उस्मानियों से एर्दोआन तक: दक्षिण एशिया में तुर्की की फिर से बढ़ती दिलचस्पी

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उस्मानियों से एर्दोआन तक: दक्षिण एशिया में तुर्की की फिर से बढ़ती दिलचस्पी

सदियों पुराना रणनीतिक संबंध

दक्षिण एशिया में तुर्की की बढ़ती सक्रियता अंकारा और नई दिल्ली के बीच भौगोलिक दूरी को देखते हुए हैरान कर सकती है, लेकिन इस रिश्ते की जड़ें पांच सदियों से भी अधिक पुराने इतिहास में हैं। हालिया घटनाओं ने इस लंबे समय से चले आ रहे संबंध को फिर सुर्खियों में ला दिया है। तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोआन ऐसी नव-उस्मानी विदेश नीति अपना रहे हैं, जिसके तहत तुर्की का प्रभाव पूरे इस्लामी जगत में, खासकर उन क्षेत्रों में बढ़ाने की कोशिश की जा रही है जहां कभी उस्मानी सत्ता का असर था।

विषय-सूची
  1. सदियों पुराना रणनीतिक संबंध
  2. मुगल संबंध
  3. तीन भाई: आधुनिक रणनीतिक तालमेल
  4. सैन्य-औद्योगिक सहयोग
  5. भू-राजनीतिक गणनाएं और क्षेत्रीय प्रभाव
  6. बांग्लादेश का पहलू
  7. भारत-तुर्की तनाव
  8. आर्थिक पहलू और ऊर्जा सहयोग
  9. भविष्य की दिशा और सीमाएं
  10. मुख्य बातें

नवंबर 2025 में भारतीय जांचकर्ताओं ने संकेत दिया कि दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किले में हुए विस्फोट के समन्वय में तुर्की के एक सूत्रधार की भूमिका थी। उसी साल मई में भारत और पाकिस्तान के बीच सैन्य संघर्ष के दौरान तुर्की ने कथित तौर पर इस्लामाबाद को सैन्य उपकरण और खुफिया जानकारी मुहैया कराई। इन घटनाक्रमों से दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक परिदृश्य में तुर्की की नए सिरे से बढ़ती मौजूदगी का पता चलता है, जिस पर क्षेत्रीय शक्तियां करीबी नजर रख रही हैं।

इस सक्रियता की ऐतिहासिक नींव काफी मजबूत है। उस्मानियों के उदय से बहुत पहले भारत के रोमन और बीजान्टिन साम्राज्यों के साथ व्यापारिक संबंध थे। इन साम्राज्यों की राजधानी कॉन्स्टेंटिनोपल बाद में इस्तांबुल बनी। अरब विजयों से मध्य पूर्व का स्वरूप बदलने के बाद ये संबंध कमजोर पड़ गए, लेकिन अनातोलिया पर तुर्की समूहों के नियंत्रण और उस्मानी साम्राज्य की स्थापना के साथ एक नए रूप में फिर उभरे।

16वीं सदी की शुरुआत तक उस्मानी साम्राज्य मध्य पूर्व के बड़े हिस्से में फैल चुका था और हिंद महासागर के तट तक पहुंच गया था। उसे शक्तिशाली प्रतिद्वंद्वियों का सामना करना पड़ा: ईरान का शिया सफवी साम्राज्य और पुर्तगाली, जो समुद्री व्यापार पर प्रभुत्व के लिए पूर्वी अफ्रीका से भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया तक तटीय किले बना रहे थे।

मिस्र पर विजय के बाद उस्मानी सुल्तान ने पूरी मुस्लिम बिरादरी के नेता यानी खलीफा की उपाधि का दावा किया और मध्य अफ्रीका, मध्य एशिया तथा इंडोनेशिया तक अपना प्रभाव पहुंचाने की कोशिश की।

धार्मिक अधिकार मायने रखता था, लेकिन अस्तित्व के लिए सहयोगी भी जरूरी थे। फारस, रूस और पुर्तगाल तथा हैब्सबर्ग जैसी यूरोपीय शक्तियों से मिल रहे खतरों का मुकाबला करने के लिए उस्मानियों ने फ्रांस, बुखारा के उज़्बेक ख़ानत, आज के इंडोनेशिया के आचेह और कई भारतीय राज्यों तक से संबंध बनाए।

