वायु शक्ति में बड़े बदलाव के बीच पाकिस्तान ने चीनी J-35 स्टील्थ लड़ाकू विमानों के लिए समझौता किया

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Shenyang J-35: China’s Answer to the F-35 Stealth Fighter

स्टील्थ क्षमता की बाधा टूटी

चीनी लड़ाकू विमानों और मिसाइलों की मदद से पाकिस्तानी बलों द्वारा भारत के बड़े हवाई हमले को सफलतापूर्वक नाकाम किए जाने के एक साल बाद, पाकिस्तान वायु सेना ने हवाई युद्ध की पांचवीं पीढ़ी में छलांग लगाने का इरादा जताया है। वायु उप-प्रमुख एयर वाइस मार्शल तारिक गाजी ने इस्लामाबाद में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में पुष्टि की कि वायु सेना ने शेनयांग J-35 स्टील्थ लड़ाकू विमान के लिए एक "प्रारंभिक सहयोग समझौते" पर हस्ताक्षर किए हैं। यह विमान दक्षिण एशिया के सैन्य संतुलन में गुणात्मक बदलाव ला सकता है और नई दिल्ली के समान तकनीक हासिल करने से कई साल पहले इस्लामाबाद को परिचालन स्टील्थ क्षमता दे सकता है।

विषय-सूची
  1. स्टील्थ क्षमता की बाधा टूटी
  2. गिर्फाल्कन की तकनीकी बनावट
  3. समय का लाभ
  4. विमान से आगे
  5. संकेत और इनकार
  6. क्षेत्रीय समीकरणों में बदलाव
  7. निष्कर्ष

यह घोषणा चीन की एविएशन इंडस्ट्री कॉरपोरेशन द्वारा हाल ही में J-35AE के निर्यात संस्करण का अनावरण किए जाने के साथ हुई है। सरकारी प्रसारक चाइना सेंट्रल टेलीविजन ने ऐसे फुटेज प्रसारित किए जिनमें पीपुल्स लिबरेशन आर्मी एयर फोर्स के चिह्नों के बजाय निर्माता के लोगो वाला पूरी तरह परिचालन योग्य निर्यात मॉडल दिखाया गया। J-35AE नाम वाला यह विमान पहली बार है जब बीजिंग ने अपने दो इंजन वाले स्टील्थ विमान का पूर्ण निर्यात संस्करण प्रदर्शित किया है। अटकलें हैं कि पाकिस्तान को शुरुआती खेप 2026 के मध्य तक मिल सकती है। यह तेज समय-सीमा PAF को चीन की पांचवीं पीढ़ी की लड़ाकू विमानन तकनीक का पहला विदेशी संचालक बना सकती है।

इस खरीद की पृष्ठभूमि मई 2025 के ऑपरेशन सिंदूर तक जाती है, जब PAF ने भारतीय हवाई अभियानों को विफल करने के लिए चीनी J-10C लड़ाकू विमानों और JF-17 थंडर जेट पर काफी भरोसा किया था। भारतीय वायु सेना द्वारा उड़ाए गए फ्रांसीसी राफेल और रूसी Su-30MKI विमानों के खिलाफ इन प्लेटफॉर्मों का सफल इस्तेमाल बीजिंग के निर्यात तंत्र की प्रभावशीलता का प्रमाण था। अब J-35 समझौते के साथ पाकिस्तान पूरी तरह एकीकृत चीनी एयरोस्पेस युद्ध सिद्धांत की ओर बढ़ने की स्थिति में दिख रहा है। वह अलग-अलग विमान खरीदने से आगे बढ़कर व्यापक नेटवर्क-केंद्रित युद्ध क्षमता की ओर जा रहा है।

