दशकों पुराने अमेरिकी गठबंधन के बावजूद थाईलैंड ने बीजिंग से सैन्य संबंध गहरे किए

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दशकों पुराने अमेरिकी गठबंधन के बावजूद थाईलैंड ने बीजिंग से सैन्य संबंध गहरे किए

उत्तर से नया हथियार भंडार

रॉयल थाई सेना ने चीन में बने 20 अतिरिक्त VN-1 बख्तरबंद वाहनों की खरीद का सौदा पक्का कर लिया है। यह खरीद की उस प्रवृत्ति को जारी रखता है, जिसमें वाशिंगटन के साथ दशकों पुराने सुरक्षा गठबंधन के बावजूद बैंकॉक सैन्य उपकरणों के लिए तेजी से बीजिंग का रुख कर रहा है। 1 अरब बाट (करीब 3.2 करोड़ डॉलर) के इस अनुबंध पर 12 जनवरी को चाइना नॉर्थ इंडस्ट्रीज ग्रुप कॉरपोरेशन (नोरिन्को) के बीजिंग मुख्यालय में हस्ताक्षर हुए। समारोह में थाई सेना के आयुध विभाग के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल नत्थापोर्न ख्वान-याम और चीन के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे।

विषय-सूची
  1. उत्तर से नया हथियार भंडार
  2. पनडुब्बी की लंबी दास्तान
  3. शीत युद्ध के सहयोगियों से जटिल संबंधों तक
  4. गुटबंदी से ऊपर व्यावहारिकता
  5. सैन्य अभ्यासों का विस्तार
  6. महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा के बीच राह बनाना
  7. वाशिंगटन की लगातार भागीदारी
  8. मुख्य बिंदु

इस ताजा खरीद से चीन के ZBL-09 पैदल सेना लड़ाकू वाहन का विकसित रूप VN-1, थाईलैंड के बेड़े में 120 से अधिक हो जाएंगे। यह खरीद बैंकॉक के 2025 के रक्षा बजट आवंटन का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य अग्रिम पंक्ति की पैदल सेना की क्षमता मजबूत करना है। पड़ोसी कंबोडिया के साथ जारी सीमा तनाव के चलते यह प्राथमिकता और बढ़ गई है। सरकार-से-सरकार व्यवस्था के तहत हुआ यह सौदा चीन-थाईलैंड सैन्य व्यापार के लगातार संस्थागत रूप लेने को दर्शाता है।

यह लेनदेन उस व्यापक रुझान की ताजा कड़ी है, जिसमें चीन ने थाईलैंड के प्रमुख हथियार आपूर्तिकर्ता के तौर पर अमेरिका की जगह ली है। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) के आंकड़ों के अनुसार, 2016 से 2022 के बीच बैंकॉक को चीन से 39.4 करोड़ डॉलर के सैन्य उपकरण मिले, जबकि अमेरिका से 20.7 करोड़ डॉलर के। इस बदलाव ने रक्षा विश्लेषकों का ध्यान खींचा है। वे इस बात पर सवाल उठा रहे हैं कि एक प्रमुख गैर-नाटो सहयोगी के सैन्य ढांचे में चीनी उपकरण शामिल होने के रणनीतिक नतीजे क्या होंगे।

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पनडुब्बी की लंबी दास्तान

हालांकि बख्तरबंद वाहनों की खरीद हाल की सुर्खियों में रही, लेकिन चीन-थाईलैंड रक्षा सहयोग का मुख्य केंद्र S26T डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बी की लंबे समय से लंबित खरीद है। रॉयल थाई नौसेना के एडमिरल नरेस वोंगत्रकुल ने पिछले महीने चीन का दौरा कर पनडुब्बी के निर्माण की प्रगति का जायजा लिया। यह बीजिंग से बैंकॉक का अब तक का सबसे महंगा एकल रक्षा सौदा है। शुरुआती पनडुब्बी के लिए करीब 41.2 करोड़ डॉलर (13.5 अरब बाट) की इस परियोजना में बार-बार देरी हुई है। इसका ढांचा 2019 में वुहान में तैयार किया जाना शुरू हुआ था।

