डीपसीक के झटकों की गूंज अब भी जारी
हांगझोउ से निकले डीपसीक के मोबाइल ऐप ने सिलिकॉन वैली को चौंकाया था। इसके एक साल बाद, कृत्रिम बुद्धिमत्ता का परिदृश्य दो समानांतर दुनिया में बंट गया है। जनवरी 2025 में इस चीनी स्टार्टअप ने दिखाया कि कम उन्नत चिपों और बजट के एक छोटे हिस्से का इस्तेमाल करके भी बड़े भाषा मॉडल प्रदर्शन के मामले में चैटजीपीटी की बराबरी कर सकते हैं। तकनीकी जगत में अब महज "डीपसीक क्षण" कहलाने वाली इस घटना ने अमेरिकी एआई वर्चस्व की कमजोरियां उजागर कीं, जो 2026 की शुरुआत में वैश्विक तकनीकी प्रतिस्पर्धा को लगातार नया रूप दे रही हैं।
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यह झटका सिर्फ तकनीकी नहीं, मनोवैज्ञानिक भी था। चाइना इंटरनेशनल कैपिटल कॉर्प के आंकड़ों के मुताबिक, 2025 में अमेरिकी वेंचर कैपिटल ने एआई में 175 अरब डॉलर लगाए, जो चीनी कंपनियों के 6 अरब डॉलर के निवेश से करीब तीस गुना था। फिर भी डीपसीक ने साबित किया कि संसाधनों की कमी नवाचार को दबाने के बजाय उसे बढ़ावा दे सकती है। कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस के फेलो स्कॉट सिंगर का कहना है कि इस घटना ने रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का नया अध्याय खोल दिया। उन्होंने कहा, "चीन निश्चित रूप से खुद को बयानबाजी में बहुपक्षीय, खुला और विकास-केंद्रित वैश्विक नेता के रूप में पेश कर रहा है। एआई को लेकर चीन की भू-राजनीतिक स्थिति ट्रंप प्रशासन से पहले की है, लेकिन अब यह वैश्विक जनसमूहों को तेजी से आकर्षित कर रही है।"
वॉशिंगटन की चिपों पर बाजी, बीजिंग का कोड से जवाब
डीपसीक की चुनौती के जवाब में ट्रंप प्रशासन ने 2025 के मध्य में "दौड़ जीतना: अमेरिका की एआई कार्ययोजना" शीर्षक से एक रणनीति दस्तावेज जारी किया। इस योजना ने प्रतिस्पर्धा को साफ तौर पर शून्य-योग वाली दौड़ के रूप में पेश किया और कहा कि अमेरिका "कृत्रिम बुद्धिमत्ता में वैश्विक वर्चस्व" की होड़ में है। प्रशासन ने नियामक बाधाएं हटाने और सहयोगी देशों को "एआई तकनीक की पूरी श्रृंखला" निर्यात करके अमेरिकी तकनीकी बढ़त का लाभ उठाने का आह्वान किया। इसमें हार्डवेयर, मॉडल, सॉफ्टवेयर और मानक शामिल हैं। निशाना चीन था, जिसे वॉशिंगटन वैश्विक एआई आपूर्ति श्रृंखला से अलग-थलग करना चाहता है।
वॉशिंगटन का भरोसा एक अहम बढ़त पर टिका है: दुनिया के सबसे उन्नत सेमीकंडक्टरों पर नियंत्रण। सिलिकॉन वैली स्थित एनवीडिया उन ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिटों को डिजाइन करती है, जिनसे अत्याधुनिक एआई मॉडल चलते हैं। उच्चस्तरीय चिपों और सेमीकंडक्टर निर्माण उपकरणों पर सख्त निर्यात नियंत्रण के चलते अमेरिकी कंपनियां फिलहाल अत्याधुनिक क्षमताओं में चीनी प्रतिद्वंद्वियों से सात महीने आगे हैं। हुआवेई की एसेंड श्रृंखला चीन का सबसे अच्छा घरेलू विकल्प है। बुनियादी कामों, जैसे टेक्स्ट तैयार करने, में एसेंड 910 का प्रदर्शन एनवीडिया की पुरानी एच100 चिपों की क्षमता का करीब 60 प्रतिशत है, हालांकि जटिल मॉडल प्रशिक्षण में यह उनसे और पीछे रह जाती है।
