्रिया से भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की व्यावहारिक आवश्यकताएं बदल जाती हैं। नोटिस पाने वाले मतदाताओं से पहले अपेक्षा की जाती थी कि वे जांच के लिए निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों के पास दस्तावेज़ जमा करें। नए प्रसारित निर्देशों के तहत, बूथ स्तर के अधिकारी यानी बीएलओ का प्रमाणपत्र उनके नाम अंतिम सूची में शामिल करने के लिए आगे भेजने का आधार बन सकता है।
मामलों की संख्या काफी बड़ी है। दिल्ली की मसौदा मतदाता सूची से करीब 47 लाख नाम हटाए गए थे; अधिक विस्तृत आंकड़ों में यह संख्या 47.56 लाख बताई गई है। मसौदा सूची में बने रहे 33.11 लाख अन्य लोगों को विसंगतियों या 2002 की मतदाता सूची से उनका ब्योरा जोड़ने में समस्याओं के बारे में नोटिस मिले। ये अलग-अलग समूह हैं: नोटिस मिलने का यह अर्थ नहीं कि मतदाता का नाम सूची से हट चुका है।
इन प्रमाणपत्रों से पात्र मतदाताओं को वर्तनी की त्रुटियों और अन्य विसंगतियों के लिए बार-बार कागजी दस्तावेज़ देने से राहत मिल सकती है। मुख्य चिंता यह है कि क्या उनमें वास्तविक आकलन दर्ज है या सिर्फ लंबित मामलों को बंद किया जा रहा है। बिना दस्तावेज़ जांचे हस्ताक्षर लेने की बीएलओ की बातों और मतदाताओं के घर जाकर सत्यापन करने के आधिकारिक दावों में बड़ा अंतर है।
प्रमाणपत्रों से क्या संभव होता है
नए फॉर्म व्हाट्सऐप निर्देशों के जरिए प्रसारित किए गए। इनमें बीएलओ से प्रमाणित करने को कहा गया है कि लंबित नोटिस वाले मतदाताओं का सत्यापन हो चुका है, वे भारतीय नागरिक हैं और विधानसभा क्षेत्र के वास्तविक मतदाता हैं। प्रमाणपत्र अधिकारी के नाम से दाखिल किए जाते हैं और एक बार में कई मतदाताओं को शामिल कर सकते हैं।
एक विधानसभा क्षेत्र में संलग्न सूचियों में मतदाताओं के नाम, निर्वाचक फोटो पहचान पत्र (ईपीआईसी) नंबर, बूथ नंबर और मैपिंग की श्रेणियां शामिल हैं। टिप्पणी वाले कॉलम में अधिकारी "Found OK" दर्ज कर सकता है। प्रमाणपत्र के साथ दिए गए निर्देशों में कहा गया है कि सुनवाई तय करने की जरूरत नहीं है और प्रमाणपत्र जारी होने के बाद अतिरिक्त दस्तावेज़ नहीं मांगे जा सकते।
एक बीएलओ ने बताया कि मतदान केंद्र पर बांटी गई सूचियों में हर मतदाता के सामने पहले से ही अनुकूल टिप्पणी दर्ज थी। एक अन्य ने कहा कि अधिकारियों ने दस्तावेज़ जांचे बिना प्रमाणपत्रों पर हस्ताक्षर कर दिए। इन अधिकारियों ने अपनी पहचान गोपनीय रखी, इसलिए उनकी बातें प्रक्रिया को लेकर आरोप हैं, किसी पहचाने गए अधिकारी के खिलाफ निष्कर्ष नहीं।
पांच विधानसभा क्षेत्रों में यह तरीका अपनाए जाने की जानकारी मिली; हर क्षेत्र में प्रमाणपत्र का अपना प्रारूप था। इससे यह साबित नहीं होता कि पूरी दिल्ली में एक जैसी प्रक्रिया चल रही है। एक बीएलओ ने यह भी कहा कि पुराने मतदाता सूची रिकॉर्ड से जिन मतदाताओं का मिलान नहीं हो सका, उनके मामले भी इसी तरह निपटाए जा रहे थे, लेकिन इस दावे की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई।
