अपील में जेल की सज़ा को मृत्युदंड में बदलने को चुनौती
श्रीलंकाई प्रवासी कामगार अनोजन सिवारासा को सुनाई गई मौत की सज़ा रद्द कराने के लिए सऊदी अरब के सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की गई है। यह कदम दोनों देशों के वकीलों के बीच विचार-विमर्श के बाद उठाया गया। दायर करने संबंधी खबरों के मुताबिक, अपील रविवार, 11 अक्टूबर को दाखिल हुई; इनमें से दो खबरों में तारीख 11 अक्टूबर, 2026 बताई गई है।
विषय-सूची
- अपील में जेल की सज़ा को मृत्युदंड में बदलने को चुनौती
- फेसबुक पर बहस कैसे मौत की सज़ा वाले मामले में बदली
- कानूनी और राजनयिक कार्रवाई का क्रम
- सुप्रीम कोर्ट की अपील किसने तैयार की?
- सुप्रीम कोर्ट की समीक्षा से क्या तय हो सकता है
- क्षमादान अभियान अदालतों से बाहर भी मदद मांग रहा
- जेल में संपर्क और परिवार की गुहार
- यात्रा में बाधा और व्यापक महत्व
- मुख्य बातें
श्रीलंका के पूर्वी प्रांत के कलमुनाई निवासी 24 वर्षीय सिवारासा को पैगंबर मुहम्मद का अपमान करने वाला माने गए एक फेसबुक पोस्ट के लिए शुरू में पांच साल जेल की सज़ा सुनाई गई थी। इसके बाद अभियोजन पक्ष ने शरिया कानून के तहत मुकदमा चलाने की मांग की और एक अपीलीय अदालत ने जेल की सज़ा को मृत्युदंड में बदल दिया।
श्रीलंका के दौरे पर आए प्रतिनिधिमंडल के साथ कई दौर की बातचीत के बाद सऊदी वकीलों ने ताज़ा अपील दायर की। रियाद स्थित श्रीलंका के दूतावास ने राजदूत ओ.एल. अमीर अजवद के नेतृत्व में इस काम का समन्वय किया। अपील दाखिल होना सज़ा पलटने की कोशिश में एक नया चरण है, लेकिन खबरों में सुप्रीम कोर्ट के किसी फैसले या सुनवाई की तारीख की घोषणा नहीं हुई है।
कानूनी कोशिश के साथ-साथ क्षमादान की मांग, अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप की अपील और जेल में सिवारासा की कुशलक्षेम को लेकर चिंता भी जारी है। बताया गया कि दौरे पर आए कानूनी दल के सदस्य रियाद में फंस गए, क्योंकि सऊदी राजधानी पर हमलों के बाद उनकी तय वापसी उड़ानें रद्द कर दी गईं।
अपील और क्षमादान में फर्क अहम है। अपील अदालतों के जरिए न्यायिक फैसले को चुनौती देती है। मानवीय आधार पर की गई मांगें अलग राजनयिक प्रयास के माध्यम से दया की गुहार लगाती हैं। न तो अपील दायर होने से और न ही क्षमादान की मांग से यह साबित होता है कि मौत की सज़ा रद्द हो गई है।
फेसबुक पर बहस कैसे मौत की सज़ा वाले मामले में बदली
बताया जाता है कि 2 जुलाई को गिरफ्तार किए जाने के समय सिवारासा को सऊदी अरब में एक साल से भी कम हुआ था। मामला एक वायरल वीडियो को लेकर ऑनलाइन बहस से शुरू हुआ था। वीडियो में एक व्यक्ति हिंदू तीर्थयात्रियों के साथ चल रहे एक आवारा कुत्ते को लात मारता दिखा था।
