चीन की गाओकाओ फैक्टरी: परीक्षा-केंद्रित शिक्षा की सीमाएँ

पढ़ने में 14 मिनट
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कठोर रोज़मर्रा की दिनचर्या

सुबह 5:30 बजे अलार्म बजते ही श्री एलन वांग और उनके 4,000 सहपाठियों के पास जागने, बिस्तर ठीक करने और मैदान में इकट्ठा होने के लिए ठीक आठ मिनट होते थे। सुबह 5:38 बजे उनकी रोज़ाना 1.6 किलोमीटर की दौड़ शुरू हो जाती थी। इसके बाद 16 घंटे का थका देने वाला पढ़ाई का सत्र चलता, जो शायद ही कभी रात 10:00 बजे से पहले खत्म होता। छात्रावास की बत्तियाँ रात 10:10 बजे तक बुझा दी जाती थीं। हेबेई प्रांत के हेंगशुई नंबर 2 हाई स्कूल में तीन साल तक, सप्ताह के सातों दिन, यही दिनचर्या रही। अब 23 वर्ष के श्री वांग उस कड़े अनुशासन को याद करते हैं: रज़ाइयाँ बिल्कुल चौकोर तह की जाती थीं, चादरों पर एक भी सिलवट नहीं होनी चाहिए थी और नाश्ते तथा रात के खाने के लिए सिर्फ 15 मिनट मिलते थे। बाकी हर घंटे पढ़ाई के लिए तय था। इस बेहद सख्त समय-सारिणी का एक ही लक्ष्य था: गाओकाओ, चीन की राष्ट्रीय कॉलेज प्रवेश परीक्षा में शानदार प्रदर्शन करना और सिंघुआ या पेकिंग विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में जगह पाना।

विषय-सूची
  1. कठोर रोज़मर्रा की दिनचर्या
  2. दबाव का प्रतीक
  3. परीक्षा की फैक्टरी कैसे चलती है
  4. तनाव के व्यवस्थागत कारण
  5. जिसे टालना मुश्किल है, उसमें सुधार
  6. ज़मीनी हकीकत
  7. समानता और पलायन की चुनौतियाँ
  8. मानसिक स्वास्थ्य संकट
  9. आगे का रास्ता
  10. मुख्य बातें

"हेंगशुई मॉडल" के नाम से मशहूर इस शिक्षा पद्धति की बदनामी स्कूलों को परीक्षा की फैक्ट्रियों में बदलने के लिए हुई। हालांकि, हाल के आँकड़ों ने ऐसे चरम तरीकों की प्रभावशीलता और टिकाऊपन पर बहस छेड़ दी है। इस कठोर दिनचर्या की शुरुआत करने वाले हेंगशुई हाई स्कूल ने 2025 में चीन के दो शीर्ष विश्वविद्यालयों में कथित तौर पर केवल 45 छात्रों को भेजा, जबकि 2019 में यह संख्या अपने उच्चतम स्तर 275 पर थी। ऑनलाइन चार्ट 2021 के बाद से दाखिलों में लगातार गिरावट दिखाते हैं। इस गिरावट ने चीनी इंटरनेट उपयोगकर्ताओं को यह सवाल उठाने पर मजबूर किया है कि क्या यह मॉडल नाकाम हो रहा है या यह शिक्षा व्यवस्था की किसी गहरी समस्या का संकेत है। कुछ आलोचकों का कहना है कि यह अनुभव छात्रों का सीखने का उत्साह खत्म कर देता है, जबकि समर्थकों के अनुसार दूसरे स्थानीय स्कूलों की तुलना में यह अनुशासन और अवसर देता है।

दबाव का प्रतीक

हेंगशुई को लेकर बहस सिर्फ एक स्कूल के आँकड़ों तक सीमित नहीं है। यह चीन की परीक्षा-केंद्रित शिक्षा व्यवस्था में समाए तीव्र दबाव का प्रतीक बन गया है। गाओकाओ को सामाजिक उन्नति का सबसे स्पष्ट रास्ता माना जाता है और लाखों परिवारों के लिए यह जीवन की दिशा तय करने वाली घटना है। जनसांख्यिकीय बदलावों ने इस दबाव को और बढ़ाया है; दशकों तक चली एक-बच्चा नीति के कारण परिवार अपनी उम्मीदों और चिंताओं का पूरा बोझ एक ही बच्चे पर डालते हैं। बीजिंग नॉर्मल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर सांग गुओयुआन कहते हैं कि रचनात्मकता या व्यवहार-कौशल को मापने की सीमाओं के बावजूद, विशाल छात्र आबादी वाले देश में गाओकाओ अब भी चयन का सबसे कारगर तरीका है। उसकी कथित निष्पक्षता को नुकसान पहुँचाए बिना इसकी जगह कोई और व्यवस्था लाना कठिन है, इसलिए आंतरिक सुधार ही एकमात्र व्यावहारिक विकल्प बचता है।