पुनरीक्षण के दौरान तीन अलग-अलग दस्तावेज़ सामने आए हैं: किसी एक मतदाता के लिए बीएलओ का आश्वासन-पत्र, सुनवाई में दी गई जानकारी की पुष्टि करने वाला मतदाता का आश्वासन-पत्र और लंबित मामलों की सूचियों को कवर करने वाला नवीनतम प्रमाणपत्र। इनका अलग-अलग उद्देश्य है। मतदाता की घोषणा उस अधिकारी के प्रमाणन जैसी नहीं है जो कहता है कि सत्यापन पहले ही हो चुका है।
विसंगतियां अपात्रता का सबूत नहीं
नोटिस दो व्यापक समस्याओं से जुड़े हैं। "No Mapping" का मतलब है कि पुरानी मतदाता सूची से सफलतापूर्वक मिलान नहीं हो सका। "Logical Discrepancies" तब भी सामने आ सकती हैं जब मतदाता ने 2002 की सूची में अपनी प्रविष्टि सफलतापूर्वक पहचान ली हो, क्योंकि सॉफ्टवेयर नाम, उम्र, माता-पिता के नाम या अन्य ब्योरे में अंतर को चिह्नित करता है।
दूसरी श्रेणी के आकार के बारे में रिपोर्टों में अलग-अलग आंकड़े हैं। नोटिसों के एक विश्लेषण में कम से कम 20 लाख तार्किक विसंगति वाले मामले बताए गए। एक अन्य रिपोर्ट में यह संख्या 19.1 लाख थी। दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के हवाले से दिए गए आंकड़ों में यह 19.3 लाख से अधिक थी; एक रिपोर्ट में खास तौर पर 19.33 लाख बताया गया। तारीख और वर्गीकरण के तरीके जाने बिना इन आंकड़ों को एक-दूसरे के बराबर नहीं मानना चाहिए।
मैपिंग के कुल आंकड़ों पर भी यही सावधानी लागू होती है। मुख्य निर्वाचन अधिकारी के हवाले से करीब 13.8 लाख मामले बताए गए हैं, या अधिक सटीक रूप से 13.79 लाख। एक रिपोर्ट के अनुसार मुख्य निर्वाचन अधिकारी की रिपोर्ट में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि मैपिंग और तार्किक विसंगति की श्रेणियों में एक ही मामले शामिल हैं या नहीं। इस स्पष्टीकरण के बिना दोनों आंकड़े जोड़ने पर कुछ लोगों की गिनती दो बार हो सकती है।
यह अंतर बताता है कि कुछ निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी नए दस्तावेज़ मांगे बिना मामलों के निपटारे का समर्थन क्यों करते हैं। सॉफ्टवेयर से पैदा हुआ बेमेल रिकॉर्ड की जांच की वजह है, जरूरी नहीं कि वह व्यक्ति के अपात्र होने का सबूत हो। विवाद इस बात पर है कि उस बेमेल को दूर करने के लिए कौन-सा साक्ष्य पर्याप्त है और क्या दर्ज आकलन वास्तव में किया गया था।
नई दिल्ली से पता चलता है कि दस्तावेज़ों में छूट कैसे दी जा रही है
नई दिल्ली विधानसभा क्षेत्र इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है। 10 अक्टूबर की रिपोर्ट के समय वहां नोटिस के सभी 20,777 मामलों का निपटारा हो चुका था। मसौदा सूची में इस क्षेत्र के 52,368 मतदाता थे, यानी करीब 39.7% को नोटिस मिले थे।
17,392 मामलों में दस्तावेज़ जुटाए गए थे, जिनमें से कुछ पहले की गणना प्रक्रिया के दौरान जमा हुए थे। बाकी 3,385 मामले ईसीआई की चुनावी कामकाज संबंधी डिजिटल प्रणाली ECINET में मौजूद नए विकल्पों का इस्तेमाल करके बिना दस्तावेज़ों के निपटाए गए। ये छूट नई दिल्ली में नोटिस वाले मामलों का करीब 16.3% थीं।