हालांकि, इस तकनीकी बढ़त में अप्रत्याशित रूप से सेंध लग रही है। दिसंबर 2025 में ट्रंप प्रशासन ने विवादास्पद फैसला पलटते हुए एनवीडिया को चुनिंदा चीनी खरीदारों को अपनी एच200 श्रृंखला की चिपें बेचने की अनुमति दी। इसके बदले बिक्री राजस्व का एक हिस्सा सरकार को मिलेगा। प्रशासन ने सबसे उन्नत ब्लैकवेल और रुबिन चिपों को इस फैसले से बाहर रखा। उसे उम्मीद थी कि चीन घरेलू विकल्पों को तेजी से विकसित करने के बजाय पुरानी अमेरिकी तकनीक पर निर्भर हो जाएगा। आलोचकों ने चेताया कि यह रणनीति उलटी पड़ सकती है। उद्योग के अनुमानों के मुताबिक, अलीबाबा, टेनसेंट और बाइटडांस समेत चीनी कंपनियां 50 अरब डॉलर से अधिक मूल्य की 20 लाख से ज्यादा एच200 चिपों के ऑर्डर दे चुकी हैं। पिछले हफ्ते रॉयटर्स ने खबर दी कि चीनी सीमा शुल्क अधिकारियों ने घरेलू कंपनियों को इनकी खेपें अस्वीकार करने का निर्देश दिया है। इससे संकेत मिलता है कि बीजिंग इस जाल को समझता है और निर्भरता से इनकार कर रहा है।
ओपन-सोर्स का आक्रामक विस्तार
अमेरिका जहां हार्डवेयर पर नियंत्रण रखता है, वहीं चीन ने ओपन-सोर्स कृत्रिम बुद्धिमत्ता के जरिए सॉफ्टवेयर क्षेत्र में जोरदार चुनौती दी है। ओपनएआई और एंथ्रोपिक के बंद, मालिकाना मॉडलों के विपरीत चीनी कंपनियों ने "ओपन-वेट" मॉडल जारी किए हैं, जिन्हें डेवलपर मुफ्त में डाउनलोड, संशोधित और इस्तेमाल कर सकते हैं। डीपसीक के आर1, अलीबाबा के क्वेन परिवार और मूनशॉट एआई के मॉडल समेत इन प्रणालियों को दुनियाभर में व्यापक लोकप्रियता मिली है।
अलीबाबा के क्वेन मॉडल दुनिया में सबसे ज्यादा डाउनलोड किए जाने वाले ओपन-वेट एआई सिस्टम बन गए हैं। हगिंग फेस प्लेटफॉर्म के अनुसार, इन्हें करीब 70 करोड़ बार डाउनलोड किया गया है। क्वेन का इकोसिस्टम करीब 400 अलग-अलग मॉडलों में फैला है, जिनसे खास उपयोगों के लिए अनुकूलित 1,80,000 से अधिक नए संस्करण बने हैं। यह रणनीति ठीक उन बाजारों को लक्ष्य करती है, जिन्हें वॉशिंगटन प्रभावित करना चाहता है: ऐसे विकासशील देश जो पश्चिमी निर्यात प्रतिबंधों या लाइसेंस शुल्क के बिना एआई क्षमताएं चाहते हैं।
चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने 2026 के अपने नववर्ष संदेश में तकनीकी प्रगति को राष्ट्रीय कायाकल्प से साफ तौर पर जोड़ा। उन्होंने स्वदेशी चिप विकास में सफलताओं का जिक्र करते हुए कहा कि चीनी तकनीक "नई ऊंचाइयों" पर पहुंच गई है। यह बयान आज की एआई प्रतिस्पर्धा को चीन के "अपमान के सौ साल" से जोड़ता है। यह दौर 19वीं सदी के मध्य के अफीम युद्धों से शुरू होकर 1949 तक चला, जब तकनीकी पिछड़ेपन ने चीन को विदेशी शक्तियों के सामने असुरक्षित बना दिया था। बीजिंग कृत्रिम बुद्धिमत्ता को ऐसी निर्णायक तकनीक मानता है, जो तय करेगी कि इतिहास फिर दोहराया जाएगा या उसका रुख बदलेगा।