2025 में करीब 1.335 करोड़ छात्रों ने परीक्षा दी। लगभग 80% छात्र किसी न किसी रूप में उच्च शिक्षा लेते हैं, लेकिन सिंघुआ और पेकिंग विश्वविद्यालयों में मिलाकर 0.5% से भी कम को दाखिला मिलता है। प्रोफेसर सांग का तर्क है कि कम आय वाले, ग्रामीण या जातीय अल्पसंख्यक समुदायों के छात्रों के लिए यह परीक्षा-आधारित व्यवस्था जीवन बदल सकती है और सामाजिक उन्नति का दुर्लभ अवसर देती है। वह खुद इसके लाभार्थी हैं: गाओकाओ के ज़रिये वे छिंगहाई प्रांत के एक ग्रामीण इलाके से बीजिंग के शीर्ष विश्वविद्यालय तक पहुँचे। फिर भी, इस व्यवस्था की मानवीय कीमत बहुत अधिक है। हर साल जून में परीक्षा के दौरान चीन के शहरों की रफ्तार थम जाती है; परीक्षार्थियों का शोर से बचाव करने के लिए यातायात के रास्ते बदले जाते हैं, निर्माण कार्य रोका जाता है और विमानों के मार्ग बदल दिए जाते हैं।

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परीक्षा की फैक्टरी कैसे चलती है

चीन के प्रतिस्पर्धी हाई स्कूलों के मानकों पर भी हेंगशुई मॉडल का सैन्य शैली वाला अनुशासन अलग दिखाई देता था। रोज़ की समय-सारिणी में पढ़ाई के अलावा किसी और चीज़ के लिए बहुत कम जगह थी। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि स्कूल की पुरानी कामयाबी सिर्फ उसकी कठोर शिक्षण पद्धति का नतीजा नहीं रही होगी। 21वीं सदी के शिक्षा अनुसंधान संस्थान के निदेशक प्रोफेसर शियोंग बिंगछी बताते हैं कि कई वर्षों तक हेंगशुई हाई स्कूल ने पूरे प्रांत से सबसे अधिक अंक पाने वाले छात्रों को सक्रिय रूप से अपने यहाँ बुलाया। यह चलन गैरकानूनी था, लेकिन करीब 2017 तक स्थानीय अधिकारियों ने इसे बर्दाश्त किया। नतीजतन, प्रांत की बेहतरीन प्रतिभाएँ एक ही स्कूल में इकट्ठी हो गईं और शानदार दाखिला नतीजों की राह आसान हुई। जब अधिकारियों ने दूसरे क्षेत्रों से छात्रों को भर्ती करने पर रोक लगाई, तो शीर्ष स्तर के नतीजे देने की स्कूल की क्षमता स्वाभाविक रूप से घट गई। हेंगशुई मॉडल की नकल करने वाले दूसरे स्कूल अक्सर नाकाम रहे, क्योंकि उन्होंने शीर्ष छात्रों को जुटाए बिना सिर्फ सख्त दिनचर्या अपनाई।

इस माहौल के मनोवैज्ञानिक असर की काफी आलोचना हुई है। आलोचकों का आरोप है कि इस व्यवस्था में छात्रों को परीक्षा देने वाली मशीनों की तरह देखा जाता है। सोशल मीडिया पर फैले कुछ सनसनीखेज दावों में कहा गया कि आत्महत्या रोकने के लिए स्कूलों ने खिड़कियों पर लोहे की जालियाँ लगाई थीं, हालांकि अक्सर इन दावों को गलत साबित किया गया। ये अफवाहें दिखाती हैं कि जनता हेंगशुई जैसी संस्थाओं को लेकर कितनी गहरी चिंता महसूस करती है। हालांकि, कुछ अभिभावक इस बदनाम करने के चलन का विरोध करते हैं। हेंगशुई हाई स्कूल से पढ़े बेटे की माँ वांग लुआन का कहना है कि स्कूल ने जिम्मेदार शिक्षकों के साथ सकारात्मक माहौल दिया। वह बताती हैं कि परीक्षा वाले साल में भी छात्रों को छुट्टियाँ मिलती थीं, जबकि कुछ दूसरे संस्थानों में ऐसा नहीं था। कम संपन्न इलाकों के कई अभिभावकों के लिए हेंगशुई का अनुशासन बेहतर भविष्य का मौका पाने के लिए जरूरी समझौता है।