नई दिल्ली के निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी पीयूष मोहंती ने कहा कि उनके फैसले पहले की घर-घर यात्राओं से मिली बीएलओ की फील्ड रिपोर्टों पर आधारित थे। उन्होंने बताया कि उन्होंने पोर्टल के विकल्पों का कैसे इस्तेमाल किया:
बाकी 3,385 मतदाताओं के लिए हमने नए विकल्पों का इस्तेमाल किया और बिना दस्तावेज़ों के नोटिसों का निपटारा कर दिया। मैंने बीएलओ की फील्ड रिपोर्टों के आधार पर सुनवाई का आदेश अपलोड किया। गणना चरण के दौरान वे पहले ही घर-घर जा चुके थे। नए विकल्पों से मामलों का निपटारा बहुत तेजी से करने में मदद मिली,
मोहंती का स्पष्टीकरण पहले किए गए फील्डवर्क के आधार पर फैसले की बात करता है। यह बिना सत्यापन किए सूचियों पर हस्ताक्षर करने के लिए कहे जाने संबंधी गुमनाम बीएलओ के बयानों से अलग है। नए सिरे से दस्तावेज़ जमा किए बिना किसी मामले का निपटारा अपने आप यह साबित नहीं करता कि किसी साक्ष्य पर विचार नहीं हुआ।
दूसरे निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी छूट का इस्तेमाल करने से हिचकिचाते रहे। उनका कहना था कि लिखित निर्देशों में अब भी दस्तावेज़ी प्रमाण की जरूरत है और ECINET पर अपलोड किए गए आदेश का कोई साक्ष्य-आधार होना चाहिए। बदलाव का समर्थन करने वाले अधिकारियों ने दलील दी कि उनके वैधानिक अधिकार में बीएलओ की फील्ड रिपोर्टों के आधार पर पात्रता तय करना शामिल है, खासकर ऐसे वास्तविक मतदाताओं के लिए जिनके पास दस्तावेज़ कम हैं।
नियम सुनवाई से घर-घर यात्राओं की ओर बदले
नवीनतम प्रमाणपत्रों से पहले दिल्ली में नोटिसों के निपटारे का तरीका कई बार बदला। शुरुआत में मतदाताओं से सुनवाई में शामिल होकर दस्तावेज़ देने की अपेक्षा की गई थी। इन दस्तावेज़ों को ECINET पर अपलोड कर निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ईआरओ) जांचते। मतदाता सूची पर फैसले की जिम्मेदारी ईआरओ के पास ही रहती है।
पहले की रिपोर्टों में प्रमुख मतदाताओं के लिए विशेष व्यवस्थाओं का जिक्र था। इनमें मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता भी शामिल थीं, जिन्होंने नोटिस मिलने के बावजूद कथित तौर पर सुनवाई में हिस्सा नहीं लिया। बीएलओ ने कहा कि अनौपचारिक व्हाट्सऐप निर्देशों में उनसे वीआईपी मतदाताओं के घर जाकर दस्तावेज़ जुटाने को कहा गया था। अन्य कथित लाभार्थियों में पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू शामिल थे।
ईसीआई की 26 सितंबर की विज्ञप्ति में कहा गया था कि बीएलओ घरों पर जाकर दस्तावेज़ जुटाएंगे और सुनवाई सिर्फ ईआरओ द्वारा तय विशेष मामलों में होगी। 29 सितंबर के एक अलग आदेश के बारे में कहा गया कि उसने दिल्ली के मतदाताओं के लिए घर से दस्तावेज़ लेने की प्रक्रिया को औपचारिक रूप दिया। ये अलग-अलग तारीखों की कार्रवाइयां हैं; इनमें से किसी को भी दस्तावेज़ों से छूट देने वाले नवीनतम व्हाट्सऐप निर्देशों के साथ नहीं मिलाना चाहिए।
घटनाक्रम से जगह और साक्ष्य संबंधी आवश्यकताओं, दोनों में बदलाव दिखता है:
- 30 जून: दिल्ली में एसआईआर शुरू हुआ।
- 31 अगस्त: मसौदा सूची प्रकाशित हुई और विसंगतियों के नोटिस जारी किए गए।
- 26 सितंबर: ईसीआई की विज्ञप्ति में सामान्य सुनवाई के बजाय घरों से दस्तावेज़ जुटाने की बात कही गई।