यह परियोजना तब अटक गई जब जर्मनी ने 1989 के तियानमेन चौक कार्रवाई के बाद लगाए गए यूरोपीय संघ के हथियार प्रतिबंधों का हवाला देते हुए चीन को MTU396 डीजल इंजन निर्यात करने से रोक दिया। बैंकॉक ने शुरुआत में चीन में बने विकल्प स्वीकार करने से इनकार किया और उनकी विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए कड़े परीक्षण की मांग की। 6,000 घंटे से अधिक के इंजन परीक्षण के बाद चीनी अधिकारियों ने प्रमाणन दिया, जिससे संशोधित समझौते पर आगे बढ़ने का रास्ता खुला। नए अनुबंध के तहत निर्माण अवधि 40 महीने बढ़ा दी गई है। अब पनडुब्बी की आपूर्ति 2028 के अंत तक होने की उम्मीद है। समझौते में प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और चालक दल के प्रशिक्षण के प्रावधान भी हैं।

विश्लेषकों का मानना है कि पनडुब्बी सौदे का सामरिक उपयोग से परे प्रतीकात्मक महत्व भी है। कोरल बेल स्कूल ऑफ एशिया पैसिफिक अफेयर्स के रणनीतिक एवं रक्षा अध्ययन केंद्र के वरिष्ठ व्याख्याता ग्रेग रेमंड ने 2024 के एक विश्लेषण में कहा था कि थाईलैंड की पनडुब्बी खरीद भू-राजनीतिक संकेत देने की कोशिश है। बैंकॉक की रणनीति वाशिंगटन या बीजिंग में से किसी एक के साथ विशेष रूप से जुड़ने के बजाय, अपना दबदबा कायम किए बिना स्वायत्तता और अस्पष्टता बनाए रखने को प्राथमिकता देती है।

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शीत युद्ध के सहयोगियों से जटिल संबंधों तक

मौजूदा खरीद के रुझान अमेरिका-थाईलैंड गठबंधन की ऐतिहासिक दिशा से एक बड़ा बदलाव दिखाते हैं। दोनों देशों के बीच 1954 से औपचारिक सुरक्षा संबंध हैं। उस वर्ष थाईलैंड दक्षिण पूर्व एशिया संधि संगठन (SEATO) में शामिल हुआ और मनीला समझौते पर हस्ताक्षर किए। वियतनाम युद्ध के दौरान बैंकॉक अमेरिका का दृढ़ सहयोगी साबित हुआ। उसने अमेरिकी अभियानों में मदद के लिए 37,000 से अधिक सैनिक भेजे और पूरे इंडोचीन में युद्ध अभियानों के लिए यू-तापाओ एयर बेस उपलब्ध कराया। 2003 में अमेरिका ने थाईलैंड को प्रमुख गैर-नाटो सहयोगी का दर्जा दिया, जिससे साम्यवादी विस्तार को लेकर साझा शीत युद्धकालीन चिंताओं पर आधारित संबंध और मजबूत हुए।

हालांकि, 2006 और 2014 में सैन्य तख्तापलट के बाद इस साझेदारी पर गहरा दबाव पड़ा। इन तख्तापलटों में लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकारों को सत्ता से हटा दिया गया था। 2014 के तख्तापलट के जवाब में वाशिंगटन ने 35 लाख डॉलर की सैन्य सहायता रोक दी और संयुक्त सैन्य अभ्यासों का दायरा घटा दिया। इससे ऐसा खालीपन पैदा हुआ जिसे बीजिंग ने उत्सुकता से भरा। अमेरिका ने धीरे-धीरे कुछ सहयोग बहाल किया, लेकिन इन घटनाओं ने थाई सैन्य नेतृत्व पर स्थायी छाप छोड़ी। उनका निष्कर्ष था कि चीन मानवाधिकारों या लोकतांत्रिक शासन से जुड़ी राजनीतिक शर्तों के बिना अधिक भरोसेमंद मदद देता है।