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गिर्फाल्कन की तकनीकी बनावट

J-35 परिवार चीन का दूसरा परिचालन पांचवीं पीढ़ी का डिजाइन है। इसे शेनयांग एयरक्राफ्ट कॉरपोरेशन ने भारी J-20 के हल्के पूरक के रूप में विकसित किया है। निर्यात संस्करण J-35AE में अपने घरेलू समकक्षों की तरह दो इंजन, आंतरिक हथियार कक्ष और उन्नत एवियोनिक्स हैं, साथ ही विदेशी ग्राहकों की जरूरतों के अनुरूप बदलाव किए गए हैं। विमान में धड़ के साथ घुला-मिला विंग डिजाइन, डाइवर्टरलेस सुपरसोनिक एयर इनलेट, किनारों के साथ संरेखित नियंत्रण सतहें और रडार-अवशोषक कोटिंग हैं, जो उसकी विद्युतचुंबकीय पहचान को कम करती हैं।

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प्रदर्शन संबंधी आंकड़ों के अनुसार इसकी अधिकतम गति लगभग मैक 1.8 और युद्धक त्रिज्या 1,200 किलोमीटर तक है, जिससे विवादित दक्षिण एशियाई हवाई क्षेत्र में दूर तक हमले करना संभव होगा। विमान का सक्रिय इलेक्ट्रॉनिक रूप से स्कैन किया जाने वाला एरे रडार एक साथ कई लक्ष्यों को ट्रैक कर उन पर निशाना साध सकता है। आंतरिक रूप से PL-15 दृश्य सीमा से परे मार करने वाली मिसाइल और PL-10 कम दूरी की हवा-से-हवा मिसाइल ले जाने से युद्ध के दौरान इसका रडार क्रॉस सेक्शन कम बना रहता है। पहले देखो, पहले निशाना साधो की यह क्षमता पाकिस्तानी पायलटों को विरोधी विमानों पर तब हमला करने देगी, जब तक जवाबी लक्ष्य निर्धारण की व्यवस्था स्थापित न हो जाए।

विश्लेषकों के अनुसार, यह प्लेटफॉर्म पहले के FC-31 प्रदर्शन मॉडल से J-31 प्रोटोटाइप और फिर मौजूदा J-35 रूप तक विकसित हुआ है। मौजूदा संस्करण में अधिक शक्तिशाली WS-21 इंजन हैं और आगे चलकर WS-19 प्रणोदन प्रणाली लगाने की योजना है। विमान का सेंसर-फ्यूजन ढांचा इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल लक्ष्य निर्धारण प्रणालियों और नेटवर्क पर डेटा साझा करने की क्षमता को एकीकृत करता है, जिससे यह व्यापक युद्ध तंत्र के भीतर काम कर सकता है। गति और गतिशीलता पर निर्भर चौथी पीढ़ी के लड़ाकू विमानों के विपरीत, J-35 सूचना-प्रभुत्व और पहचान घटाने को प्राथमिकता देता है। इससे समन्वित स्टील्थ अभियानों के खिलाफ पारंपरिक रडार से लक्ष्य पकड़ने की समय-सीमा नाकाफी हो जाती है।

समय का लाभ

संभावित खरीद का शायद सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसका समय है। भारत के पास राफेल, Su-30MKI और मिराज 2000 सहित 4.5 पीढ़ी के लड़ाकू विमानों का बड़ा बेड़ा है, लेकिन उसके पास कोई परिचालन स्टील्थ लड़ाकू क्षमता नहीं है। भारतीय वायु सेना का स्वदेशी एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट कार्यक्रम विकास के चरणों से गुजर रहा है, लेकिन इसके 2030 के दशक के मध्य से पहले परिचालन परिपक्वता हासिल करने की उम्मीद नहीं है। इससे सात से दस साल की संभावित अवधि बनती है, जिसमें पाकिस्तान कम दृश्यता वाले हवाई युद्ध में गुणात्मक बढ़त बनाए रख सकता है।

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नई दिल्ली के रक्षा योजनाकारों के सामने दो मोर्चों पर चुनौती का सामना करने की आशंका है: चीन की PLAAF के पास लगभग 200 J-20 लड़ाकू विमान हैं और 2030 तक यह संख्या दोगुनी हो सकती है, जबकि पाकिस्तान J-35 स्क्वाड्रन तैनात कर सकता है। भारत के पास स्टील्थ क्षमता न होने से उसे कम दृश्यता वाले लक्ष्यों का पता लगाने और उन्हें ट्रैक करने के लिए जमीन पर आधारित रडार नेटवर्क और हवाई पूर्व चेतावनी प्रणालियों की कई परतों पर निर्भर रहना पड़ेगा। भारतीय वायु सेना के सेवानिवृत्त अधिकारियों ने चिंता जताई है कि पाकिस्तान के सीमित स्टील्थ स्क्वाड्रन भी आक्रामक अभियानों के बजाय रक्षात्मक हवाई अभियानों पर संसाधनों का बड़ा हिस्सा लगाने के लिए मजबूर कर सकते हैं।