- 29 सितंबर: एक आदेश ने सहायक दस्तावेज़ जुटाने के लिए बीएलओ की घर-घर यात्राओं को औपचारिक रूप दिया।
- अक्टूबर की शुरुआत तक: ECINET के विकल्पों से कुछ मामलों का निपटारा बिना दस्तावेज़ों या सुनवाई के संभव हुआ।
- 11 अक्टूबर: रिपोर्ट में पांच विधानसभा क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर प्रमाणपत्र प्रसारित होने का जिक्र किया गया।
दस्तावेज़ घर से जुटाने पर जांच का आधार बदले बिना लोगों की परेशानी कम हो सकती है। हस्ताक्षरित प्रमाणपत्र को पर्याप्त प्रमाण मानना इस बात को बदल देता है कि रिकॉर्ड में किस चीज को पर्याप्त साक्ष्य के रूप में दर्ज किया जाता है। दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय से नवीनतम प्रक्रिया पर टिप्पणी मांगी गई थी, लेकिन 11 अक्टूबर की रिपोर्ट में कोई जवाब दर्ज नहीं था।
दैनिक लक्ष्य और असमान कार्यभार
अधिकारियों ने 14,947 बीएलओ को रोज कम से कम 10 मतदाताओं का सत्यापन करने का निर्देश दिया था। इससे प्रतिदिन कुल 1,49,470 मामलों का लक्ष्य बनता है। एक अलग रिपोर्ट में बीएलओ की संख्या 14,946 दी गई है। इस छोटे अंतर से असमान कार्यभार की कहीं बड़ी समस्या नहीं बदलती।
नोटिसों के 2.5 लाख पन्नों के विश्लेषण में पाया गया कि करीब आधे बूथों पर कम से कम 215 मामलों का कार्यभार था। 2,000 से अधिक बूथों पर 300 से ज्यादा मामले थे। हरि नगर में एक बीएलओ पर सबसे अधिक 741 मामलों का बोझ दर्ज किया गया।
बीएलओ ने बताया कि किसी मतदाता को ढूंढने और मामला सुलझाने में आम तौर पर 15 से 25 मिनट लगते हैं। इस हिसाब से 741 मामलों में करीब 185 से 309 घंटे लगेंगे; इसमें दोबारा जाने या अन्य कामों का समय शामिल नहीं है। बताए गए समय के अनुसार, रोज 10 मामलों को निपटाने में भी करीब ढाई से चार घंटे 10 मिनट लगेंगे।
कई बीएलओ शिक्षक या अन्य सरकारी पदों पर भी काम करते हैं। रिपोर्टों में बताया गया कि सत्यापन सिर्फ घर जाकर ही नहीं, बल्कि स्कूलों, पार्टी कार्यालयों, सामुदायिक नेताओं के घरों और सड़क किनारे की जगहों पर भी किया गया। मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने अलग राय देते हुए कहा कि समय का सही प्रबंधन करके मामले पूरे किए जा सकते हैं।
बल्लिमारान में दबाव खास तौर पर दिखता है। वहां एक बूथ के मसौदा मतदाताओं में से 635 में 609 को नोटिस मिले, यानी करीब 95.9% को। अगर हर नोटिस के बाद नाम हटा दिया जाता, तो सिर्फ 26 नाम बचते। यह एक शर्त पर आधारित गणना थी, नाम हटाने का वास्तविक नतीजा नहीं।
तेजी से निपटारे से यह नहीं पता चलता कि मामला किस आधार पर मंजूर हुआ
मामलों का निपटारा तेजी से बढ़ा। 26 सितंबर तक एक लाख से कम नोटिसों का निपटारा हुआ था। 5 अक्टूबर को मुख्य निर्वाचन अधिकारी की पहली प्रगति रिपोर्ट में 10 लाख से अधिक मामलों के सत्यापन की जानकारी दी गई। 10 अक्टूबर को प्रकाशित रिपोर्ट के समय तक निपटाए गए मामलों की संख्या 15 लाख से अधिक हो चुकी थी, जिनमें एक ही दिन में दो लाख से ज्यादा मामले शामिल थे।