दोनों देशों की रणनीतियों में साफ अंतर है। अमेरिका अत्याधुनिक प्रदर्शन पर जोर देते हुए लगातार बड़े डेटा केंद्र बना रहा है और ऐसे विशाल मॉडल प्रशिक्षित कर रहा है जिनके लिए अभूतपूर्व कंप्यूटिंग शक्ति चाहिए। चीन का ध्यान प्रसार पर है: "एआई प्लस" पहल के जरिए वह "कामचलाऊ रूप से सक्षम" एआई को विनिर्माण, रोबोटिक्स और भौतिक बुनियादी ढांचे में शामिल कर रहा है। इस कार्यक्रम का लक्ष्य 2035 तक उद्योग, स्वास्थ्य सेवा और शासन के हर क्षेत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग करना और बीजिंग के शब्दों में "पूरी तरह एआई-संचालित" समाज बनाना है।
बुनियादी ढांचे की बाधा
दोनों महाशक्तियों को ऐसी गंभीर सीमाओं का सामना करना पड़ रहा है, जो 2026 तक एआई विकास की गति तय करेंगी। लेकिन उनकी बाधाएं बुनियादी तौर पर अलग हैं। अमेरिका तकनीक में आगे है, लेकिन बिजली संकट से जूझ रहा है। अत्याधुनिक एआई मॉडल प्रशिक्षित करने के लिए विशाल डेटा केंद्र चाहिए, जो पहले से लगभग पूरी क्षमता पर चल रहे बिजली ग्रिडों पर दबाव डालते हैं। अनुमान है कि अमेरिकी क्लाउड सेवा प्रदाता 2026 में एआई बुनियादी ढांचे पर 600 अरब डॉलर खर्च करेंगे, जो 2024 के खर्च का दोगुना होगा। फिर भी बिजली की उपलब्धता और निर्माण में लगने वाला समय विस्तार की ठोस सीमाएं तय करते हैं।
चीन की समस्या इसके ठीक उलट है। एनवीडिया के मुख्य कार्यकारी जेनसन हुआंग के अनुसार, बीजिंग के पास अमेरिका से दोगुनी बिजली उत्पादन क्षमता समेत ऊर्जा के प्रचुर स्रोत हैं, लेकिन एआई प्रशिक्षण में उस बिजली का इस्तेमाल करने के लिए जरूरी उन्नत चिपों की कमी है। सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज में बोलते हुए हुआंग ने कहा कि अमेरिकी चिप तकनीक जहां "कई पीढ़ियों आगे" है, वहीं निर्माण क्षमता में चीन अमेरिका से कहीं अधिक तेज है। हुआंग ने कहा, "अगर अमेरिका में किसी जगह पर डेटा सेंटर बनाना हो, तो जमीन की खुदाई शुरू करने से लेकर एआई सुपरकंप्यूटर चालू करने तक शायद करीब तीन साल लगेंगे। वे एक सप्ताहांत में अस्पताल बना सकते हैं।" उनकी इस टिप्पणी से पता चलता है कि बुनियादी ढांचा तेजी से खड़ा करने की क्षमता तकनीकी कमियों की भरपाई कर सकती है।
इस अंतर से वह पैदा होता है जिसे विश्लेषक "असममित प्रतिस्पर्धा" कहते हैं। अमेरिका सैद्धांतिक क्षमताओं और अत्याधुनिक शोध में आगे है, जबकि चीन उन्हें लागू करने की गति और वास्तविक दुनिया के उपयोगों में हावी है। स्कॉट सिंगर के मुताबिक, चीनी तकनीकी केंद्रों में आज उपलब्ध एआई का फायदा उठाने को लेकर "कहीं ज्यादा उत्साह और ऊर्जा" दिखती है, जबकि वहां भविष्य की संभावित सफलताओं के पीछे भागने पर कम जोर है। यही व्यावहारिक रुख एआई-संचालित रोबोटिक्स, स्मार्ट विनिर्माण और स्वायत्त प्रणालियों में दिखता है, जहां चीन पश्चिमी देशों से आगे निकलता नजर आ रहा है।