रिपोर्टों के अनुसार, डिलीवरी की समय-सीमा 2026 के आखिर से घटाकर 2026 के मध्य किए जाने से उत्पादन बढ़ाने की चीन की क्षमता पर उसका भरोसा और इस क्षमता को जल्द हासिल करने की इस्लामाबाद की बेचैनी, दोनों झलकती हैं। बताया जाता है कि चीनी असेंबली लाइनें हर 72 घंटे में एक J-35 बनाने में सक्षम हैं, हालांकि निर्यात संस्करणों का कार्यक्रम अलग हो सकता है। पाकिस्तान के लिए सवाल यह है कि क्या उसकी वित्तीय सीमाएं पांचवीं पीढ़ी के विमानों के संचालन के लिए जरूरी बुनियादी ढांचे में निवेश की गुंजाइश देंगी। इसमें तापमान-नियंत्रित हैंगर, विशेष रखरखाव सुविधाएं और नेटवर्क-केंद्रित युद्ध के लिए जरूरी सुरक्षित डेटा-लिंक ढांचा शामिल हैं।

विमान से आगे

J-35 की खरीद को अकेले नहीं देखा जा सकता। रिपोर्टों के अनुसार, समझौते में KJ-500 हवाई पूर्व चेतावनी और नियंत्रण विमान तथा HQ-19 उच्च ऊंचाई वाली मिसाइल रक्षा प्रणाली सहित व्यापक युद्ध तंत्र शामिल है। यह पैकेज आधारित तरीका बीजिंग की उस बदलती निर्यात रणनीति को दर्शाता है, जिसमें अलग-अलग प्लेटफॉर्म के बजाय एकीकृत परिचालन ढांचे बेचे जाते हैं। KJ-500 लंबी दूरी से हवाई निगरानी और युद्धक्षेत्र का समन्वय करता है, जबकि HQ-19 अमेरिकी THAAD प्रणाली जैसी वायुमंडल-बाह्य अवरोधन क्षमता देता है।

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एयर वाइस मार्शल गाजी द्वारा अगली पीढ़ी के प्लेटफॉर्म के साथ लंबी दूरी के सटीक हथियारों का जिक्र संकेत देता है कि पाकिस्तान स्टील्थ के जरिए हवाई सुरक्षा में घुसपैठ और दूर से दागे जाने वाले हथियारों को मिलाकर एकीकृत गहरे हमले की क्षमता चाहता है। पाकिस्तान द्वारा पहले से परीक्षण की गई फतह श्रृंखला की क्रूज मिसाइलें और पनडुब्बी से दागी जाने वाली प्रणालियां इस ढांचे की पूरक हैं, जिससे पता लगाने, ट्रैक करने और निशाना साधने की बहुस्तरीय युद्ध-श्रृंखला बनती है। सेवानिवृत्त ग्रुप कैप्टन सुल्तान एम. हाली ने संभावित खरीद को पाकिस्तान का "पूरे युद्ध तंत्र के साथ पांचवीं पीढ़ी के दौर में प्रवेश" बताया और केवल पुराने विमानों की जगह नए विमान लाने के बजाय नेटवर्क-केंद्रित एकीकरण पर जोर दिया।