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मुगल संबंध

दक्षिण एशिया में उस्मानी प्रभाव अपने चरम पर तब पहुंचा, जब उसने मुगल साम्राज्य के उदय में निर्णायक भूमिका निभाई। उस दौर में उपमहाद्वीप में बारूद से चलने वाले हथियारों का व्यापक इस्तेमाल नहीं होता था। उस्मानी तोपखाने ने भारतीय युद्धकला को बदल दिया। सुल्तान सलीम प्रथम ने काबुल के शासक बाबर की मदद के लिए सेनापति, सैनिक, तोपें और माचलॉक बंदूकें भेजीं।

इस मदद से बाबर ने भारत में मुगल शासन की स्थापना की। बाद में मुगलों और उस्मानियों के संबंध सहयोग और प्रतिद्वंद्विता के बीच झूलते रहे। उन पर दोनों पक्षों की महत्वाकांक्षाओं और धार्मिक अधिकार के परस्पर विरोधी दावों का असर था। दिल्ली सल्तनत और मुगल साम्राज्य समेत भारत के कई बड़े मुस्लिम राज्यों की स्थापना तुर्की मूल के शासकों ने की थी।

18वीं सदी में मुगल सत्ता कमजोर हुई तो दक्षिण एशिया में उस्मानियों का महत्व एक बार फिर बढ़ गया। वे यूरोपीय उपनिवेश बनने से बचा एकमात्र बड़ा मुस्लिम साम्राज्य बने रहे और खिलाफत का दावा करते रहे। भारत के मैसूर समेत छोटे मुस्लिम राज्य वैधता और संरक्षण के लिए इस्तांबुल की ओर देखते थे।

ब्रिटिश शासन के दौरान उस्मानी सुल्तान भारतीय मुसलमानों के लिए प्रतीकात्मक महत्व रखते थे। यह भावना 1919 से 1922 के बीच खिलाफत आंदोलन के रूप में चरम पर पहुंची, जब भारतीय मुसलमानों ने उस्मानी खलीफा की रक्षा और साम्राज्य को खत्म करने की ब्रिटिश योजनाओं के विरोध में लामबंदी की।

मुस्तफा कमाल अतातुर्क द्वारा खिलाफत खत्म किए जाने के बाद भी यह विचार पूरी तरह मिटा नहीं। हैदराबाद की रियासत ने भारत में खिलाफत को फिर से स्थापित करने की संभावना पर विचार किया। निजाम के बेटों ने उस्मानी राजकुमारियों से विवाह किया। इतिहासकार सैम डेलरिम्पल के अनुसार, 1931 में निजाम ने "अंतिम खलीफा से एक दस्तावेज हासिल किया, जिसमें उनके पोते-पोतियों को इस्लाम का अगला खलीफा नामित किया गया था।" 1948 में हैदराबाद के भारत में विलय के साथ ये महत्वाकांक्षाएं खत्म हो गईं।

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तीन भाई: आधुनिक रणनीतिक तालमेल

आज के दौर में दक्षिण एशिया पर तुर्की का फिर से बढ़ता ध्यान उस नीति का हिस्सा है, जिसे कई लोग नव-उस्मानी विदेश नीति कहते हैं। राष्ट्रपति एर्दोआन उस्मानी और मुगल साम्राज्यों के पतन को ऐतिहासिक क्षति मानते हैं। इस सोच ने पाकिस्तान के साथ तुर्की के रिश्ते मजबूत किए हैं, क्योंकि पाकिस्तान खुद को मुगल विरासत का उत्तराधिकारी मानता है।

आज पाकिस्तान, तुर्की और अज़रबैजान का अनौपचारिक रक्षा समूह "तीन भाई" के नाम से जाना जाता है। संयुक्त सैन्य अभ्यासों, रक्षा उत्पादन के सह-निर्माण संबंधी समझौतों और बढ़ते खुफिया सहयोग के जरिए यह गठबंधन लगातार अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है।