सैन्य आयाम और प्रसार की दौड़
यह प्रतिस्पर्धा वाणिज्यिक बाजारों से आगे सैन्य उपयोगों तक फैली है, जहां तकनीकी परिष्कार के मुकाबले इसे अपनाने की गति ज्यादा निर्णायक साबित हो सकती है। अमेरिकी रक्षा विभाग ने "एआई-फर्स्ट" रणनीति शुरू की है। इसमें युद्ध, खुफिया और प्रशासनिक कामों में एआई का इस्तेमाल तेज करने के लिए सात "गति-निर्धारक परियोजनाएं" शामिल हैं। "स्वॉर्म फोर्ज" और "एजेंट नेटवर्क" जैसी परियोजनाओं का लक्ष्य युद्ध प्रबंधन और निर्णय-सहायता प्रणालियों में एआई को शामिल करना है, जबकि "एंडर्स फाउंड्री" एआई-सक्षम सैन्य सिमुलेशन पर केंद्रित है।
हालांकि, पेंटागन को नौकरशाही की उन बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है, जिनसे चीन सैन्य-नागरिक विलय व्यवस्था के जरिए बच निकलता है। यह प्रणाली नागरिक एआई की प्रगति को बिना रुकावट सैन्य उपयोगों तक पहुंचाती है। जॉर्जटाउन विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर सिक्योरिटी एंड इमर्जिंग टेक्नोलॉजी के शोध में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के 2,800 से अधिक ठेकों का विश्लेषण किया गया। इसके मुताबिक, रक्षा तंत्र सरकारी कंपनियों पर टिका है, लेकिन अब निजी क्षेत्र के नवोन्मेषकों पर भी तेजी से निर्भर हो रहा है। अमेरिका जहां मान्यता प्रक्रिया में लगने वाले समय और डेटा के अलग-अलग खांचों से जूझ रहा है, वहीं चीन की केंद्रीकृत व्यवस्था सैन्य और नागरिक, दोनों क्षेत्रों में एक साथ नई तकनीक अपनाने का आदेश दे सकती है।
दांव पर स्वायत्त हथियार, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और कमान एवं नियंत्रण प्रणालियां हैं, जो भविष्य के संघर्षों का परिणाम तय कर सकती हैं। काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के हालिया विश्लेषण में चेतावनी दी गई है कि 2026 निर्णायक दौर है, जब एआई प्रणालियां प्रयोगात्मक औजारों से ऐसे स्वायत्त एजेंटों में बदलेंगी जो मानवीय निगरानी के बिना जटिल सैन्य अभियान चला सकते हैं। सुरक्षा शोधकर्ताओं के मुताबिक, चीन की सरकार-प्रायोजित साइबर कार्रवाइयों में एआई एजेंट पहले ही घुसपैठ की 80 से 90 प्रतिशत प्रक्रिया अपने आप पूरी कर चुके हैं।
वैश्विक शासन और मानकों की जंग
क्षमताओं की सीधी प्रतिस्पर्धा से आगे, अमेरिका और चीन की होड़ में दुनिया भर में कृत्रिम बुद्धिमत्ता को नियंत्रित करने वाले नियम तय करने की लड़ाई भी शामिल है। 2026 में संयुक्त राष्ट्र एआई शासन पर वैश्विक संवाद आयोजित करेगा। यह मानकों, जोखिमों और नियमों में तालमेल के लिए पहला सचमुच वैश्विक मंच होगा। हालांकि, बुनियादी वैचारिक मतभेद अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को एकजुट करने के बजाय बांटने का खतरा पैदा करते हैं।