तनाव के व्यवस्थागत कारण

विश्लेषकों का कहना है कि अलग-अलग स्कूलों के फैसले किसी व्यवस्थागत समस्या को ठीक नहीं कर सकते। छात्रों पर पड़ने वाला दबाव इस बात से नीचे तक पहुँचता है कि उच्च अधिकारी स्कूलों का मूल्यांकन कैसे करते हैं। प्रोफेसर सांग बताते हैं कि प्रांतीय शिक्षा अधिकारी अक्सर परीक्षा परिणामों के आधार पर रैंकिंग का दबाव बनाते हैं। कई क्षेत्रों में प्रधानाचार्यों की पदोन्नति और स्कूलों को मिलने वाले पुरस्कार सीधे इस बात से जुड़े होते हैं कि कितने छात्र शीर्ष विश्वविद्यालयों में पहुँचे। जब तक मूल्यांकन के ये मानदंड नहीं बदलते, स्कूलों के पास पढ़ाई का बोझ घटाने या पाठ्यक्रम को व्यापक बनाने की कोई खास वजह नहीं होगी। तीव्र प्रतिस्पर्धा ऐसा चक्र बनाती है जिसमें स्कूलों को अपनी स्थिति बनाए रखने के लिए और दबाव डालना पड़ता है और छात्रों को टिके रहने के लिए और त्याग करना पड़ता है।

इस माहौल ने युवाओं में मानसिक स्वास्थ्य संकट को बढ़ावा दिया है। हाल के एक शिक्षा सम्मेलन में प्रमुख विद्वानों ने चेतावनी दी कि चीन की बेहद प्रतिस्पर्धी व्यवस्था अधिकांश छात्रों को निराश कर रही है। उन्होंने बड़े पैमाने पर पढ़ाई से थकान और अवसाद के बढ़ते मामलों का ज़िक्र किया। विद्वानों ने ऐसे सुधारों की माँग की जो परीक्षा के अंकों से आगे बढ़कर अलग-अलग प्रतिभाओं और विकास के रास्तों को पहचानें। यह 2021 में शुरू की गई "दोहरी कटौती" नीति जैसी व्यापक सरकारी पहलों के अनुरूप है, जिसका मकसद होमवर्क घटाकर और मुनाफे के लिए दी जाने वाली ट्यूशन पर अंकुश लगाकर बोझ कम करना था। लेकिन सफलता का अंतिम पैमाना बनी गाओकाओ की मौजूदगी इन सहायक नीतियों के असर को सीमित करती है। जब तक एक ही परीक्षा विश्वविद्यालय में दाखिले तय करती रहेगी, परीक्षा के अंक अधिकतम करने का प्रोत्साहन समग्र कल्याण को बढ़ावा देने के प्रयासों पर हावी रहेगा।

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जिसे टालना मुश्किल है, उसमें सुधार

रटकर सीखने और असमानता की समस्याओं से निपटने के लिए चीनी सरकार एक दशक से भी अधिक समय से गाओकाओ व्यवस्था में सुधार की कोशिश कर रही है। राज्य परिषद ने 2014 में सुधारों की मौजूदा पहल शुरू की थी, जिसका लक्ष्य प्रतिभा चयन की अधिक व्यापक व्यवस्था विकसित करना है। प्रमुख बदलावों में कला और विज्ञान की कठोर धाराओं को खत्म करना शामिल है। नए मॉडल के तहत छात्र तीन अनिवार्य विषय (चीनी, गणित और एक विदेशी भाषा) लेते हैं और कई विकल्पों में से तीन अतिरिक्त विषय चुनते हैं। कुछ क्षेत्रों में "3+3" मॉडल अपनाया गया है, जबकि अन्य जगह "3+1+2" मॉडल है। इस लचीलेपन का उद्देश्य शिक्षा को छात्रों की रुचियों और भविष्य के करियर के रास्तों के अनुरूप बनाना है।