मई 2025 में भारत-पाकिस्तान संघर्ष के दौरान—जो पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले के बाद शुरू हुआ था और जिसमें 26 हिंदू पर्यटक मारे गए थे—तुर्की ने लगभग तुरंत पाकिस्तान का पक्ष लिया। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने कश्मीर के लिए "अटूट समर्थन" देने पर तुर्की का आभार जताया।

खबरें आईं कि संकट के दौरान तुर्की ने पाकिस्तान को सैन्य उपकरण भेजे। तुर्की ने हथियार भेजने से इनकार किया, लेकिन इस बात से इनकार नहीं कर सका कि उसका C-130 सैन्य विमान तनाव के दौरान पाकिस्तान पहुंचा था। वैश्विक हवाई निगरानी प्रणालियों ने इसकी मौजूदगी दर्ज की थी।

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के साथ बातचीत के दौरान तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोआन ने आतंकवाद से मुकाबले के लिए दोनों देशों के बीच खुफिया जानकारी साझा करने के महत्व पर जोर दिया।

तुर्की और पाकिस्तान के रक्षा सहयोग का दायरा काफी बढ़ा है। पारंपरिक हथियार खरीद संबंधों से आगे बढ़कर अब यह उन्नत रक्षा-औद्योगिक सहयोग का रूप ले चुका है। PN मिल्गेम युद्धपोतों जैसी संयुक्त विकास परियोजनाएं और ड्रोन युद्धक क्षमता के लिए तकनीक हस्तांतरण समझौते इस बदलाव के उदाहरण हैं।

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सैन्य-औद्योगिक सहयोग

तुर्की और पाकिस्तान के बीच साझा भू-राजनीतिक हितों, मजबूत द्विपक्षीय संबंधों तथा बढ़ते व्यापार और निवेश पर आधारित रणनीतिक आर्थिक साझेदारी है। पाकिस्तान-तुर्की मुक्त व्यापार समझौता 2023 में लागू हुआ। यह व्यापार, निवेश और आर्थिक क्षेत्र में सहयोग को नियंत्रित करता है। दोनों देश 2027 तक द्विपक्षीय व्यापार को 5 अरब डॉलर तक पहुंचाना चाहते हैं।

दोनों देशों के बीच सैन्य सहयोग सक्रिय रूप से बढ़ रहा है। तुर्की के सैन्य विशेषज्ञ पाकिस्तानी सेना को उसकी क्षमता सुधारने में मदद कर रहे हैं। रक्षा क्षेत्र की प्रमुख परियोजनाओं में शामिल हैं:

  • मिल्गेम कॉर्वेट: 1.5 अरब डॉलर के समझौते के तहत संयुक्त रूप से बनाए जा रहे 4 जहाज
  • T129 अटक हेलीकॉप्टर: पाकिस्तान ने 30 हेलीकॉप्टरों का ऑर्डर दिया
  • JF-17 विमान सहयोग: तुर्की ने एयरोस्पेस क्षेत्र में सहयोग में दिलचस्पी दिखाई है

विशेष सेवाओं और सैन्य विभागों के बीच गहरा सहयोग है। तुर्की की MIT और पाकिस्तान की ISI पेशेवर सूचनाओं के आदान-प्रदान और सहयोग में शामिल हैं। सैन्य सहयोग का एक बड़ा हिस्सा सार्वजनिक नहीं है और गोपनीय रखा जाता है।

पिछले दशक में तुर्की के रक्षा उद्योग ने उल्लेखनीय वृद्धि की है। 2013 से 2023 के बीच तुर्की ने अपने रक्षा निर्यात में 106 प्रतिशत की बढ़ोतरी की और 2023 में यह आंकड़ा 7 अरब डॉलर से अधिक हो गया। इस सफलता में बायराक्तर ड्रोन जैसी स्वदेशी प्रणालियों की अहम भूमिका रही, जो लीबिया, नागोर्नो-काराबाख और यूक्रेन के संघर्षों के दौरान चर्चा में आया।

भारत के लिए तुर्की की सैन्य तकनीक तक पाकिस्तान की बढ़ती पहुंच, खासकर उन्नत ड्रोन प्रणालियों तक, चिंता का विषय है। इससे भारत की पारंपरिक सैन्य बढ़त कमजोर हो सकती है। तुर्की की उन्नत TB2 ड्रोन तकनीक पाकिस्तान को मिलने से कश्मीर में विवादित नियंत्रण रेखा के पास इस्लामाबाद की खुफिया जानकारी जुटाने, निगरानी और टोही क्षमता काफी बढ़ सकती है।

