आधुनिकीकरण से पूरे दक्षिण-पूर्व एशिया में इस्लामी पुनरुत्थान को बल

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आधुनिकीकरण से पूरे दक्षिण-पूर्व एशिया में इस्लामी पुनरुत्थान को बल

शांत परिवर्तन

दशकों तक दक्षिण-पूर्व एशिया की सरकारों ने इस्लाम के उभार को मुख्यतः सुरक्षा चिंताओं के नजरिये से देखा। आतंकवादी नेटवर्क और हिंसक उग्रवाद का भय नीतिगत चर्चाओं पर हावी रहा और इसके चलते आतंकवाद-विरोधी सख्त कदम उठाए गए, जिनसे उग्रवादी समूहों को सफलतापूर्वक दबाया गया। आज एक बुनियादी रूप से अलग बदलाव इस क्षेत्र के धार्मिक परिदृश्य को नया रूप दे रहा है। दक्षिण-पूर्व एशिया के दो सबसे बड़े मुस्लिम-बहुल देशों मलेशिया और इंडोनेशिया में इस्लाम हिंसा के जरिये नहीं, बल्कि आधुनिक जीवन की व्यवस्थाओं के माध्यम से अपनी जगह बना रहा है। राजनीतिक अभियानों, कानूनी संहिताओं, उपभोक्ता पसंदों और सामाजिक मानदंडों में धर्म की मौजूदगी लगातार अधिक दिख रही है। इससे इस्लामी अभिव्यक्ति का एक नया रूप उभर रहा है, जो आर्थिक विकास और तकनीकी प्रगति के साथ फल-फूल रहा है। यह शांतिपूर्ण लेकिन गहरा परिवर्तन दर्शाता है कि शास्त्रीय समाजशास्त्रीय सिद्धांतों की भविष्यवाणी के विपरीत, आधुनिकीकरण इस क्षेत्र को धर्मनिरपेक्ष नहीं बना रहा। इसके बजाय, आर्थिक विकास, डिजिटल संपर्क और संस्थागत सुधार धार्मिक दावेदारी के नए रास्ते खोल रहे हैं और करीब 24.2 करोड़ मुसलमानों वाले इस क्षेत्र के सार्वजनिक और निजी जीवन में इस्लामी मूल्यों को और गहराई से स्थापित कर रहे हैं। ये मुसलमान दक्षिण-पूर्व एशिया की कुल आबादी का लगभग 42 प्रतिशत हैं।

विषय-सूची
  1. शांत परिवर्तन
  2. ऐतिहासिक नींव और आज का प्रभाव
  3. हलाल अर्थव्यवस्था और आस्थावान उपभोक्ता
  4. कृत्रिम बुद्धिमत्ता और धार्मिक मूल्य
  5. कानूनी दावेदारी और सांस्कृतिक तनाव
  6. नुसंतारा इस्लाम: एक उदार विकल्प
  7. अंतरराष्ट्रीय एकजुटता और फलस्तीन का मुद्दा
  8. मुख्य बातें
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ऐतिहासिक नींव और आज का प्रभाव