अन्य रिपोर्टों में सत्यापन के आंकड़े पहले 13,62,162 और फिर 17,03,515 बताए गए। यह बाद वाला आंकड़ा 33.11 लाख नोटिस वाले मामलों का करीब 51.5% है। हर आंकड़े के साथ प्रकाशन की तारीख न होने के कारण इन्हें एक ही समय के कुल आंकड़ों के बजाय अलग-अलग प्रगति रिपोर्ट के रूप में पढ़ना चाहिए।
सत्यापन और निपटारे का अंतर भी मायने रखता है। दस्तावेज़ जांचने के बाद, पहले की फील्ड रिपोर्टों पर विचार करने के बाद या प्रमाणपत्र के जरिए कोई मामला प्रशासनिक रूप से बंद किया जा सकता है। मामलों की बढ़ती कुल संख्या से अकेले यह पता नहीं चलता कि किस रास्ते का इस्तेमाल हुआ या कितनी बार नए सिरे से जांच की गई।
रिपोर्टों के मुताबिक, ईसीआई की निर्धारित सूची में 12 दस्तावेज़ हैं और बैंक पासबुक, पैन कार्ड तथा आधार कार्ड इसमें शामिल नहीं हैं। फिर भी कुछ बीएलओ मतदाताओं के पास मौजूद एकमात्र दस्तावेज़ के रूप में ये कागजात अपलोड कर रहे थे और साथ में अधिकारी का आश्वासन-पत्र भी दे रहे थे। बताया गया कि वरिष्ठ पत्रकार नीलांजन मुखोपाध्याय से कहा गया था कि सिर्फ आधार पर्याप्त होगा। इससे पता चलता है कि व्यवहार में दिए गए निर्देश सूचीबद्ध आवश्यकताओं से अलग हो सकते थे।
मतदाताओं की स्थिति के हिसाब से समस्याएं अलग-अलग हैं
नए प्रमाणपत्र लंबित नोटिसों से जुड़े हैं, जरूरी नहीं कि मसौदा सूची से हटाए गए हर व्यक्ति से। मुख्य निर्वाचन अधिकारी के हवाले से दिए गए आंकड़ों के अनुसार, पुनरीक्षण से पहले दिल्ली में करीब 1.45 करोड़ मतदाता थे और मसौदा सूची में 97.5 लाख थे। करीब 47.5 लाख लोगों को अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत या नाम हटने की अन्य श्रेणियों में रखा गया।
कुछ लोगों के मामले बताते हैं कि यह अंतर क्यों अहम है। वरिष्ठ अधिवक्ता रेबेका जॉन को कथित तौर पर उपनाम में अंतर के कारण नोटिस मिला, जबकि उन्होंने 2002 की सूची में अपनी प्रविष्टि पहचान ली थी। उनके बेटे को भी नोटिस मिला, जबकि उसके उपनाम का दोनों माता-पिता के उपनाम से मिलान होता था। लंबे समय से दिल्ली में रह रहे कुन्ने लाल को कथित तौर पर जीवित होने के बावजूद मृत चिह्नित कर दिया गया। बेला एस्टेट में सूची से हटाए गए मतदाताओं में 22 वर्षीय रुखसाना भी थीं।
अन्य मतदाताओं ने बताया कि नोटिस उन पर छपी सुनवाई की तारीख के बाद पहुंचे, उनसे बार-बार दस्तावेज़ मांगे गए और सुधार के लिए कहां जाना है यह स्पष्ट नहीं था। सामाजिक कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज ने सवाल उठाया कि सिस्टम से पैदा हुई त्रुटियों के कारण इतने मतदाताओं पर संदेह क्यों किया गया।
अधिकारियों ने कहा कि नोटिस मतदाता को अपनी पात्रता साबित करने का अवसर देता है और इससे नाम अपने आप नहीं कटता। लेकिन जो व्यक्ति पहले से मसौदा सूची से बाहर है, उसे नाम शामिल कराने के लिए अलग आवेदन देना होगा। 3 अगस्त से अधिकारियों को 2,78,383 फॉर्म मिले थे, जिनमें नाम शामिल कराने के 1,98,731 आवेदन और सुधार या पता बदलने के 5,643 फॉर्म शामिल थे।
जवाबदेही और समय-सीमाएं अहम बनी हुई हैं