बहस के दौरान, हिंदू देवता के बारे में अपमानजनक टिप्पणी के जवाब में उन्होंने कथित तौर पर पैगंबर मुहम्मद का अपमान करने वाली टिप्पणी की। इसके बाद उन्होंने फेसबुक पोस्ट हटा दी और माफ़ी मांगते हुए एक वीडियो प्रकाशित किया। बताया जाता है कि पोस्ट के स्क्रीनशॉट उनके नियोक्ता को भेजे गए और फिर सऊदी अधिकारियों तक पहुंचे।
अल-अहसा की आपराधिक अदालत ने शुरू में देश के साइबर अपराध कानून के तहत पांच साल जेल और 30 लाख सऊदी रियाल का जुर्माना लगाया। सज़ा कम करने के लिए उनकी ओर से की गई अपील खारिज कर दी गई।
अभियोजन पक्ष ने 17 सितंबर को अपनी अपील दायर कर शरिया कानून के तहत मुकदमा चलाने की मांग की। यह मांग स्वीकार कर ली गई, जिसके बाद मौत की सज़ा सुनाई गई। एक खबर के मुताबिक, अदालत ने आरोप को हद अपराध माना, जो इस्लामी कानून के तहत निर्धारित सजाओं से जुड़ी एक श्रेणी है। फैसले की प्रति उपलब्ध न होने के कारण इस वर्गीकरण के पीछे का सटीक कानूनी तर्क तय नहीं किया जा सकता।
मामले में घटनाक्रम का यह क्रम अहम है: अब सुप्रीम कोर्ट में चुनौती उस सज़ा को लेकर है, जो अभियोजन पक्ष द्वारा शुरुआती फैसले को चुनौती देने के बाद काफी कठोर हो गई। इन खबरों में पोस्ट का पूरा पाठ, विस्तृत फैसले और ताज़ा अपील के आधार प्रकाशित नहीं किए गए हैं।
कानूनी और राजनयिक कार्रवाई का क्रम
घटनाक्रम गिरफ्तारी से लेकर सुप्रीम कोर्ट में अपील दाखिल होने तक का ब्यौरा देता है। अधिकतर खबरों में जुलाई और सितंबर की तारीखों के साथ साल नहीं बताया गया है, जबकि अपील दायर होने की दो खबरों में स्पष्ट रूप से 11 अक्टूबर, 2026 का उल्लेख है।
- 2 जुलाई: फेसबुक पर हुई बहस के बाद सिवारासा को गिरफ्तार किया गया।
- शुरुआती कार्यवाही: अल-अहसा की आपराधिक अदालत ने पांच साल जेल और 30 लाख रियाल का जुर्माना लगाया।
- 17 सितंबर: अभियोजन पक्ष ने शरिया कानून के तहत कार्यवाही की मांग की, जिसके बाद मौत की सज़ा सुनाई गई।
- 21 सितंबर: उनके परिवार ने श्रीलंका के राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके से मुलाकात की और सरकारी सहायता का आश्वासन मिला।
- 24 सितंबर: छह सांसदों ने सऊदी विदेश मंत्री फैसल बिन फरहान अल-सऊद को पत्र लिखकर क्षमादान की मांग की।
- 10 अक्टूबर: पहले की एक खबर में कहा गया कि परिजनों को बताया गया था कि सुप्रीम कोर्ट में अपील उसी दिन दायर होने की उम्मीद है।
- 11 अक्टूबर: बाद की खबरों में कहा गया कि अपील दायर हो चुकी है; इनमें से दो में 2026 का उल्लेख है।
10 अक्टूबर की खबर में अपील दायर होने की उम्मीद जताई गई थी, न कि दाखिल होने की पुष्टि की गई थी। बाद की खबरों में वास्तविक दाखिले की तारीख 11 अक्टूबर बताई गई है। उनमें इस अंतर की वजह नहीं बताई गई, इसलिए इसे इस बात का प्रमाण नहीं मानना चाहिए कि दो अलग-अलग अपीलें दायर हुईं।
सुप्रीम कोर्ट की अपील किसने तैयार की?