दक्षिण-पूर्व एशिया में इस्लाम की मौजूदगी एक सहस्राब्दी से भी पुरानी है। अरब, फारसी और भारतीय व्यापारी इसे हिंद महासागर के रास्ते लेकर आए और यूरोपीय औपनिवेशिक शक्तियों के आगमन से बहुत पहले सुमात्रा से मलक्का तक के बंदरगाह शहरों में अपने ठिकाने बनाए। दुनिया के अन्य हिस्सों में दिखे विजय-आधारित विस्तार से अलग, द्वीपसमूह में इस्लाम का प्रसार मुख्यतः व्यापार और सूफी मिशनरियों की शिक्षाओं के जरिये हुआ। उन्होंने इस्लामी सिद्धांतों को स्थानीय संदर्भों के अनुरूप कुशलता से ढाला। शांतिपूर्ण मेल-जोल का यह ऐतिहासिक स्वरूप हाल के क्षेत्रीय अतीत से अलग है, जब उग्रवादी समूहों ने बम धमाकों और विद्रोह के जरिये स्थिरता को खतरे में डाला था। कॉर्नेल विश्वविद्यालय में आधुनिक दक्षिण-पूर्व एशियाई इतिहास के प्रोफेसर एरिक टैग्लियाकोज़ो के अनुसार, दक्षिण-पूर्व एशिया और मध्य पूर्व के बीच संबंध हमेशा विविध रहे हैं और इनमें धर्म के साथ-साथ व्यापार, तीर्थयात्रा तथा सांस्कृतिक आदान-प्रदान भी शामिल रहे हैं। हज पर अपने शोध में टैग्लियाकोज़ो बताते हैं कि इंडोनेशियाई तीर्थयात्री 17वीं सदी से मक्का जाते रहे हैं। 19वीं सदी में भाप के जहाजों के चलन ने इस यात्रा को अभिजात वर्ग के प्रयास से बदलकर जन-सामान्य की तीर्थयात्रा बना दिया। आज इंडोनेशिया हर साल 2 लाख से अधिक तीर्थयात्रियों को सऊदी अरब भेजता है, जो किसी भी अन्य देश से ज्यादा हैं। इससे वे आध्यात्मिक संबंध और मजबूत होते हैं जो धार्मिक रुझानों को लगातार आकार दे रहे हैं। इस्लाम के शुरुआती प्रसार में मददगार सूफी सिलसिलों ने रहस्यवाद और सहिष्णुता पर जोर दिया। इससे वह परंपरा बनी जिसे विद्वान अब नुसंतारा इस्लाम कहते हैं। ऐतिहासिक रूप से इस परंपरा में स्थानीय रीति-रिवाजों और रूढ़ धार्मिक आचरण, दोनों के लिए जगह रही है।

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हलाल अर्थव्यवस्था और आस्थावान उपभोक्ता

हाल के सर्वेक्षण बताते हैं कि पूरे दक्षिण-पूर्व एशिया में धार्मिक आचरण किस हद तक उपभोक्ता व्यवहार और आर्थिक फैसलों से जुड़ गया है। वंडरमैन थॉम्पसन इंटेलिजेंस और मुस्लिम इंटेल लैब के शोध के अनुसार, इस क्षेत्र के 91 प्रतिशत मुस्लिम उत्तरदाताओं ने अल्लाह के साथ मजबूत संबंध को बहुत महत्वपूर्ण बताया, जबकि केवल 34 प्रतिशत ने धन को प्राथमिकता दी। आंकड़ों से पता चलता है कि मलेशिया और इंडोनेशिया के 84 प्रतिशत मुसलमान दिन में पांच बार नमाज पढ़ते हैं और 33 प्रतिशत खुद को अपने माता-पिता से अधिक धर्मपरायण मानते हैं। धर्म के इस पुनरुत्थान से ऐसे लाभदायक बाजार बन रहे हैं, जहां आस्था और आधुनिक कारोबार का मेल है। ग्लोबल इस्लामिक इकॉनमी इंडिकेटर के अनुसार, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के साथ मलेशिया और इंडोनेशिया दुनिया के चार सबसे बड़े हलाल बाजारों में शामिल हैं। इस क्षेत्र में खाद्य पदार्थ, इस्लामी वित्त, मुस्लिम-अनुकूल पर्यटन और धार्मिक मीडिया शामिल हैं। शरिया-अनुरूप कोषों में निवेश 20 प्रतिशत बढ़ने और बच्चों के लिए इस्लामी शैक्षिक सामग्री की सफलता से मलेशिया ने अपना शीर्ष स्थान कायम रखा है। इसके आर्थिक प्रभाव पारंपरिक क्षेत्रों से आगे तक फैले हैं। दक्षिण-पूर्व एशिया के 61 प्रतिशत मुसलमान बैंकिंग और निवेश के विकल्पों में हलाल प्रमाणन को ध्यान में रखते हैं, जबकि 77 प्रतिशत यात्रा की जगह चुनते समय हलाल सुविधाओं की उपलब्धता पर विचार करते हैं। शायद सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि 85 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने खास तौर पर मुसलमानों के लिए बनाए गए मेटावर्स में रुचि जताई और 53 प्रतिशत अपने स्मार्टफोन पर नमाज तथा कुरान से जुड़े ऐप नियमित रूप से इस्तेमाल करते हैं। ये आंकड़े बताते हैं कि डिजिटल आधुनिकीकरण धार्मिक अभिव्यक्ति का माध्यम बन रहा है, उसका विकल्प नहीं।

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कृत्रिम बुद्धिमत्ता और धार्मिक मूल्य

