चीन की द्वीप-श्रृंखला की रणनीति: प्रशांत क्षेत्र पर प्रभुत्व की कुंजी ताइवान क्यों है

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चीन की द्वीप-श्रृंखला की रणनीति: प्रशांत क्षेत्र पर प्रभुत्व की कुंजी ताइवान क्यों है

प्रशांत को झकझोरती रणनीतिक चुप्पी

जब ट्रंप प्रशासन ने 23 जनवरी को अपनी 2026 की राष्ट्रीय रक्षा रणनीति जारी की, तो पूरे हिंद-प्रशांत क्षेत्र के पर्यवेक्षकों ने एक बेचैन करने वाली बात देखी। दस्तावेज़ में "प्रथम द्वीप श्रृंखला के साथ मजबूत प्रतिषेधक रक्षा" बनाने का वादा किया गया, लेकिन ताइवान का कोई उल्लेख नहीं था। यह द्वीपीय लोकतंत्र उस समुद्री अवरोध के भौगोलिक और रणनीतिक केंद्र में स्थित है। इस सोची-समझी चुप्पी से टोक्यो, मनीला और ताइपे में चिंता फैल गई है। वहां के नेता समझते हैं कि ताइवान पर नियंत्रण ही एक सीमित चीन और पूरे प्रशांत क्षेत्र में अपनी सैन्य शक्ति पहुंचाने में सक्षम प्रभावशाली समुद्री शक्ति के बीच का अंतर तय करता है।

विषय-सूची
  1. प्रशांत को झकझोरती रणनीतिक चुप्पी
  2. भूगोल आज भी नियति क्यों है
  3. ताइवान: एक न डूबने वाला विमानवाहक पोत
  4. अमेरिकी सहयोगियों के लिए अस्तित्व का खतरा
  5. अमेरिका की सोची-समझी अस्पष्टता
  6. पहली अवरोध-रेखा के पार
  7. घरेलू राजनीतिक उथल-पुथल और रणनीतिक अवसर
  8. अनिश्चित भविष्य की तैयारी
  9. निष्कर्ष

प्रथम द्वीप श्रृंखला जापानी द्वीपसमूह से ताइवान और फिलीपींस होते हुए बोर्नियो तक फैली है। यह एक प्राकृतिक समुद्री दीवार बनाती है, जो चीन के तटीय जलक्षेत्र को खुले प्रशांत महासागर से अलग करती है। बीजिंग के लिए यह श्रृंखला रक्षात्मक परिधि भी है और नौसैनिक गतिविधियों को सीमित करने वाला अवरोध भी। वॉशिंगटन और उसके सहयोगियों के लिए यह रक्षा की रणनीतिक रेखा है। इस श्रृंखला पर नियंत्रण से चीन की नौसैनिक शक्ति को दूर तक पहुंचाने की क्षमता बढ़ेगी, साथ ही प्रमुख व्यापार मार्गों पर दबाव और इस गलियारे के किनारे बसे या इस पर निर्भर देशों के लिए सुरक्षा जोखिम भी बढ़ेंगे। प्रथम द्वीप श्रृंखला चीन के पूर्वी कमान क्षेत्र के केंद्र में है। यह एक प्रमुख सैन्य कमान है, जिसकी जिम्मेदारी पूर्वी चीन सागर, ताइवान जलडमरूमध्य और आसपास के क्षेत्रों, जिनमें झेजियांग और फुजियान प्रांत शामिल हैं, की है।

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इंटरनेशनल डेवलपमेंट एंड सिक्योरिटी कोऑपरेशन थिंक टैंक के अध्यक्ष चेस्टर कबाल्ज़ा बताते हैं कि इस समुद्री घेराबंदी को तोड़ना चीन की सैन्य रणनीति के लिए अनिवार्य है। खास समुद्री क्षेत्रों में अमेरिकी सेनाओं की गतिविधि रोकने के लिए बनाई गई बीजिंग की सबसे उन्नत क्षमताएं, अमेरिका के साथ खड़े देशों की समुद्री अवरोध-रेखा का मुकाबला करने के लिए ही तैयार की गई हैं। इस ढांचे में ताइवान केंद्रीय कड़ी है। सेवानिवृत्त राजनयिक अल्फ्रेडो टोरो हार्डी के ग्लोबल पॉलिसी जर्नल में प्रकाशित लेख "द मोस्ट डेंजरस एरिया इन द वर्ल्ड" में कहा गया है, "रणनीतिक दृष्टि से, प्रथम द्वीप श्रृंखला में इस द्वीप की स्थिति दक्षिण चीन सागर, पूर्वी चीन सागर और पीला सागर की ओर जाने वाले रास्ते में अवरोध बन सकती है।" लेख में इस बात पर जोर दिया गया है कि ताइपे "इन समुद्रों से प्रशांत महासागर में निकलने के रास्ते को संकरा करने वाला अवरोध" है।