एक और बड़ा सुधार "दो आधार, एक संदर्भ" दाखिला ढाँचा है। इससे विश्वविद्यालयों में दाखिले की प्रक्रिया केवल अंकों पर आधारित रहने के बजाय अधिक संतुलित मूल्यांकन की ओर बढ़ती है। "दो आधार" में पारंपरिक गाओकाओ अंक और हाई स्कूल के तीन वर्षों के दौरान दी जाने वाली शैक्षणिक दक्षता परीक्षाओं के ग्रेड शामिल हैं। "एक संदर्भ" समग्र गुणवत्ता मूल्यांकन प्रणाली है, जो सामाजिक जिम्मेदारी, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य तथा कला उपलब्धियों जैसे व्यवहार-कौशल का आकलन करती है। इस प्रणाली का उद्देश्य विश्वविद्यालयों को छात्र की क्षमताओं की व्यापक तस्वीर देना है, ताकि सैद्धांतिक रूप से अंतिम परीक्षा के जीवन-मरण जैसे दाँव कम हों।

ज़मीनी हकीकत

इन ढाँचागत बदलावों के बावजूद, कई छात्रों के अनुभव बताते हैं कि दबाव कम नहीं हुआ है। झेजियांग जैसे प्रायोगिक प्रांतों में परीक्षा के कुछ हिस्से कई बार देने की सुविधा का मकसद चिंता घटाना था। इसके बजाय, छात्रों ने बताया कि उन्हें और तनाव हुआ, क्योंकि तैयारी पहले शुरू हो गई और परीक्षाएँ अधिक बार होने लगीं। नए परीक्षा कार्यक्रम के अनुसार चलने के लिए शिक्षक अक्सर दो साल का पाठ्यक्रम एक ही साल में पूरा कराते थे। झेजियांग की छात्रा याओ नानफांग ने बताया कि वह रोज़ाना रात 1:00 या 2:00 बजे तक पढ़ती थीं। उन्होंने कहा कि परीक्षा दोबारा देने का अवसर होने के बावजूद, माता-पिता और शिक्षक हर बार को आखिरी और इकलौता मौका मानते थे। परीक्षा दोहराने के बाद भी अंक न बढ़ने का डर भारी मानसिक तनाव पैदा करता था।

इसके अलावा, समग्र शिक्षा की ओर बदलाव का वादा कक्षाओं में धीरे-धीरे ही साकार हुआ है। प्रधानाचार्य मानते हैं कि पढ़ाई अब भी हर पक्ष के विकास के बजाय परीक्षा की तैयारी पर बहुत अधिक केंद्रित है। छात्र भी यही बात कहते हैं: सवालों के नए प्रारूप के बावजूद, रणनीति परीक्षा के ढर्रे में महारत पाने के लिए लगातार अभ्यास करने की ही है। याओ नानफांग ने व्यंग्य में कहा कि छात्रों को शारीरिक शिक्षा, खाना या नींद नहीं चाहिए, बस और अभ्यास चाहिए। हकीकत यह है कि जब तक विश्वविद्यालयों में दाखिले मुख्य रूप से परीक्षा के अंकों पर निर्भर रहेंगे, पढ़ाने के तरीके उन्हीं अंकों को अधिकतम करने पर केंद्रित रहेंगे।

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समानता और पलायन की चुनौतियाँ

सुधार प्रक्रिया में समानता का सवाल अब भी एक केंद्रीय चुनौती है। ऐतिहासिक रूप से गाओकाओ का संबंध घरेलू पंजीकरण, यानी हुकौ, व्यवस्था से रहा है। इसके चलते प्रवासी परिवारों के बच्चों को परीक्षा देने के लिए अपने गृहनगर लौटना पड़ता था। इससे उन परिवारों को भारी परेशानी होती थी जो कई वर्षों से शहरों में रह रहे थे। 2012 से लागू सुधारों ने धीरे-धीरे इन पाबंदियों में ढील दी है, जिससे पात्र प्रवासी बच्चों को अपने निवास वाले प्रांत में परीक्षा देने की अनुमति मिली है। शोध से पता चलता है कि इस नीति से माध्यमिक स्कूल की उम्र के बच्चों के पलायन की संभावना काफी बढ़ी है, जिससे परिवार साथ रह सकते हैं और बच्चों को शहरी शिक्षा के संसाधन मिल सकते हैं।