अत्याधुनिक तकनीक और इस्लामी नैतिकता का मेल अप्रत्याशित रूप से सार्वजनिक चर्चा का विषय बन गया है। मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम ने हाल ही में सॉफ्टवेयर डेवलपरों से कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणालियों में इस्लामी मूल्य शामिल करने का आग्रह किया। उनका तर्क था कि इससे यह सुनिश्चित होगा कि तकनीक नैतिक रूप से मानवता की सेवा करे। 2022 के आखिर में पदभार संभालने के बाद से अनवर ने मलेशिया के आर्थिक एजेंडे के हिस्से के रूप में एआई विकास को प्राथमिकता दी है। उनका कहना है कि धार्मिक ढांचे एल्गोरिदम से जुड़े फैसलों का मार्गदर्शन कर सकते हैं। इस प्रस्ताव से मशीन लर्निंग प्रणालियों में नैतिक सिद्धांतों को शामिल करने से जुड़े जटिल सवाल उठते हैं। आलोचकों का कहना है कि इस्लामी कानून में, अन्य सभी धार्मिक परंपराओं की तरह, अलग-अलग विचारधाराओं और सांस्कृतिक संदर्भों के अनुसार व्याख्या में भिन्नता है। एआई में किसी एक धर्मशास्त्रीय ढांचे को शामिल करने से खास मत की व्याख्या दर्ज हो सकती है, जिसे सभी मुसलमान साझा नहीं करते या जो गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों को भेदभावपूर्ण लग सकती है। यह सुझाव क्षेत्र की आधुनिकीकरण प्रक्रिया में मौजूद व्यापक तनाव को उजागर करता है। वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए जहां सरकारें तकनीकी प्रगति को बढ़ावा दे रही हैं, वहीं रूढ़िवादी धार्मिक समूह चाहते हैं कि विकास इस्लामी सिद्धांतों के अनुरूप रहे। इस स्थिति से वित्त, शिक्षा और डिजिटल बुनियादी ढांचे जैसी आधुनिक संस्थाओं को इस्लामी स्वरूप देने का दबाव बनता है, ताकि धार्मिक पहचान की कीमत पर प्रगति न हो।

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कानूनी दावेदारी और सांस्कृतिक तनाव

इस्लाम के साथ अधिक तालमेल की कोशिश अलग-अलग देशों में अलग रूप लेती है और कभी-कभी धार्मिक रूढ़िवाद तथा स्थानीय परंपराओं के बीच टकराव पैदा करती है। इंडोनेशिया के एकमात्र शरिया-शासित प्रांत आचेह में हाल की एक घटना ने इन तनावों को सामने ला दिया। राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिता के दौरान बारिश रोकने के लिए राज्य की निर्माण कंपनियों ने एक वर्षा-ओझा को काम पर रखा था, जिसे अधिकारियों ने प्रांत से बाहर कर दिया। धार्मिक नेताओं ने ओझा की जावानी लोक-परंपरा वाली रस्मों को शिर्क (बहुदेववाद) बताते हुए उनकी निंदा की, लेकिन अरबी शब्दावली वाली इसी तरह की रहस्यवादी प्रथाओं, जैसे रुक़्या (इस्लामी झाड़-फूंक), पर चुप्पी साधे रखी। यह घटना अबांगन मुसलमानों के बीच जारी खींचतान को दिखाती है, जो अपनी आस्था में स्थानीय रहस्यवाद को शामिल करते हैं, और उन सनातनी विचार वाले सानत्री लोगों के बीच, जो इस्लाम को गैर-अरबी प्रभावों से मुक्त करना चाहते हैं। ब्रुनेई में राज्य-प्रेरित इस्लामीकरण का अलग मॉडल दिखता है। निरंकुश राजशाही ने 2013 का शरिया दंड संहिता आदेश लागू किया, जिसने इस्लामी आपराधिक कानून का दायरा गैर-मुसलमानों तक बढ़ाया और डकैती से लेकर व्यभिचार तक के अपराधों के लिए शारीरिक दंड की व्यवस्था की। पड़ोसी मलेशिया के विपरीत, जहां इस्लामी कानूनी दावेदारी पर सार्वजनिक बहस होती है, ब्रुनेई की मेलायू इस्लाम बेराजा (मलय मुस्लिम राजशाही) विचारधारा धार्मिक अधिकारियों या सुल्तान के धार्मिक आदेशों की आलोचना को अपराध बनाकर असहमति दबाती है। इस संहिता के तहत आधिकारिक इस्लामी व्याख्याओं का विरोध करने पर पांच साल तक की कैद हो सकती है। इससे ऐसा एकरूप धार्मिक माहौल बनता है, जहां राज्य की धार्मिक नीतियों को चुनौती देने वाली आंतरिक चर्चा की गुंजाइश नहीं रहती।