भूगोल आज भी नियति क्यों है

प्रथम द्वीप श्रृंखला की अवधारणा 1940 के दशक में अमेरिकी सैन्य योजनाकारों ने पेश की थी। उनका मकसद सोवियत और चीनी समुद्री महत्वाकांक्षाओं को रोकना था। 1950 के दशक में जॉन फोस्टर डलेस ने कुरील द्वीपों से जापान, रयूक्यू द्वीपसमूह, ताइवान और फिलीपींस तक फैले द्वीप-चाप को पहली रणनीतिक अवरोध-रेखा बताया था। इस भौगोलिक संरचना में कई संकरे समुद्री रास्ते हैं, जो दक्षिण चीन सागर, पूर्वी चीन सागर और पीले सागर तक पहुंच नियंत्रित करते हैं। इन जलक्षेत्रों में दुनिया के कुछ सबसे समृद्ध मछली पकड़ने के क्षेत्र, तेल और प्राकृतिक गैस के बड़े भंडार तथा ऐसे समुद्री मार्ग हैं, जिनसे चीन का कुल समुद्री व्यापार 60 प्रतिशत से अधिक गुजरता है।

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सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज के आंकड़ों के अनुसार, 2016 में चीन के समुद्री व्यापार का 64 प्रतिशत से अधिक हिस्सा दक्षिण चीन सागर के मार्ग से गुजरा, जबकि जापान का लगभग 42 प्रतिशत समुद्री व्यापार इन्हीं मार्गों से होकर निकला। इसके अलावा, चीन की तेल जरूरत का करीब 75 प्रतिशत और गैस जरूरत का 40 प्रतिशत से अधिक हिस्सा विदेशों से आने वाली आपूर्ति से पूरा होता है। ये संरचनात्मक निर्भरताएं प्रथम द्वीप श्रृंखला पर नियंत्रण को बीजिंग के लिए केवल सैन्य महत्वाकांक्षा नहीं, बल्कि आर्थिक जरूरत बनाती हैं।

अमेरिकी नौसेना युद्ध महाविद्यालय के प्रोफेसर जेम्स होम्स ने प्रोसीडिंग्स पत्रिका में लिखा कि यह श्रृंखला "चीन सागरों से बाहर निकलने या उनमें प्रवेश करने के रास्ते में एक दुर्जेय अवरोध" है। उनका तर्क है कि इस श्रृंखला के द्वीपों और जलडमरूमध्यों पर या आसपास तैनात रक्षक जहाजरोधी और विमानरोधी हथियारों, समुद्री बारूदी सुरंगों, डीजल पनडुब्बियों और मिसाइलों से लैस छोटे गश्ती जहाजों का इस्तेमाल कर एक-दूसरे पर चढ़ते हुए मारक क्षेत्र बना सकते हैं। इन कम लागत वाले उपायों से चीन को महंगे जवाबी कदम उठाने पड़ेंगे, जिनकी कामयाबी भी संदिग्ध होगी।

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ताइवान: एक न डूबने वाला विमानवाहक पोत

प्रथम द्वीप श्रृंखला के बीचोंबीच ताइवान की स्थिति उसे विशिष्ट रणनीतिक महत्व देती है। जनरल डगलस मैकआर्थर ने 1950 में इस द्वीप को मशहूर तौर पर "न डूबने वाला विमानवाहक पोत" कहा था। उनका आशय था कि ताइवान पर नियंत्रण रखने वाला ही पूर्वोत्तर एशिया को दक्षिण-पूर्व एशिया और प्रशांत क्षेत्र से जोड़ने वाले समुद्री मार्गों को नियंत्रित करेगा। बीजिंग के नियंत्रण में ताइवान चीन सागरों के भीतर और बाहर अमेरिकी तथा सहयोगी सेनाओं की आवाजाही में बाधा बनेगा। वॉशिंगटन के प्रभाव में यह मुख्य भूमि चीन की ओर इशारा करता भाला और चीनी नौसैनिक शक्ति को सीमित करने वाला अवरोध बनता है।