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भू-राजनीतिक गणनाएं और क्षेत्रीय प्रभाव

दक्षिण एशिया में तुर्की की नए सिरे से दिलचस्पी के पीछे दो व्यापक वजहें हैं। पहली, उपमहाद्वीप की बड़ी मुस्लिम आबादी और मुस्लिम देशों के साथ तुर्की के संबंध इस्लामी जगत में उसकी प्रतिष्ठा और भूमिका को बढ़ाते हैं। पाकिस्तान में तुर्की के टेलीविजन कार्यक्रम, संस्कृति और राजनीतिक विचार लोकप्रिय हुए हैं। कई लोग तुर्की को एक ऐसे मॉडल के रूप में देखते हैं जिसका अनुसरण किया जा सकता है।

दूसरी वजह रणनीतिक है। पाकिस्तान के साथ करीबी सुरक्षा और कूटनीतिक संबंध तुर्की को अपने रक्षा उद्योग का प्रदर्शन करने, मध्य और दक्षिण एशिया में अपनी पहुंच बढ़ाने, अरब देशों के प्रतिद्वंद्वी प्रभाव का मुकाबला करने और अपने पुराने प्रतिद्वंद्वी ईरान पर दबाव बनाए रखने का अवसर देते हैं।

अंकारा के नजरिये से ये संबंध भारत के प्रति शत्रुता से कम और क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं को आगे बढ़ाने से अधिक जुड़े हैं। हालांकि, पाकिस्तान के लिए तुर्की एक भरोसेमंद साझेदार नजर आता है। ऐसा उस समय है जब सऊदी अरब और ईरान, अपने आर्थिक और राजनीतिक कारणों से, नई दिल्ली के साथ संबंध बेहतर करना चाहते हैं।

तुर्की की रक्षा साझेदारी का मॉडल भारत के लिए उपयोगी संदर्भ पेश करता है। भारत अपनी भौगोलिक स्थिति का लाभ उठाते हुए, रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए और स्वदेशी रक्षा निर्माण को मजबूत करते हुए अमेरिका तथा पश्चिमी देशों के साथ संबंध भी गहरे कर सकता है।

तुर्की-पाकिस्तान संबंधों में तेजी व्यापक भू-राजनीतिक बदलावों के बीच आ रही है। अमेरिका का रणनीतिक झुकाव भारत की ओर है। अंकारा और इस्लामाबाद की रणनीतिक गणनाओं में भी यह बात शामिल है। दोनों देश इस तालमेल को रणनीतिक घेराबंदी के रूप में देखते हैं और बढ़ते सैन्य समन्वय तथा आर्थिक एकीकरण के जरिए इसका संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

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बांग्लादेश का पहलू

दक्षिण एशिया का भू-राजनीतिक परिदृश्य तुर्की-पाकिस्तान संबंधों से परे भी व्यापक बदलावों से गुजर रहा है। जुलाई 2024 में शेख हसीना सरकार के पतन के बाद से बांग्लादेश भारत को प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखने लगा है और पाकिस्तान की ओर झुक रहा है—उसी देश से, जिससे 1971 में भारत ने उसे आजादी दिलाने में मदद की थी।

एक बड़े कूटनीतिक घटनाक्रम में पाकिस्तान और बांग्लादेश ने अगस्त 2025 में राजनयिक और सरकारी पासपोर्ट धारकों के लिए वीजा-मुक्त यात्रा समझौते पर हस्ताक्षर किए। यह समझौता पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री मुहम्मद इशाक डार की ढाका यात्रा के दौरान किए गए छह समझौतों में से एक था। 13 वर्षों में यह इस स्तर की पहली यात्रा थी।

बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार प्रोफेसर मुहम्मद यूनुस ने कहा है कि विदेश नीति में बांग्लादेश 'सबके साथ संपर्क बढ़ा रहा है'। हालांकि, संकेत बताते हैं कि विदेश नीति में निर्णायक बदलाव हो रहा है और उनके पूर्ववर्ती की भारत-केंद्रित नीति से दूरी बनाई जा रही है।