खतरों को लेकर दोनों देशों की अलग-अलग धारणा भी गठबंधन को जटिल बनाती है। वाशिंगटन चीन को ऐसा संशोधनवादी शक्ति मानता है जो नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को चुनौती दे रही है, जबकि बैंकॉक को बीजिंग से अस्तित्वगत खतरा नहीं दिखता। थाई सैन्य नेताओं का ध्यान इसके बजाय आंतरिक स्थिरता और सीमा सुरक्षा पर है। ये प्राथमिकताएं हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका के रणनीतिक लक्ष्यों से जरूरी नहीं कि मेल खाएं।

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गुटबंदी से ऊपर व्यावहारिकता

चीनी हथियारों की ओर झुकाव की वजह बताते समय थाई रक्षा अधिकारी राजनीतिक गुटबंदी के बजाय व्यावहारिक पहलुओं का हवाला देते हैं। सबसे बड़ा आकर्षण लागत और किफायत है। चीनी सैन्य उपकरण आमतौर पर अमेरिकी या यूरोपीय विकल्पों से काफी सस्ते होते हैं। यह बैंकॉक के लिए अहम है, क्योंकि वह बजट की सीमाओं के बीच अपने उन सैन्य बलों का आधुनिकीकरण कर रहा है जिनके पास अब भी पुराने उपकरण हैं। उदाहरण के लिए, VN-1 वाहन पश्चिमी देशों के तुलनीय सिस्टम की कीमत के एक छोटे हिस्से में पैदल सेना को सहायता देने की क्षमता प्रदान करते हैं।

इसके अलावा, चीनी हथियार सौदों के साथ मानवाधिकार संबंधी शर्तें या अंतिम उपयोग की निगरानी की वे आवश्यकताएं नहीं होतीं, जो अक्सर अमेरिका की विदेशी सैन्य बिक्री के साथ जुड़ी रहती हैं। यह लचीलापन उन थाई सैन्य नेताओं को पसंद आता है जो कांग्रेस की निगरानी या लोकतांत्रिक शासन पर नसीहतों से मुक्त, सीधे-सादे लेनदेन चाहते हैं। 2014 के तख्तापलट के बाद वाशिंगटन ने सहायता रोक दी, जबकि इसी दौरान मिस्र पर लगी ऐसी ही पाबंदियां हटा लीं। इससे अमेरिकी नीति में दोहरे मानदंड की धारणा बनी और शर्तों से मुक्त चीनी सौदे और आकर्षक लगे।

खरीद की यह रणनीति थाईलैंड की ‘बांस कूटनीति’ की परंपरा को भी दर्शाती है। यह विदेश नीति का ऐसा तरीका है जिसमें लचीलापन और जड़ों से जुड़ाव दोनों अहम हैं। हवा के साथ झुकते बांस की तरह बैंकॉक मजबूत आधार बनाए रखते हुए बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों के अनुरूप ढलना चाहता है। आपूर्तिकर्ताओं में विविधता लाकर थाईलैंड रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखता है और किसी एक शक्ति पर अत्यधिक निर्भरता से बचता है। दक्षिण पूर्व एशिया में महाशक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा के पिछली सदियों के दौर में भी इस रुख ने थाईलैंड का साथ दिया।

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सैन्य अभ्यासों का विस्तार

हथियारों के हस्तांतरण से आगे बढ़कर चीन-थाईलैंड रक्षा सहयोग में अधिक उन्नत संयुक्त सैन्य अभ्यास शामिल हो गए हैं। 2015 में शुरू हुई फाल्कन स्ट्राइक श्रृंखला बुनियादी हवाई युद्धाभ्यास से आगे बढ़कर ऐसी जटिल गतिविधियों तक पहुंच गई है जिनमें पूर्व चेतावनी विमान, बमवर्षक और हवाई रक्षा इकाइयां शामिल होती हैं। 2024 के अभ्यास में पिछले वर्षों की तुलना में अधिक व्यापक युद्धक गतिविधियां शामिल थीं, जो दोनों पक्षों की परिचालन स्तर पर तालमेल बढ़ाने की प्रतिबद्धता दिखाती हैं।