यह तंत्र चीनी एयरोस्पेस प्रणालियों के साथ पाकिस्तान की मौजूदा परिचितता पर आधारित है। PAF J-10C का पहला और एकमात्र निर्यात संचालक है, जबकि JF-17 थंडर कार्यक्रम ने कामरा में सह-उत्पादन का ढांचा स्थापित किया, जहां 58 प्रतिशत निर्माण स्थानीय स्तर पर होता है। J-10C विमानों को शामिल करने से चीनी एवियोनिक्स, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रोटोकॉल और दृश्य सीमा से परे मार करने वाली मिसाइल प्रणालियों के साथ तालमेल तेज हुआ। J-35 इस सैन्य-तकनीकी निर्भरता की स्वाभाविक अगली कड़ी है। संगत रखरखाव प्रणालियों और स्थापित आपूर्ति श्रृंखला संबंधों से वंचित अन्य संभावित निर्यात ग्राहकों की तुलना में इससे एकीकरण का जोखिम घटता है।

संकेत और इनकार

J-35 को सेवा में शामिल करने की तैयारियों के बढ़ते संकेतों के बावजूद, पाकिस्तान के आधिकारिक बयान जानबूझकर अस्पष्ट रहे हैं। जुलाई 2025 में रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने खरीद की खबरों का सार्वजनिक रूप से खंडन करते हुए उन्हें "मीडिया की अटकलें" बताया, जिनसे मुख्य रूप से चीनी रक्षा विपणन को फायदा होता है। यह खंडन उस पाकिस्तानी सरकारी सोशल मीडिया पोस्ट को हटाए जाने के बाद आया था, जिसमें 4.6 अरब डॉलर के सौदे के तहत लगभग 40 J-35 लड़ाकू विमानों के साथ KJ-500 और HQ-19 प्रणालियों का जिक्र था। हालांकि, सितंबर 2025 में राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी की AVIC सुविधाओं की बाद की यात्रा ने इस क्षेत्र में उच्च स्तर की निरंतर दिलचस्पी को रेखांकित किया।

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विमानन शोधकर्ता एंड्रियास रुप्प्रेख्त ने समय से पहले निष्कर्ष निकालने के प्रति आगाह किया है। उन्होंने कहा कि J-35AE का निर्यात प्रोटोटाइप उड़ चुका है, लेकिन डिलीवरी का कोई बाध्यकारी कार्यक्रम तय नहीं हुआ है। उनका अनुमान है कि किसी अघोषित ग्राहक ने शुरुआती विकास का खर्च उठाया हो सकता है और संयुक्त अरब अमीरात असल में इसे अपनाने वाला पहला ग्राहक बन सकता है। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय की 2025 की कांग्रेस रिपोर्ट में UAE के साथ मिस्र और सऊदी अरब को भी J-35 में रुचि रखने वाले देशों के रूप में शामिल किया गया था। ये देश इजरायल की गुणात्मक सैन्य बढ़त बनाए रखने के लिए बनाए गए अमेरिकी निर्यात प्रतिबंधों से बचने की कोशिश कर रहे हैं।

अन्य संभावित ग्राहकों की संभावना बीजिंग की रक्षा निर्यात महत्वाकांक्षाओं से जुड़े व्यावसायिक जोखिमों को उजागर करती है। चीन को बड़ी संख्या में उच्च क्षमता वाले लड़ाकू विमान निर्यात करने का व्यापक अनुभव नहीं है, और अंतरराष्ट्रीय ग्राहक आम तौर पर बिक्री के बाद मजबूत सहायता, रखरखाव का बुनियादी ढांचा और पूरी ग्राहक सेवा चाहते हैं। चीनी मूल के लड़ाकू विमानों का पाकिस्तान में पहले से मौजूद ढांचा इन जोखिमों को काफी घटाता है। इससे आधिकारिक खंडन और अरबों डॉलर की खरीद में बाधा बन सकने वाली वित्तीय सीमाओं के बावजूद इस्लामाबाद शुरुआती खेप का सबसे संभावित प्राप्तकर्ता बनता है।

क्षेत्रीय समीकरणों में बदलाव

J-35 लड़ाकू विमानों को संभावित रूप से सेवा में शामिल करना पाकिस्तान की व्यापक रक्षा कूटनीति पहलों से जुड़ा है। सितंबर 2025 में हुए पारस्परिक रक्षा समझौते के तहत PAF ने हाल ही में सऊदी अरब में JF-17 स्क्वाड्रन तैनात किए। वहीं, बांग्लादेश द्वारा JF-17 ब्लॉक 3 विमान और सुपर मुश्शक प्रशिक्षक विमान खरीदने को लेकर बातचीत जारी है। ये गतिविधियां दिखाती हैं कि पाकिस्तान अपने लिए पांचवीं पीढ़ी की क्षमता हासिल करने के साथ-साथ क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ाने के लिए चीन से जुड़े अपने एयरोस्पेस क्षेत्र का इस्तेमाल कर रहा है।