हालांकि, क्षेत्रों के बीच शिक्षा की गुणवत्ता में असमानता बनी हुई है। अधिक संपन्न प्रांतों और शहरों में बेहतर सुविधाएँ, अधिक अनुभवी शिक्षक और अतिरिक्त गतिविधियों के अधिक अवसर हैं। केंद्र और पश्चिमी क्षेत्रों के छात्रों के लिए दाखिले का कोटा बढ़ाने के मकसद से सरकार ने विशेष योजनाएँ लागू की हैं, लेकिन संसाधनों का अंतर अब भी नतीजों को प्रभावित करता है। प्रतियोगिताओं या उपलब्धियों के लिए पहले मिलने वाली अतिरिक्त अंकों की व्यवस्था को विशेषाधिकार प्राप्त परिवारों द्वारा उसका दुरुपयोग रोकने के लिए काफी सीमित कर दिया गया। फिर भी, संपन्न परिवार पूरक शिक्षा पर अरबों खर्च करते हैं और ऐसा लाभ बनाए रखते हैं जिसे नियंत्रित करना मुश्किल है।

मानसिक स्वास्थ्य संकट

लगातार शैक्षणिक दबाव की मानवीय कीमत तेजी से दिखाई दे रही है। चीन में किशोरों की आत्महत्या दर पर हुए अध्ययनों से एक चिंताजनक रुझान सामने आया है: संपन्न और उच्च शिक्षित परिवारों के छात्रों में कभी-कभी गरीब पृष्ठभूमि के छात्रों से अधिक जोखिम देखा जाता है। यह वैश्विक रुझानों से अलग है और प्रतिस्पर्धी माहौल में माता-पिता की उम्मीदों से पड़ने वाले विशिष्ट दबाव की ओर इशारा करता है। ग्रामीण इलाकों के "पीछे छूट गए" बच्चे, जो अकेलेपन और माता-पिता के सहारे की कमी से जूझते हैं, भी जोखिम का सामना करते हैं। सफल होने का तीव्र दबाव, यहाँ तक कि उन माता-पिता की ओर से भी जो बच्चों की गहरी परवाह करते हैं, युवाओं में अवसाद का एक दुखद कारण बन गया है।

अधिकारियों ने सप्ताहांत और छुट्टियों के दौरान फीस लेकर ट्यूशन देने पर रोक जैसे कदम उठाए हैं। फिर भी, परीक्षा-केंद्रित शिक्षा की सांस्कृतिक जड़ें गहरी हैं। गाओकाओ सिर्फ एक परीक्षा नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक संस्था है, जिसने 1977 में दोबारा शुरू होने के बाद से चीनी जीवन की लय तय की है। शिक्षा को सामाजिक उन्नति की एकमात्र सीढ़ी मानने वाले लाखों अभिभावकों की सोच बदलना पीढ़ियों का काम है। नीति-निर्माता भले ही "समग्र विकास" वाले व्यक्तियों की वकालत करें, लेकिन बाज़ार की हकीकत अक्सर यह तय करती है कि शीर्ष विश्वविद्यालयों के स्नातकों को सबसे अच्छी नौकरियाँ मिलें। जब तक विशिष्ट विश्वविद्यालयों की डिग्री और पेशेवर सफलता के बीच का आर्थिक संबंध कमज़ोर नहीं होता, ऊँचे परीक्षा अंक पाने की होड़ जारी रहेगी।

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आगे का रास्ता

हेंगशुई के नतीजों में हाल की गिरावट किसी बदलाव की शुरुआत का संकेत हो सकती है, या आक्रामक छात्र भर्ती बंद होने के बाद आँकड़ों में आया सुधार भर हो सकती है। वजह जो भी हो, इस गिरावट की ओर गया ध्यान ज़रूरी है। इससे ऐसी शिक्षा पद्धति की सीमाओं का सामना करना पड़ता है, जो व्यक्ति के कल्याण और रचनात्मकता के बजाय दक्षता और मानकीकृत पैमानों को प्राथमिकता देती है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और नवाचार से संचालित युग में चीन के आगे बढ़ने के साथ, तथ्यों को याद रखने की क्षमता से अधिक महत्व आलोचनात्मक और रचनात्मक ढंग से सोचने की क्षमता का हो रहा है। मौजूदा शिक्षा व्यवस्था ऐसे छात्र तैयार करने का जोखिम उठाती है जो परीक्षाएँ देने में तो माहिर हों, लेकिन आधुनिक कार्यक्षेत्र की जटिलताओं के लिए तैयार न हों।