यूरोपीय संघ अधिकार-आधारित नियामक मॉडल का समर्थन करता है, जिसमें व्यक्ति की निजता और एल्गोरिदम की पारदर्शिता पर जोर है। अमेरिका ऐसे स्वैच्छिक मानकों के पक्ष में है जो नवाचार की गुंजाइश बनाए रखें। चीन "समावेशी सहयोग" को बढ़ावा देता है, लेकिन डेटा और तकनीक के उपयोग पर सरकारी नियंत्रण का बचाव भी करता है। अटलांटिक काउंसिल के विश्लेषकों के मुताबिक, नतीजा संभवतः "रूप में वैश्विक शासन, लेकिन सार में भू-राजनीतिक" होगा: वैज्ञानिक आकलनों पर सहयोग के साथ-साथ प्रतिस्पर्धी राष्ट्रीय रणनीतियां भी चलती रहेंगी।
चीन की कूटनीति खुलेपन और बहुपक्षीय सहयोग पर जोर देती है, जबकि वॉशिंगटन का रुख "अमेरिका फर्स्ट" है। बीजिंग की 2025 की वैश्विक एआई शासन कार्ययोजना में कई पक्षों की भागीदारी वाले "विविध, खुले और नवाचारी" तंत्र का स्पष्ट आह्वान किया गया। यह संदेश खास तौर पर ग्लोबल साउथ में असरदार है, जहां निर्यात नियंत्रण और लाइसेंस शुल्क के कारण अमेरिकी एआई तक पहुंच मुश्किल हो जाती है। मर्केटर इंस्टीट्यूट फॉर चाइना स्टडीज के सर्वेक्षण में शामिल चीन के करीब 80 प्रतिशत विशेषज्ञों का मानना है कि 2026 में बीजिंग निर्यात बाजारों में विविधता लाने और विकासशील देशों के साथ साझेदारी मजबूत करने में बड़ी प्रगति करेगा।
इस बीच, अमेरिका "तकनीकी श्रृंखला कूटनीति" के जरिए उन सहयोगी देशों को एआई बुनियादी ढांचे की साझेदारी की पेशकश कर रहा है, जो अमेरिकी मानक अपनाने को तैयार हैं। ट्रंप प्रशासन ने इसे सुरक्षा की जरूरत बताया है और चेताया है कि चीनी तकनीक ऐसी निर्भरता पैदा करती है जिसका विरोधी फायदा उठा सकते हैं। हालांकि, व्यापार विवादों और सहयोगी देशों पर वॉशिंगटन की प्रतिबंधात्मक निर्यात नीतियों के साथ तालमेल बैठाने के दबाव से अमेरिकी कूटनीतिक कोशिशों को झटका लग रहा है।
हकीकत का सामना: कई दौड़, कोई अंतिम रेखा नहीं
विश्लेषक अब एक ही "एआई दौड़" और उसके किसी निश्चित विजेता की उपमा को तेजी से खारिज कर रहे हैं। इसके बजाय यह प्रतिस्पर्धा डेकाथलॉन जैसी है, जिसमें कई आपस में जुड़ी हुई स्पर्धाएं हैं और हर एक में अलग विजेता हो सकता है। सेमीकंडक्टर डिजाइन, अत्याधुनिक मॉडलों की क्षमताओं और क्लाउड बुनियादी ढांचे में अमेरिका की बढ़त बरकरार है। ओपन-सोर्स को अपनाने, वास्तविक दुनिया में एआई के उपयोग, विनिर्माण में इसके एकीकरण और कंप्यूटिंग के विस्तार के लिए ऊर्जा संसाधनों में चीन आगे है।
राजनीतिक जोखिम परामर्शदाता यूरेशिया ग्रुप में भू-प्रौद्योगिकी निदेशक शियाओमेंग लू का अनुमान है कि 2026 में कोई एक देश हर क्षेत्र में बढ़त हासिल करने के बजाय दोनों देश अलग-अलग क्षेत्रों में हावी रहेंगे। उन्होंने कहा, "एआई चिपों में अमेरिका निश्चित रूप से आगे है, हालांकि चीन बड़े भाषा मॉडलों में उसकी बराबरी कर रहा है और एआई शासन के कुछ क्षेत्रों में आगे निकलने की स्थिति में है।" यह विभाजन निवेश के रुझानों में भी दिखता है: अमेरिकी कंपनियां सॉफ्टवेयर का विस्तार करने और ज्ञान-आधारित काम को स्वचालित करने पर ध्यान देती हैं, जबकि चीन का निवेश रोबोटिक्स और औद्योगिक उपयोगों की ओर जा रहा है।