स्थानीय वकीलों को चुनौती तैयार करने में मदद देने के लिए श्रीलंका का प्रतिनिधिमंडल सऊदी अरब गया था। इसके वरिष्ठ सदस्यों में राष्ट्रपति के वकील उपुल कुमारप्पेरुमा, राष्ट्रपति के वकील फैज़र मुस्तफा और अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल असद नवावी शामिल थे। श्रीलंका में राष्ट्रपति के वकील का पद किसी वरिष्ठ अधिवक्ता को दिया जाने वाला पेशेवर सम्मान है।
खबरों में चौथे वकील का भी ज़िक्र है, जिनका नाम हफील पैरिस, हफील फ़ारिस या फ़ारिस फ़ज़ल अब्दुल हफील मोहम्मद लिखा गया है। नवावी का नाम अलग-अलग खबरों में आज़ाद नवावी और अज़ार्ड नवावी लिखा गया है, जबकि मुस्तफा का नाम फैज़र मुस्तफा भी दिया गया है। नामों की वर्तनी में इन अंतरों को प्रतिनिधिमंडल में अतिरिक्त सदस्यों का सबूत नहीं मानना चाहिए।
राजदूत अजवद ने रियाद स्थित दूतावास के माध्यम से विचार-विमर्श का समन्वय किया। खबरों में मोहम्मद रियाज़ुद्दीन सिल्मी को भी इस प्रयास में शामिल बताया गया है, जिन्हें मुस्तफा का समन्वय सचिव बताया गया।
जेद्दा में वाणिज्य दूतावास के प्रतिनिधि की पहचान को लेकर खबरों में मतभेद हैं। कुछ खबरों में न्यायाधीश मोहम्मद लाफिर को महावाणिज्यदूत बताया गया है, जबकि एक अन्य में उन्हें उप-वाणिज्यदूत कहा गया है। दूसरी खबरों में नाम जस्टिस मोहम्मद लाबा, जज एम.डी. मोहम्मद या जज एम.टी. मोहम्मद दिया गया है। इसलिए प्रतिनिधि के सटीक नाम और पद की पुष्टि ज़रूरी है।
काम के बंटवारे को लेकर खबरें अधिक एकमत हैं: श्रीलंकाई विशेषज्ञों ने कानूनी दस्तावेज़ तैयार करने में मदद की, सऊदी वकीलों ने अपील दाखिल की और राजनयिक अधिकारियों ने प्रक्रिया का समन्वय किया। किसी भी खबर में यह नहीं बताया गया कि प्रत्येक वकील ने कौन-कौन से विशिष्ट आधार तैयार किए।
सुप्रीम कोर्ट की समीक्षा से क्या तय हो सकता है
सऊदी अरब का सुप्रीम कोर्ट देश का सर्वोच्च न्यायिक प्राधिकरण बताया जाता है, जो मुख्य रूप से कानूनी और प्रक्रियागत आधारों पर निचली अदालतों के फैसलों की समीक्षा करता है। व्यावहारिक तौर पर इसका ध्यान इस बात पर होता है कि संबंधित कानून सही ढंग से लागू हुआ या नहीं और आवश्यक न्यायिक प्रक्रियाओं का पालन हुआ या नहीं।
इस विवरण से यह साबित नहीं होता कि सिवारासा की अपील में कौन-से तर्क दिए गए हैं। उनकी याचिका देखे बिना यह कहना जल्दबाज़ी होगी कि उनके वकीलों ने सबूतों से जुड़े किसी खास मुद्दे, अपराध के वर्गीकरण या माफ़ी मांगने के तरीके को चुनौती दी है।
अपील में मौत की सज़ा पलटने या हटाने की मांग की गई है। खबरों में सुनवाई की तारीख, फैसले की समय-सीमा या फांसी की तारीख का उल्लेख नहीं है। वे यह भी नहीं बतातीं कि अपील दाखिल होने से फांसी की किसी प्रक्रिया पर औपचारिक रोक लगी है या नहीं।