ताइवान जलडमरूमध्य इस समुद्री शतरंज-पट का सबसे अस्थिर तनाव-बिंदु है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कहा है कि "ताइवान चीन का ताइवान है" और ताइवान के सवाल का समाधान केवल चीनी जनता का मामला है। कम्युनिस्ट पार्टी की 20वीं कांग्रेस में बोलते हुए शी ने बीजिंग के इरादों को लेकर स्पष्ट संदेश दिया।

शी ने कहा, "ताइवान चीन का ताइवान है। ताइवान के सवाल का समाधान चीनी लोगों का मामला है, ऐसा मामला जिसका समाधान चीनियों को ही करना होगा।" उन्होंने कहा, "हम पूरी ईमानदारी और भरसक प्रयास से शांतिपूर्ण पुनःएकीकरण के लिए काम करते रहेंगे, लेकिन बल प्रयोग से इनकार करने का वादा कभी नहीं करेंगे और सभी जरूरी कदम उठाने का विकल्प अपने पास रखेंगे।"

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बीजिंग शांतिपूर्ण पुनःएकीकरण की बात करता है, लेकिन सैन्य कार्रवाई की संभावना को स्पष्ट रूप से खारिज न करने से पूरा क्षेत्र लगातार सतर्क रहता है। ताइवान को लेकर कोई सीधा संघर्ष स्थानीय सीमाओं तक नहीं रहेगा। कबाल्ज़ा चेतावनी देते हैं कि ऐसे युद्ध में दुनिया की सबसे शक्तिशाली सैन्य और आर्थिक ताकतें शामिल होंगी, जिससे युद्ध के तौर-तरीके बदलेंगे और हिंद-प्रशांत का रणनीतिक क्रम नए सिरे से तय होगा। इससे गठबंधनों का समीकरण बिगड़ेगा और द्वीप से आर्थिक या रणनीतिक संबंध रखने वाले देशों को भागीदारी को लेकर कठिन फैसले करने पड़ेंगे।

अमेरिकी सहयोगियों के लिए अस्तित्व का खतरा

अगर ताइवान बीजिंग के नियंत्रण में चला गया, तो जापान को खास तौर पर गंभीर परिणामों का सामना करना पड़ेगा। जापान की प्रधानमंत्री साने ताकाइची ने पिछले साल कहा था कि ताइवान के खिलाफ चीनी नौसैनिक नाकेबंदी या सैन्य बल का इस्तेमाल "हर हाल में जापान के अस्तित्व के लिए खतरा बन सकने वाली स्थिति" पैदा कर सकता है। जापानी कानून में इस शब्दावली का खास कानूनी महत्व है। इससे टोक्यो को द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के शांतिवादी संविधान की पाबंदियों से परे विदेशों में अपनी सेना तैनात करने की अनुमति मिल सकती है।

अगर प्रथम द्वीप श्रृंखला पर चीन का प्रभुत्व हो गया, तो जापान के समुद्री संचालन की गुंजाइश घटेगी और प्रशांत महासागर तक पहुंच के उसके रास्ते अधिक सीमित और असुरक्षित हो जाएंगे। चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी नौसेना पश्चिमी प्रशांत में अधिक स्वतंत्रता से काम कर सकेगी और जापान के पूर्वी मोर्चे पर अपनी सेनाएं तैनात कर पाएगी। इस क्षेत्र को ऐतिहासिक रूप से सुरक्षित माना जाता रहा है। जापान की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा आयात के लिए अहम समुद्री संपर्क मार्ग चीनी दबाव के प्रति संवेदनशील हो जाएंगे। जापानी सेना पर बोझ काफी बढ़ेगा, जबकि अमेरिकी प्रतिरोधक क्षमता की विश्वसनीयता कमजोर होगी।