वास्तविक सुधार के लिए परीक्षा के प्रारूप में मामूली बदलावों से अधिक की ज़रूरत है। इसके लिए स्कूल स्तर पर सफलता मापने के तरीके में बदलाव चाहिए। अगर प्रांतीय अधिकारी स्कूलों की फंडिंग और प्रधानाचार्यों की पदोन्नति को केवल शीर्ष विश्वविद्यालयों में दाखिला पाने वाले छात्रों की संख्या से जोड़ना बंद कर दें, तो स्कूलों को अपने पाठ्यक्रम में विविधता लाने की आज़ादी मिलेगी। "समग्र गुणवत्ता मूल्यांकन" प्रणाली को मज़बूत करना भी ज़रूरी है, ताकि वह छात्र की क्षमता को मापने का निष्पक्ष और एकसमान तरीका बने, न कि एक व्यक्तिपरक अतिरिक्त पैमाना। सबसे महत्वपूर्ण है छात्रों को करियर मार्गदर्शन और मनोवैज्ञानिक सहायता देना, ताकि वे कम कठोर लेकिन शायद अधिक उलझाऊ शिक्षा व्यवस्था में अपना रास्ता खोज सकें।

श्री वांग जैसे पूर्व छात्रों के लिए हेंगशुई का अनुभव जटिल है। वह कठिनाइयों को स्वीकार करते हैं, लेकिन इससे मिली दृढ़ता को भी अहमियत देते हैं। उन्हें उन शिक्षकों की स्नेहपूर्ण याद है जिन्होंने कठोरता के बीच दयालुता दिखाई। वहाँ बिताए समय को याद करते हुए उन्होंने छात्रों के बीच प्रचलित एक कहावत दोहराई: "हेंगशुई की कड़वाहट सह लेने के बाद, आगे आने वाली हर मुश्किल मीठी लगती है।" यह धैर्य सराहनीय है, लेकिन इसे ही चीनी शिक्षा की एकमात्र पहचान नहीं होना चाहिए। चीन के सामने चुनौती है कि वह गाओकाओ की निष्पक्षता बनाए रखते हुए ऐसी कड़वाहट पैदा करने वाली फैक्टरी जैसी मानसिकता को खत्म करे और इसके बजाय ऐसी व्यवस्था बनाए जो उत्कृष्टता के साथ सीखने की खुशी भी विकसित करे।

मुख्य बातें

  • शीर्ष विश्वविद्यालयों में दाखिले की दर घटने की खबरों के बाद "हेंगशुई मॉडल" की पड़ताल हो रही है और परीक्षा-केंद्रित शिक्षा की सीमाओं पर बहस छिड़ गई है।
  • चीन की गाओकाओ सामाजिक उन्नति का मुख्य रास्ता बनी हुई है, लेकिन यह छात्रों पर भारी दबाव डालती है और पढ़ाई से थकान तथा मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं में योगदान देती है।

    "दोहरी कटौती" नीति और परीक्षा के विषयों में बदलाव जैसे सरकारी सुधारों का उद्देश्य तनाव घटाना और समग्र विकास को बढ़ावा देना है, हालांकि इन्हें लागू करने की रफ्तार अक्सर नीतिगत लक्ष्यों से पीछे रहती है।

    असमानताएँ अब भी बनी हुई हैं: क्षेत्रों के बीच संसाधनों का अंतर और घरेलू पंजीकरण व्यवस्था की ऐतिहासिक बाधा ग्रामीण और प्रवासी छात्रों के अवसरों को प्रभावित करती है।

    विशेषज्ञों का कहना है कि सार्थक बदलाव के लिए स्कूलों के मूल्यांकन को केवल संख्यात्मक नतीजों से आगे ले जाना होगा, ताकि शिक्षा का अधिक विविध और मानवीय दृष्टिकोण संभव हो सके।

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