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नुसंतारा इस्लाम: एक उदार विकल्प

बढ़ते धार्मिक परंपरावाद के बीच इंडोनेशिया का सबसे बड़ा इस्लामी संगठन, नहदलतुल उलमा (एनयू), नुसंतारा इस्लाम को एक विशिष्ट धर्मशास्त्रीय ढांचे के रूप में बढ़ावा दे रहा है। यह उदारता, बहुलवाद और लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ मेल पर जोर देता है। करीब 6 करोड़ सदस्यों वाला एनयू कहता है कि इंडोनेशियाई इस्लाम विजय के बजाय स्थानीय संस्कृतियों के साथ शांतिपूर्ण संवाद के जरिये विकसित हुआ। इससे सहिष्णुता को महत्व देने और उग्रवाद को खारिज करने वाली परंपरा बनी। इस अवधारणा के छह आधार हैं: हिंसा के बजाय शांति को बढ़ावा देना, समन्वयवाद के बिना स्थानीय परंपराओं के अनुरूप ढलना, राज्य की ताकत के बजाय नागरिक समाज पर भरोसा करना, इस्लाम और राष्ट्रवाद में मेल बैठाना, धर्म की परवाह किए बिना नागरिकों की समानता को मान्यता देना और कट्टरपंथ को खारिज करना। एनयू के नेताओं का कहना है कि यह दृष्टिकोण मध्य पूर्वी कट्टरपंथ और पश्चिमी धर्मनिरपेक्षता, दोनों का विकल्प है। यह ऐसा मॉडल पेश करता है जिसमें मातृभूमि से प्रेम करना भी आस्था का हिस्सा है। राष्ट्रपति जोको विडोडो ने इस विचार का समर्थन करते हुए ऐसी दृष्टि की घोषणा की, जो इंडोनेशिया की धार्मिक प्रथाओं को अधिक कठोर व्याख्याओं से अलग करती है।

हमारा इस्लाम नुसंतारा इस्लाम है।

संगठन ने इस संदेश को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहुंचाया है। उसने उदारवादी इस्लामी नेताओं के शिखर सम्मेलन आयोजित किए और प्रस्ताव रखा कि मुस्लिम दुनिया में धार्मिक सुधारों का केंद्र मध्य पूर्व के बजाय दक्षिण-पूर्व एशिया बन सकता है। यह दृष्टि इस्लामिक डिफेंडर फ्रंट और हिज्ब उत-तहरीर इंडोनेशिया जैसे समूहों को सीधी चुनौती देती है। ये समूह नुसंतारा इस्लाम का विरोध करते हैं, क्योंकि यह राष्ट्रीय पहचान और स्थानीय रीति-रिवाजों को धार्मिक आचरण के अनुरूप मानता है।

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अंतरराष्ट्रीय एकजुटता और फलस्तीन का मुद्दा