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फिलीपींस प्रथम द्वीप श्रृंखला के दक्षिणी हिस्से में है। इसका उत्तरी लूज़ोन प्रशांत महासागर को दक्षिण चीन सागर से जोड़ने वाले प्रमुख समुद्री रास्तों के बीच स्थित है। राष्ट्रपति फर्डिनेंड मार्कोस जूनियर ने माना कि अगर ताइवान को लेकर अमेरिका और चीन के बीच व्यापक युद्ध छिड़ता है, तो "फिलीपींस के लिए इससे अलग रह पाना संभव नहीं होगा।" देश को विवादित संकरे समुद्री रास्तों के करीब होने, आसपास के समुद्रों से सैन्य बलों की आवाजाही और संघर्ष क्षेत्रों से बड़ी संख्या में शरणार्थियों के आने से जुड़े दबावों का सामना करना पड़ेगा।

अमेरिका की सोची-समझी अस्पष्टता

ट्रंप प्रशासन की 2026 की राष्ट्रीय रक्षा रणनीति ने इस अस्थिर माहौल में अनिश्चितता का नया तत्व जोड़ दिया है। दस्तावेज़ में "प्रतिषेधक रक्षा" की बात के साथ ताइवान पर रणनीतिक चुप्पी रखी गई है, ताकि कूटनीतिक कदम उठाने की अधिक गुंजाइश बनी रहे। रणनीति के वास्तुकार और नीति मामलों के रक्षा अवर सचिव एल्ब्रिज कोल्बी ने सहयोगी देशों से कहा है कि वे ताइवान को लेकर संभावित संकट में अपनी भूमिका तय करें। साथ ही, उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि वॉशिंगटन "चीन पर प्रभुत्व जमाना नहीं चाहता, न ही उसे दबाना या अपमानित करना चाहता है।"

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यह दृष्टिकोण पिछली रणनीतियों से अलग है। बाइडन प्रशासन के 2022 के दस्तावेज़ में ताइवान का आठ बार उल्लेख किया गया था और बीजिंग की "तेजी से उकसावे वाली बयानबाजी और दबावपूर्ण गतिविधियों" का जिक्र था। 2026 के संस्करण में द्वीप का पूरी तरह उल्लेख नहीं है; इसमें केवल प्रथम द्वीप श्रृंखला का सामान्य संदर्भ दिया गया है। चीन पर राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के पूर्व निदेशक डेनिस वाइल्डर ने कहा, "पेंटागन ने इसे बहुत पहले भेज दिया था, फिर इसे दोबारा लिखा गया क्योंकि ट्रंप चाहते हैं कि बीजिंग की यात्रा शानदार हो।"

यह रणनीति चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के साथ सैन्य-से-सैन्य संवाद बढ़ाकर "रणनीतिक स्थिरता" कायम करने पर काफी निर्भर करती है। हालांकि, इसके लिए बीजिंग का फोन उठाने को तैयार होना जरूरी है, जिसकी हालिया घटनाओं को देखते हुए उम्मीद करना मुश्किल है। फरवरी 2023 में अमेरिकी एफ-22 लड़ाकू विमान ने एक चीनी निगरानी गुब्बारे को मार गिराया था। इसके बाद तत्कालीन रक्षा मंत्री लॉयड ऑस्टिन ने संकट-संपर्क लाइन के जरिए अपने चीनी समकक्ष से बात करने की कोशिश की। पीएलए ने फोन लेने से इनकार कर दिया और अमेरिका पर संवाद के लिए "उचित माहौल" न बनाने का आरोप लगाया। व्हाइट हाउस में हिंद-प्रशांत मामलों के पूर्व समन्वयक कर्ट कैंपबेल ने कहा कि बीजिंग के साथ हॉटलाइन "अक्सर खाली कमरों में लगातार बजती रहती हैं।"

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पहली अवरोध-रेखा के पार

चीन की महत्वाकांक्षाएं प्रथम द्वीप श्रृंखला तक सीमित नहीं हैं। आधुनिक चीनी नौसेना के जनक एडमिरल लियू हुआछिंग ने 1980 के दशक में तीन चरणों वाली रणनीति की कल्पना की थी। पहले चरण में 2000 तक प्रथम द्वीप श्रृंखला पर नियंत्रण हासिल करना था। दूसरे चरण का लक्ष्य 2020 तक द्वितीय द्वीप श्रृंखला पर नियंत्रण था। तीसरे चरण में 2050 तक वैश्विक नौसेना बनाने की परिकल्पना थी। समय-सीमा अवास्तविक साबित हुई, लेकिन महत्वाकांक्षाएं बरकरार हैं।