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भारत के लिए रणनीतिक परिणाम तात्कालिक परिचालन चिंताओं से आगे तक जाते हैं। चीनी पांचवीं पीढ़ी की तकनीक के प्रदर्शनकर्ता के रूप में पाकिस्तान का उभरना मध्य पूर्व, अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया में बीजिंग के रक्षा औद्योगिक मॉडल को वैधता दे सकता है। राजनीतिक बाधाओं के कारण अमेरिकी F-35 लड़ाकू विमान खरीदने में असमर्थ या उन्हें खरीदने की सामर्थ्य न रखने वाले देश J-35 को व्यवहार्य विकल्प मान सकते हैं, खासकर जब उसे एकीकृत तंत्र के पैकेज के रूप में पेश किया जाए। इससे उच्च क्षमता वाले लड़ाकू विमानों के बाजार में पश्चिमी देशों के वर्चस्व को चुनौती मिल सकती है और भारत की सुरक्षा योजना भी जटिल हो सकती है।

संभावित सौदे की वित्तीय व्यवस्था अभी स्पष्ट नहीं है। पाकिस्तान के रक्षा बजट पर काफी दबाव है, जबकि पांचवीं पीढ़ी की क्षमता बनाए रखने के लिए शुरुआती खरीद लागत से कहीं अधिक निवेश की जरूरत होती है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि चीनी रक्षा तंत्र के साथ तालमेल चाहने वाले खाड़ी देशों से तीसरे पक्ष का वित्तपोषण इस खरीद को संभव बना सकता है। बाहरी धन मिले या घरेलू बजट से आवंटन हो, इस कार्यक्रम पर कई अरब डॉलर खर्च हो सकते हैं। यह एक दीर्घकालिक रणनीतिक प्रतिबद्धता होगी, जो आने वाले दशकों तक इस्लामाबाद को बीजिंग के एयरोस्पेस औद्योगिक आधार से बांधे रखेगी।

निष्कर्ष

  • पाकिस्तान ने चीनी J-35 स्टील्थ लड़ाकू विमानों के लिए एक प्रारंभिक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इससे वह बीजिंग की पांचवीं पीढ़ी की लड़ाकू विमानन तकनीक का पहला निर्यात संचालक बन सकता है।
  • डिलीवरी 2026 के मध्य से शुरू हो सकती है। इससे भारत पर अस्थायी गुणात्मक बढ़त मिल सकती है, जिसके पास कोई स्टील्थ लड़ाकू विमान नहीं है और जो 2030 के दशक के मध्य से पहले स्वदेशी समकक्ष विमान तैनात नहीं कर पाएगा।
  • खरीद में KJ-500 हवाई चेतावनी विमान और HQ-19 मिसाइल रक्षा प्रणाली जैसी एकीकृत सहायता प्रणालियां शामिल होने की संभावना है। यह केवल लड़ाकू विमानों की खरीद नहीं, बल्कि एक व्यापक युद्ध तंत्र होगा।
  • पाकिस्तान के रक्षा अधिकारियों के आधिकारिक खंडन के बावजूद, पायलट प्रशिक्षण की अफवाहें, बुनियादी ढांचे की तैयारी और J-35AE के निर्यात संस्करण का CCTV फुटेज बताते हैं कि बातचीत उन्नत चरण में है।
  • यह सौदा चीन पर पाकिस्तान की बढ़ती सैन्य-तकनीकी निर्भरता को और मजबूत करता है। साथ ही, भारत द्वारा जवाबी उपायों और अंतरिम स्टील्थ विकल्पों पर विचार किए जाने के बीच दक्षिण एशिया में हथियारों की होड़ तेज हो सकती है।
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