दक्षिण-पूर्व एशिया में धार्मिक पुनरुत्थान के विदेश नीति पर अहम प्रभाव हैं, खासकर विदेशों में संघर्ष का सामना कर रहे मुस्लिम समुदायों के साथ एकजुटता के मामले में। इंडोनेशिया, मलेशिया और ब्रुनेई के इजराइल के साथ औपचारिक राजनयिक संबंध नहीं हैं। सामान्य परिस्थितियों में वे इजराइली नागरिकों और कंपनियों को प्रवेश की अनुमति नहीं देते। यह रुख इस्लामी एकजुटता के साथ उस उपनिवेशवाद-विरोधी भावना को भी दर्शाता है, जिसकी जड़ें पश्चिमी प्रभुत्व के क्षेत्रीय इतिहास में हैं। मलेशिया के महातिर मोहम्मद जैसे नेताओं ने इजराइली नीतियों की लगातार निंदा की है। हाल के कार्यकाल में उन्होंने इजराइल को दुनिया की अस्थिरता का मूल कारण बताया। ये देश फलस्तीन को राष्ट्र का दर्जा देने का समर्थन करते हैं और वहां फलस्तीनी राजनयिक मिशनों की मेजबानी करते हैं। साथ ही, फलस्तीनियों को शिक्षा और रोजगार के अवसर भी देते हैं। यह विदेश नीति का रुख दिखाता है कि दक्षिण-पूर्व एशिया में इस्लामी पहचान ठोस राजनीतिक रुख में कैसे बदलती है, जो पश्चिमी सहयोगियों के रुख से अलग है। यह एकजुटता सरकारी नीतियों से आगे बढ़कर जनभावना में भी दिखती है, जहां फलस्तीन का मुद्दा जातीय और राष्ट्रीय सीमाओं से परे एकता का आधार बनता है। धार्मिक संगठन इस संघर्ष को इस्लाम के पवित्र स्थलों की रक्षा के धार्मिक संदर्भ में रखते हैं, जबकि राजनीतिक नेता उपनिवेशवादी अधीनता के साझा अनुभवों पर जोर देते हैं। अलग-अलग सरकारों और बदलते घरेलू राजनीतिक परिदृश्यों में इस रुख की निरंतरता बताती है कि फलस्तीन-समर्थक एकजुटता दक्षिण-पूर्व एशियाई इस्लामी राजनीतिक पहचान की स्थायी विशेषता बन गई है। इससे इजराइल के साथ संबंध सामान्य करने की कोशिशों पर रोक लगती है, भले ही ऐसा करना आर्थिक या रणनीतिक रूप से लाभकारी हो।

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मुख्य बातें

  • दक्षिण-पूर्व एशिया में इस्लाम हिंसक उग्रवाद के बजाय शांतिपूर्ण राजनीतिक, कानूनी और उपभोक्ता माध्यमों से अपनी जगह बना रहा है। इस बदलाव में मलेशिया और इंडोनेशिया सबसे आगे हैं।
  • इस क्षेत्र में करीब 24.2 करोड़ मुसलमान रहते हैं, जो दक्षिण-पूर्व एशिया की आबादी का 42 प्रतिशत हैं। दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी, 23 करोड़, इंडोनेशिया में है।
  • सर्वेक्षण के आंकड़े युवा मुसलमानों में बढ़ती धर्मपरायणता का संकेत देते हैं। मलेशिया और इंडोनेशिया में 84 प्रतिशत लोग रोजाना नमाज पढ़ते हैं और 33 प्रतिशत अपने माता-पिता से अधिक धार्मिक आचरण की बात कहते हैं।
  • हलाल अर्थव्यवस्था एक बड़ी आर्थिक ताकत बन गई है। वित्त, खाद्य पदार्थ, यात्रा और डिजिटल सेवाओं के क्षेत्र में मलेशिया और इंडोनेशिया दुनिया के चार सबसे बड़े इस्लामी बाजारों में शामिल हैं।
  • तकनीकी आधुनिकीकरण धार्मिक आचरण के अनुकूल ढल रहा है। 53 प्रतिशत मुसलमान नमाज के ऐप इस्तेमाल करते हैं और 85 प्रतिशत खास तौर पर मुसलमानों के लिए बने मेटावर्स मंचों में रुचि रखते हैं।
  • सख्त शरिया लागू करने और स्थानीय परंपराओं के बीच तनाव कायम है। आचेह में जावानी रहस्यवाद को खारिज करने और ब्रुनेई में गैर-मुसलमानों तक इस्लामी आपराधिक कानून का दायरा बढ़ाने में यह दिखता है।
  • इंडोनेशिया का नहदलतुल उलमा नुसंतारा इस्लाम को उदार विकल्प के रूप में बढ़ावा देता है। यह सहिष्णुता, लोकतंत्र और स्थानीय संस्कृतियों के साथ मेल पर जोर देता है और अधिक रूढ़िवादी व्याख्याओं से अलग है।
  • दक्षिण-पूर्व एशिया के मुस्लिम-बहुल देश फलस्तीन के प्रति विदेश नीति में लगातार एकजुटता दिखाते हैं और धार्मिक तथा उपनिवेशवाद-विरोधी सिद्धांतों के आधार पर इजराइल के साथ राजनयिक संबंध नहीं रखते।
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