द्वितीय द्वीप श्रृंखला जापान से शुरू होकर मारियाना और माइक्रोनेशिया होते हुए गुआम तक फैली है। गुआम अमेरिका का एक क्षेत्र है, जहां पश्चिमी प्रशांत में उसका रणनीतिक नौसैनिक अड्डा स्थित है। इस श्रृंखला पर चीन का प्रभुत्व बीजिंग को मध्य प्रशांत पर नियंत्रण देगा और यह एक रणनीतिक सैन्य तथा आर्थिक चौकी का काम करेगा। हाल के वर्षों में चीन को कूटनीतिक सफलताएं मिली हैं। इनमें सोलोमन द्वीप और किरिबाती को ताइवान के बजाय बीजिंग को मान्यता देने के लिए राजी करना शामिल है। ये घटनाएं दूसरी अवरोध-रेखा को भेदने के लिए ठिकाने बनाने की कोशिशों का संकेत देती हैं।

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कुछ विश्लेषक अब हिंद महासागर तक फैली चौथी और पांचवीं द्वीप श्रृंखलाओं की बात कर रहे हैं। जिबूती के दोरालेह में चीन का पहला विदेशी सैन्य अड्डा, पाकिस्तान के ग्वादर और श्रीलंका के हंबनटोटा में दोहरे उपयोग वाली सुविधाओं के साथ मिलकर, भारत को चुनौती देने और अफ्रीका तक फैले व्यापार मार्गों की रक्षा करने की बीजिंग की क्षमता दिखाते हैं। 2018 में अमेरिकी पैसिफिक कमांड का नाम बदलकर इंडो-पैसिफिक कमांड करना इस विस्तृत होते भौगोलिक दायरे की स्वीकृति थी।

घरेलू राजनीतिक उथल-पुथल और रणनीतिक अवसर

बीजिंग प्रथम द्वीप श्रृंखला के देशों की घरेलू राजनीति पर करीबी नजर रखता है। चीन के नजरिए से, अमेरिका के साथ खड़े देशों में राजनीतिक उथल-पुथल एक अवसर है। दक्षिण कोरिया इस समय गंभीर राजनीतिक संकट का सामना कर रहा है। राष्ट्रपति यून सुक योल की ओर से मार्शल लॉ घोषित किए जाने के बाद उनके खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही चल रही है। अक्टूबर 2024 के चुनावों में गठबंधन को नुकसान होने के बाद जापान के प्रधानमंत्री इशिबा शिगेरु अल्पमत सरकार का नेतृत्व कर रहे हैं। विधायी गतिरोध के बीच ताइवान के राष्ट्रपति लाई चिंग-ते की लोकप्रियता घट रही है। फिलीपींस में मार्कोस और दुतेर्ते परिवारों के बीच तीखी राजनीतिक खींचतान जारी है।

द डिप्लोमैट के विश्लेषण के अनुसार, ये आंतरिक मतभेद अमेरिकी सहयोगियों की रक्षा क्षमताएं मजबूत करने की क्षमता को सीमित करते हैं। चीन अपने तटरक्षक बल और समुद्री मिलिशिया के जरिए बढ़ते दबाव वाली ग्रे ज़ोन रणनीति को आर्थिक कूटनीति और दुष्प्रचार अभियानों के साथ जोड़कर विरोध कमजोर करता है। यह रणनीति सीधे टकराव के बजाय प्रतिद्वंद्वी की कमजोरियों का फायदा उठाकर "बिना लड़े जीतने" की सुन त्ज़ू की सीख पर चलती है।

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2026 की राष्ट्रीय रक्षा रणनीति सहयोगियों और साझेदारों से सामूहिक रक्षा का "बड़ा हिस्सा अपने ऊपर लेने" की मांग करती है। इससे पहले से ही घरेलू अस्थिरता झेल रही सरकारों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। जापान को अल्पमत सरकार संभालते हुए रक्षा खर्च बढ़ाना होगा। फिलीपींस को अमेरिका के साथ सुरक्षा सहयोग और चीन पर अपनी आर्थिक निर्भरता के बीच संतुलन बनाना होगा। इन परस्पर विरोधी दबावों से ऐसे कमजोर बिंदु पैदा होते हैं, जिनका फायदा उठाकर बीजिंग प्रत्यक्ष अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप को उकसाए बिना अपने क्षेत्रीय दावों को आगे बढ़ा सकता है।