इसी तरह, दोनों देशों की सेनाएं अब जमीन, समुद्र और हवाई क्षेत्रों में सालाना अभ्यास करती हैं। ये अभ्यास अब भी अमेरिका के साथ थाईलैंड के अभ्यासों जितने उन्नत नहीं हैं, लेकिन केवल प्रतीकात्मक गतिविधियों तक सीमित नहीं रह गए हैं। हाल के नौसैनिक सहयोग में आतंकवाद-रोधी रणनीतियों और पनडुब्बी-रोधी युद्ध पर ध्यान दिया गया है, जबकि थल सेना के अभ्यास थाईलैंड की आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों से जुड़ी आतंकवाद-रोधी कार्रवाइयों पर केंद्रित हैं।

हालांकि, बीजिंग के साथ सुरक्षा सहयोग में थाईलैंड ने स्पष्ट सीमाएं तय कर रखी हैं। अमेरिकी निर्मित F-16 और F-5 लड़ाकू विमान होने के बावजूद, थाई सेना चीन के साथ अभ्यास के दौरान इन अमेरिकी मूल के विमानों की तैनाती पर रोक लगाने वाले समझौतों का पालन करती है। वाशिंगटन की लगाई यह पाबंदी प्रौद्योगिकी उजागर होने की अमेरिकी चिंताओं को दर्शाती है और बताती है कि बैंकॉक को अपनी प्रतिस्पर्धी साझेदारियों के बीच कितना जटिल संतुलन साधना पड़ता है।

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महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा के बीच राह बनाना

थाईलैंड की मौजूदा सुरक्षा स्थिति में परस्पर प्रतिस्पर्धी दबावों के बीच सावधानी से रास्ता बनाना जरूरी है। बख्तरबंद वाहनों की हालिया खरीद का तात्कालिक कारण कंबोडिया के साथ जारी सीमा विवाद हैं। विवादित मंदिर स्थलों और सीमावर्ती क्षेत्रों को लेकर तनाव बढ़ा है। बैंकॉक और नोम पेन्ह दोनों ने एक-दूसरे पर बेवजह आक्रामकता का आरोप लगाया है। थाईलैंड ने अमेरिका, चीन और मलेशिया की तीसरे पक्ष की मध्यस्थता की पेशकश ठुकराकर द्विपक्षीय बातचीत को प्राथमिकता दी है।

इस अस्थिर माहौल में थाईलैंड अधिकतम कूटनीतिक लचीलापन बनाए रखना चाहता है। चीन के साथ उसके मजबूत आर्थिक संबंध हैं और चीन उसका सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। साथ ही, थाईलैंड कोबरा गोल्ड की मेजबानी करता है, जो दक्षिण पूर्व एशिया का सबसे बड़ा बहुराष्ट्रीय सैन्य अभ्यास है और अमेरिका के साथ मिलकर आयोजित किया जाता है। इस दोहरी नीति से बैंकॉक किसी भी पक्ष के खिलाफ औपचारिक रूप से खड़ा हुए बिना दोनों संबंधों के लाभ ले पाता है।

इस रणनीति में जोखिम भी हैं। सुरक्षा चिंताओं का हवाला देते हुए वाशिंगटन ने थाईलैंड को F-35 लड़ाकू विमान जैसे अपने सबसे उन्नत हथियार बेचने में हिचक दिखाई है। उसे आशंका है कि प्रौद्योगिकी चीन तक पहुंच सकती है। वहीं, पड़ोसी कंबोडिया में बीजिंग का बढ़ता प्रभाव, जिसमें रीम में नौसैनिक अड्डे तक पहुंच की कथित संभावना भी शामिल है, बैंकॉक को थाई सीमा के पास चीन की सैन्य शक्ति प्रक्षेपित करने की क्षमता को लेकर चिंतित करता है। थाईलैंड ने मेकांग नदी पर कानून प्रवर्तन के लिए चीन के उन गश्ती दलों के प्रस्ताव भी ठुकराए हैं जिन्हें थाई क्षेत्र में प्रवेश करना था। यह बीजिंग के साथ सहयोग की सीमा का संकेत है।