इन अनसुलझे सवालों से प्रक्रियागत घटनाक्रम और अंतिम नतीजे के बीच का फर्क स्पष्ट होता है। अपील दाखिल की जा चुकी है, लेकिन राहत देने वाले किसी फैसले की खबर नहीं आई है।
क्षमादान अभियान अदालतों से बाहर भी मदद मांग रहा
तमिल भाषी अल्पसंख्यक राजनीतिक दलों के छह सांसदों ने 24 सितंबर को सऊदी विदेश मंत्री फैसल बिन फरहान अल-सऊद को पत्र लिखकर क्षमादान की मांग की। उनकी अपील में कहा गया कि जानबूझकर इस्लाम का अपमान करना सिवारासा के स्वभाव में नहीं है।
इस पहल में शामिल सांसदों में से एक, जीवन थोंडमान ने माना कि विदेश में काम करने वाले लोगों का स्थानीय कानूनों और संस्कृति का सम्मान करना दायित्व है। हालांकि, उन्होंने सज़ा की अनुपातिकता पर सवाल उठाया:
मुझे नहीं लगता कि ईशनिंदा के लिए किसी व्यक्ति को मौत की सज़ा दी जानी चाहिए।
थोंडमान ने श्रीलंका से भारत और अमेरिका सहित सऊदी अरब के सहयोगी देशों की मदद मांगने का आह्वान किया। विपक्षी सांसद मनो गणेशन ने अलग से राष्ट्रपति दिसानायके से अपील की कि वे मानवीय समाधान के लिए सऊदी अरब के युवराज मोहम्मद बिन सलमान से हस्तक्षेप करने को भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कहें।
विदेश मंत्री विजिता हेराथ ने श्रीलंका की संसद को बताया कि अधिकारी सज़ा पलटने के लिए सऊदी अरब में दो कानूनी दलों के साथ काम कर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि दिसानायके की ओर से क्षमादान की अपील लेकर एक संसदीय प्रतिनिधिमंडल के रियाद जाने की उम्मीद है। खबरों में इस दौरे के वास्तव में होने की पुष्टि नहीं की गई है।
धार्मिक संगठनों ने सरकार से और ठोस कार्रवाई की मांग की है, जबकि नागरिक समाज समूहों ने सज़ा के खिलाफ याचिकाएं शुरू की हैं। इन कोशिशों का उद्देश्य राजनयिक स्तर पर ध्यान बढ़ाना है, लेकिन क्षमादान पर सऊदी अरब के किसी फैसले की खबर नहीं आई है।
जेल में संपर्क और परिवार की गुहार
सुप्रीम कोर्ट में अपील दाखिल होने से पहले राजदूत अजवद ने दम्माम सेंट्रल जेल में सिवारासा से मुलाकात की। दूतावास के एक बयान का हवाला देने वाली खबर के अनुसार, राजदूत ने उनकी ज़रूरतों और चिंताओं पर चर्चा की और श्रीलंका के विदेश मंत्रालय के निर्देश पर उन्हें वाणिज्य दूतावास और कानूनी सहायता का भरोसा दिलाया।
बताया जाता है कि अजवद ने सिवारासा को अपना निजी टेलीफोन नंबर दिया, ताकि वे सीधे संपर्क कर सकें। यह बात ऐसे मामले में अहम है, जिसमें परिवार ने कहा था कि उसे 28 सितंबर के बाद से उनकी कोई खबर नहीं मिली।
हेराथ ने संसद को बताया कि एक साथी कैदी के साथ झगड़े में चोट और खरोंच आने के बाद सिवारासा को दूसरी कोठरी में भेजा गया था। इसके बाद उनकी कोई चिकित्सकीय जांच हुई या नहीं, इसका विवरण नहीं दिया गया है।
उनकी मां, रसमनिकम योगलक्ष्मी ने दया और बेटे को परिवार के पास लौटाने की अपील की:
मैंने अपने बेटे से जो गलतियां हुईं, उनके लिए दया की गुहार लगाती हूं। कृपया उसे माफ कर हमें लौटा दें।
21 सितंबर को परिवार की दिसानायके से मुलाकात के बाद सरकार ने माफी दिलाने के प्रयास का वादा किया और कानूनी खर्च उठाने की पेशकश की। इन आश्वासनों से परिवार को कानूनी प्रतिनिधित्व हासिल करने में मदद मिलती है, लेकिन इनसे यह तय नहीं होता कि सऊदी अदालतें क्या फैसला देंगी।
यात्रा में बाधा और व्यापक महत्व
खबरों के मुताबिक, सऊदी राजधानी पर हालिया हमलों के बाद तय वापसी उड़ानें रद्द होने से दौरे पर आए श्रीलंकाई वकील रियाद में फंस गए। एक खबर में खास तौर पर मिसाइल हमलों का उल्लेख है, जबकि अन्य में सामान्य तौर पर हमलों की बात कही गई है। उड़ानें रद्द होने के बारे में आगे कोई जानकारी या रवाना होने की नई तारीख नहीं दी गई।
खबरों के मुताबिक, इस बाधा के बावजूद अपील दाखिल करने का काम पूरा हुआ। यह न्यायिक समय-सारिणी से अलग मुद्दा है और खबरों से यह साबित नहीं होता कि इससे सुप्रीम कोर्ट में मामले पर विचार में देरी हुई।
यह मामला प्रवासियों के एक बड़े समुदाय के लिए भी अहम है। श्रीलंका के दूतावास के हवाले से दिए गए अनुमानों के मुताबिक, सऊदी अरब में 245,000 से अधिक श्रीलंकाई रहते और काम करते हैं।
एक खबर में सऊदी अरब में फांसी की संख्या 2025 में कम से कम 356 और 2024 में 345 बताई गई है, यानी 11 या लगभग 3.2% की वृद्धि। ये राष्ट्रीय आंकड़े मृत्युदंड के इस्तेमाल का संदर्भ देते हैं, लेकिन सिवारासा के मामले का व्यक्तिगत नतीजा नहीं बताते।
ऑनलाइन भाषण से जुड़ा एक अलग मामला दिखाता है कि मौत की सज़ा पलटने और रिहाई को अलग-अलग समझना चाहिए। सेवानिवृत्त सऊदी शिक्षक मोहम्मद अल-ग़ामदी को सोशल मीडिया टिप्पणियों के लिए 2023 में मौत की सज़ा सुनाई गई थी। मानवाधिकार संगठनों का हवाला देने वाली खबरों के अनुसार, बाद में वह फैसला पलट दिया गया और उसकी जगह 30 साल की जेल की सज़ा दी गई। उनका मामला दिखाता है कि सज़ा बदल सकती है, जबकि जेल की लंबी सज़ा बरकरार रह सकती है; इससे सिवारासा की अपील पर लागू होने वाली कानूनी मिसाल साबित नहीं होती।
मुख्य बातें
- सिवारासा की मौत की सज़ा के खिलाफ अपील 11 अक्टूबर को दाखिल होने की खबर आई; दो खबरों में 2026 का उल्लेख है।
- शुरुआत में उन्हें पांच साल जेल और 30 लाख रियाल का जुर्माना मिला था, जिसके बाद अभियोजन पक्ष ने शरिया कानून के तहत कार्यवाही की मांग की।
- श्रीलंकाई और सऊदी वकीलों ने रियाद स्थित श्रीलंका के दूतावास के समन्वय से अपील तैयार की।
- सांसद अदालती चुनौती के साथ-साथ क्षमादान और अंतरराष्ट्रीय सहायता की मांग कर रहे हैं।
- रियाद में हमलों के बाद वापसी उड़ानें रद्द होने से दौरे पर आया कानूनी दल फंस गया था।
- सुप्रीम कोर्ट के फैसले, सुनवाई की तारीख या फांसी की समय-सारिणी की कोई खबर नहीं है।