इस बंटवारे के वैश्विक विकास पर गहरे असर पड़ेंगे। अगर एआई 21वीं सदी की निर्णायक तकनीक बनती है, तो इसे जल्दी अपनाने वाले और पीछे रह जाने वाले देशों के बीच "महान विभाजन" औद्योगिक क्रांति से पैदा हुई आर्थिक खाई से भी बड़ा हो सकता है। अमेरिकी तकनीकी ढांचा अपनाने वाले देशों को अत्याधुनिक क्षमताएं मिलेंगी, लेकिन उनकी लागत ऊंची होगी और साथ में राजनीतिक शर्तें भी होंगी। चीनी ओपन-सोर्स औजार अपनाने वालों को सुलभ और अपनी जरूरतों के मुताबिक ढलने वाले प्लेटफॉर्म मिलेंगे, लेकिन वे डीपसीक जैसी प्रणालियों में मौजूद सुरक्षा कमजोरियों और सेंसरशिप तंत्र के जोखिम में पड़ सकते हैं।
2026 आगे बढ़ने के साथ निर्णायक सवाल यह नहीं है कि कौन-सी महाशक्ति जीतेगी, बल्कि यह है कि क्या दुनिया ऐसे बंटे हुए एआई तंत्र का खर्च उठा सकती है, जिसमें अहम बुनियादी ढांचा परस्पर असंगत मानकों पर चले। डीपसीक के क्षण ने साबित किया कि इस क्षेत्र में प्रवेश की बाधाएं घट गई हैं। अब चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि ये घटती बाधाएं डिजिटल भविष्य को बांटने का कारण न बनें।
मुख्य तथ्य
- जनवरी 2025 में डीपसीक के जारी होने से साबित हुआ कि चीनी एआई मॉडल प्रतिबंधित चिपों का इस्तेमाल करके काफी कम लागत पर अमेरिकी मॉडलों के प्रदर्शन की बराबरी कर सकते हैं
- अमेरिकी वेंचर कैपिटल ने 2025 में एआई में 175 अरब डॉलर निवेश किए, जबकि चीन का निवेश 6 अरब डॉलर था। इसके बावजूद चीनी ओपन-सोर्स मॉडल अब दुनिया में सबसे ज्यादा डाउनलोड किए जा रहे हैं
- ट्रंप प्रशासन ने दिसंबर 2025 में निर्यात नियंत्रणों में आंशिक ढील दी। इसके तहत एनवीडिया की एच200 चिपें चीन को बेचने की अनुमति मिली, जबकि अधिक उन्नत ब्लैकवेल और रुबिन प्रोसेसर पर रोक बरकरार रही
- चीन की "एआई प्लस" पहल का लक्ष्य 2035 तक विनिर्माण, स्वास्थ्य सेवा और शासन के सभी क्षेत्रों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता को शामिल करना है
- अत्याधुनिक एआई चिपों के बाजार में अमेरिका का करीब 90 प्रतिशत नियंत्रण है, लेकिन बिजली बुनियादी ढांचे की सीमाएं डेटा केंद्रों का विस्तार रोक रही हैं
- अलीबाबा के क्वेन मॉडल दुनियाभर में 70 करोड़ बार डाउनलोड किए जा चुके हैं और सबसे अधिक अपनाए गए ओपन-वेट एआई सिस्टम बन गए हैं
- निर्यात नियंत्रणों में आंशिक ढील के बाद चीनी कंपनियों ने एनवीडिया की एच200 चिपों के लिए 50 अरब डॉलर से अधिक के ऑर्डर दिए हैं
- 2026 में संयुक्त राष्ट्र का एआई शासन पर वैश्विक संवाद, एआई के क्षेत्र में सचमुच वैश्विक तालमेल की पहली कोशिश है, हालांकि अमेरिका, चीन और यूरोपीय संघ के बीच मतभेद बने हुए हैं