अनिश्चित भविष्य की तैयारी

रणनीतिक अस्पष्टता के बावजूद अमेरिका और उसके सहयोगियों ने प्रथम द्वीप श्रृंखला के साथ अपनी रक्षा मजबूत करना शुरू कर दिया है। अमेरिका ने जापान के यामागुची प्रांत और फिलीपींस के ज़ाम्बालेस प्रांत में टाइफॉन मिसाइल प्रणालियां तैनात की हैं। ओकिनावा, मियाको द्वीप, इशिगाकी द्वीप और फिलीपींस के बाटान द्वीप पर एनएमईएसआईएस जहाजरोधी प्रणालियां लगाई गई हैं। जापान की योजना क्यूशू और होक्काइडो में "द्वीप रक्षा" के लिए हाइपर वेलोसिटी ग्लाइडिंग प्रोजेक्टाइल तैनात करने की है। फिलीपींस पश्चिमी लूज़ोन और पालावान में ब्रह्मोस जहाजरोधी मिसाइलें तैनात करना चाहता है।

इन तैनातियों से एक-दूसरे पर चढ़ते हुए मारक क्षेत्र बनते हैं, जो चीन की किसी भी बाहर निकलने की कोशिश को महंगा बना सकते हैं। हालांकि, इस प्रतिरोधक क्षमता की प्रभावशीलता राजनीतिक इच्छाशक्ति और गठबंधन की एकजुटता पर निर्भर करती है। अगर ताइवान अमेरिका की चुप्पी को साथ छोड़ने के संकेत के रूप में देखता है, तो वह घबरा सकता है। अगर सहयोगियों को लगे कि उनकी सुरक्षा सौदेबाजी का एक हिस्सा है, तो एकजुटता कमजोर होगी। अगर बीजिंग को लगे कि अमेरिका "स्थिरता" के लिए बेताब है, तो वह इस चुप्पी को हथियार बना लेगा।

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निष्कर्ष

  • प्रथम द्वीप श्रृंखला चीन को प्रशांत महासागर से अलग करने वाला समुद्री अवरोध है। इस रक्षात्मक परिधि की केंद्रीय भौगोलिक और रणनीतिक कड़ी ताइवान है।
  • चीन नियंत्रण रेखा को तोड़ने, अपने समुद्री व्यापार के 60 प्रतिशत से अधिक हिस्से को ढोने वाले अहम व्यापार मार्ग सुरक्षित करने और खुले प्रशांत में नौसैनिक शक्ति पहुंचाने के लिए ताइवान पर नियंत्रण चाहता है।
  • ट्रंप प्रशासन की 2026 की राष्ट्रीय रक्षा रणनीति में ताइवान का स्पष्ट उल्लेख नहीं है, जबकि द्वीप श्रृंखला के साथ "प्रतिषेधक रक्षा" पर जोर दिया गया है। इससे पैदा हुई रणनीतिक अस्पष्टता सहयोगियों को चिंतित करती है।
  • ताइवान संघर्ष से जापान और फिलीपींस की सुरक्षा को अस्तित्वगत खतरा होगा। इसमें समुद्री पहुंच सीमित होना, आपूर्ति मार्गों का असुरक्षित होना और सैन्य कार्रवाई का फैलाव शामिल है।
  • चीन की महत्वाकांक्षाएं प्रथम द्वीप श्रृंखला से आगे द्वितीय द्वीप श्रृंखला और हिंद महासागर तक फैली हैं। जिबूती में उसका विदेशी अड्डा और पाकिस्तान तथा श्रीलंका में संभावित सुविधाएं दूर तक शक्ति पहुंचाने में मदद करती हैं।
  • दक्षिण कोरिया, जापान, ताइवान और फिलीपींस की राजनीतिक अस्थिरता बीजिंग को सीधे सैन्य टकराव के बिना ग्रे ज़ोन रणनीति और दबाव का इस्तेमाल करने के अवसर देती है।
  • प्रथम द्वीप श्रृंखला में अमेरिका और उसके सहयोगियों की मिसाइल प्रणालियों की तैनाती का मकसद विश्वसनीय प्रतिरोधक क्षमता बनाना है, लेकिन इसकी प्रभावशीलता लगातार राजनीतिक प्रतिबद्धता और स्पष्ट रणनीतिक संवाद पर निर्भर करती है।
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