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वाशिंगटन की लगातार भागीदारी

चीनी उपकरणों की ओर रुझान के बावजूद, अमेरिका थाईलैंड के साथ रक्षा संबंधों में व्यापक रूप से सक्रिय है। विदेश विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, बैंकॉक के पास 3 अरब डॉलर से अधिक के सक्रिय विदेशी सैन्य बिक्री सौदे हैं। इनमें स्ट्राइकर पैदल सेना वाहन, ब्लैक हॉक और लकोटा हेलीकॉप्टर, F-16 उन्नयन पैकेज और हारपून मिसाइलें शामिल हैं। वित्त वर्ष 2019 से 2021 के दौरान अमेरिका ने थाईलैंड को 60.5 करोड़ डॉलर से अधिक के प्रत्यक्ष वाणिज्यिक रक्षा निर्यात की मंजूरी दी।

द्विपक्षीय संबंध उपकरणों की बिक्री से आगे बढ़कर सैन्य पेशेवर शिक्षा तक फैले हैं। अकेले 2022 में थाईलैंड ने अपने सैन्य कर्मियों को अमेरिका के प्रायोजित 244 प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों में भेजा, जिनमें अमेरिकी सैन्य सेवा अकादमियों में प्रशिक्षण भी शामिल था। इन शैक्षिक संबंधों से रॉयल थाई सशस्त्र बलों के भावी नेताओं के साथ दीर्घकालिक रिश्ते बनते हैं और दोनों सेनाओं के बीच तालमेल बढ़ता है। अमेरिका समुद्री सुरक्षा पहलों और मानवीय सहायता क्षमताओं के लिए भी धन मुहैया कराता है।

उच्च स्तर की हालिया यात्राएं दिखाती हैं कि वाशिंगटन इस संबंध के महत्व को पहचानता है। 2022 में रक्षा मंत्री लॉयड ऑस्टिन और विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन, दोनों ने बैंकॉक का दौरा किया और सैन्य आधुनिकीकरण तथा तकनीकी सहयोग में मदद का वादा किया। बाइडेन प्रशासन ने 2023 के कोबरा गोल्ड अभ्यास में हिस्सा लेने के लिए एक दशक में सबसे बड़ी अमेरिकी टुकड़ी को मंजूरी दी। इससे थाईलैंड में लोकतांत्रिक गिरावट को लेकर जारी चिंताओं के बावजूद, सहयोग के प्रति नई प्रतिबद्धता का संकेत मिला।

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मुख्य बिंदु

  • थाईलैंड ने जनवरी 2025 में 20 अतिरिक्त चीनी VN-1 बख्तरबंद वाहनों के लिए 3.2 करोड़ डॉलर का अनुबंध किया। इससे उसका बेड़ा 100 से अधिक वाहनों का हो जाएगा
  • 4० करोड़ डॉलर से अधिक मूल्य का S26T पनडुब्बी सौदा जर्मनी के इंजन निर्यात प्रतिबंधों के कारण वर्षों की देरी के बाद फिर शुरू हुआ है; अब इसकी आपूर्ति 2028 में तय है
  • 2016 से 2022 के बीच चीन थाईलैंड का सबसे बड़ा हथियार आपूर्तिकर्ता बना। उसने 39.4 करोड़ डॉलर के उपकरण दिए, जबकि अमेरिका ने 20.7 करोड़ डॉलर के
  • अमेरिका के साथ पारंपरिक रक्षा सहयोग कोबरा गोल्ड अभ्यासों, 3 अरब डॉलर के सक्रिय विदेशी सैन्य बिक्री सौदों और व्यापक सैन्य पेशेवर शिक्षा कार्यक्रमों के जरिए जारी है
  • थाईलैंड रणनीतिक स्वायत्तता की नीति बनाए हुए है। वह वाशिंगटन या बीजिंग में से किसी एक के साथ विशेष रूप से जुड़ने से बचते हुए कंबोडिया के साथ जारी सीमा तनाव संभाल रहा है
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