प्रमाणपत्र में सत्यापन की घोषणा बीएलओ के नाम से दर्ज होती है। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के तहत मतदाता सूची से जुड़ी जानबूझकर की गई झूठी घोषणा पर एक साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। इस प्रावधान का अर्थ यह नहीं कि हर गलत प्रमाणपत्र अपराध है, लेकिन इससे घोषणा की सच्चाई महत्वपूर्ण हो जाती है।
पुनरीक्षण पर न्यायिक और राजनीतिक निगरानी भी है। 5 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने पुनरीक्षण के फैसलों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर ईसीआई, मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार और केंद्र सरकार से जवाब मांगा। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि अदालत ने फॉर्म 6 में बदलाव को मंजूरी नहीं दी थी। ईसीआई ने अलग से कहा कि अदालत ने फॉर्म 6 की घोषणा को बरकरार रखा था। अदालत के रुख के बारे में ये परस्पर विरोधी विवरण हैं; इनसे दिल्ली के नवीनतम सामूहिक प्रमाणपत्रों पर कोई फैसला साबित नहीं होता।
19 दलों के विपक्षी सांसद 6 अक्टूबर को ईसीआई की ओर मार्च करते हुए गए और राहुल गांधी को कुछ समय के लिए हिरासत में लिया गया। भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने विपक्ष पर "अराजकता का माहौल" बनाने का आरोप लगाया। ईसीआई ने गड़बड़ी के आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि पुनरीक्षण से मृत, स्थानांतरित और दोहरी प्रविष्टि वाले मतदाताओं को हटाया जा रहा है।
जारी कार्यक्रम के अनुसार, दावे और आपत्तियां 30 अक्टूबर तक स्वीकार किए जाएंगे, सत्यापन का लक्ष्य 25 नवंबर है और नोटिस, दावों तथा आपत्तियों के निपटारे की अंतिम तारीख 30 नवंबर है। अंतिम मतदाता सूची 4 दिसंबर को जारी होनी है। आवेदन बीएलओ, सहायक निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों, मतदाता सेवा पोर्टल या ECINET के जरिए जमा किए जा सकते हैं।
यह अब भी स्पष्ट नहीं है कि सामूहिक प्रमाणपत्रों का इस्तेमाल कितने व्यापक पैमाने पर हो रहा है, क्या उनका प्रारूप एक जैसा है और कितने मामलों में निपटारा दबाव में लिए गए हस्ताक्षरों के बजाय पूरा किए गए फील्डवर्क पर आधारित है। अंतिम मतदाता सूची से पता चलेगा कि कौन शामिल है, लेकिन उससे अपने आप यह नहीं समझ आएगा कि हर विवादित मामले का फैसला कैसे किया गया।
मुख्य बिंदु
- खबरों के मुताबिक, दिल्ली के पांच विधानसभा क्षेत्रों में अतिरिक्त दस्तावेज़ों या सुनवाई के बिना नोटिस वाले मामलों के निपटारे के लिए बीएलओ प्रमाणपत्र इस्तेमाल किए जा रहे हैं।
- मसौदा सूची से करीब 47.5 लाख नाम हटाए गए, जबकि मसौदे में शामिल 33.11 लाख अन्य मतदाताओं को नोटिस मिले।
- नई दिल्ली में नोटिस वाले 20,777 मामलों में से 3,385 का निपटारा दस्तावेज़ों के बिना हुआ; ईआरओ ने पहले की बीएलओ फील्ड रिपोर्टों का हवाला दिया।
- कुछ बीएलओ का आरोप है कि उन्हें सत्यापन किए बिना पहले से संतोषजनक चिह्नित सूचियों पर हस्ताक्षर करने को कहा गया।
- दावे और आपत्तियां 30 अक्टूबर को बंद होंगे; अंतिम सूची 4 दिसंबर को जारी होनी है।