यूनुस भारत के साथ व्यापार पर निर्भरता घटाकर बीजिंग के साथ नया रणनीतिक तालमेल बनाने की कोशिश कर रहे हैं। पाकिस्तान और तुर्की जैसे अन्य क्षेत्रीय साझेदारों से भी संबंध बढ़ाए जा रहे हैं। यह बांग्लादेश के क्षेत्रीय गठबंधनों को नए सिरे से तय करने की कोशिश है, जिससे दक्षिण एशिया में व्यापक भू-राजनीतिक बदलाव आ सकता है।

खबरों के मुताबिक, बांग्लादेश चीन से J10 और JF17 लड़ाकू विमान खरीदने की संभावनाएं तलाश रहा है। मई में भारत के साथ संघर्ष के दौरान पाकिस्तान की वायुसेना ने इन्हीं विमानों का इस्तेमाल किया था। यूनुस ने कश्मीर में अप्रैल के आतंकवादी हमलों की निंदा भी की है, लेकिन भारत अपने एक और पड़ोसी देश को उन्नत सैन्य उपकरण हासिल करते देखकर खुश नहीं होगा।

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भारत-तुर्की तनाव

भारत और तुर्की के संबंध सहज नहीं हैं। दोनों देशों के बीच व्यापार सीमित है और कई मुद्दों पर मतभेद कायम हैं। इनमें कश्मीर के मुद्दे पर तुर्की का पाकिस्तान को समर्थन और भारत के ग्रीस तथा आर्मेनिया के साथ लगातार बेहतर होते संबंध शामिल हैं।

यह खींचतान खास तौर पर दक्षिण काकेशस में दिखती है, जहां नागोर्नो-काराबाख को लेकर अज़रबैजान-आर्मेनिया प्रतिद्वंद्विता में तुर्की और भारत ने विरोधी पक्षों का समर्थन किया है। तुर्की अज़रबैजान का मजबूत समर्थक रहा है और उसने 2023 में बाकू को करीब 106 मिलियन डॉलर के हथियार दिए। दूसरी ओर, भारत आर्मेनिया के साथ करीबी से जुड़ा है और उसका सबसे बड़ा रक्षा आपूर्तिकर्ता बन गया है।

तुर्की की भू-राजनीतिक नीति और रक्षा साझेदारी का मॉडल दक्षिण एशियाई शक्तियों के लिए उपयोगी सबक पेश करता है। यूरोपीय संघ और अमेरिका के साथ संबंधों में आई मुश्किलों के बीच तुर्की धीरे-धीरे एक पारंपरिक पश्चिमी सहयोगी से रणनीतिक रूप से स्वायत्त शक्ति में बदल गया है।

तुर्की की रणनीतिक स्थिति और बढ़ती मुखरता से उसे लाभ हुआ है, खासकर नई विश्व व्यवस्था में, जहां पश्चिमी शक्तियां अस्तित्व से जुड़ी चुनौतियों से जूझ रही हैं। तुर्की ने अपनी रणनीतिक भौगोलिक स्थिति को अपनी भू-राजनीतिक ताकत का आधार बनाया है: यह यूरोप का पूर्वी प्रवेशद्वार और एशिया का पश्चिमी प्रवेशद्वार है।

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आर्थिक पहलू और ऊर्जा सहयोग

तुर्की-पाकिस्तान सहयोग का आर्थिक पक्ष पारंपरिक व्यापार से कहीं आगे तक फैला है और इसमें गहरे भू-राजनीतिक असर वाले रणनीतिक क्षेत्र शामिल हैं। ऊर्जा सहयोग इस आर्थिक साझेदारी का प्रमुख आधार है।

पाकिस्तानी जलक्षेत्र में गैस भंडार के दोहन और विपणन में तुर्की का संभावित योगदान पाकिस्तान को उन समुद्री ऊर्जा संसाधनों से कमाई का रास्ता दे सकता है, जिनका अब तक काफी हद तक उपयोग नहीं हुआ है। तुर्की के लिए पाकिस्तान के ऊर्जा विकास में भागीदारी, एशियाई संसाधनों को यूरोपीय बाजारों से जोड़ने वाला प्रमुख ऊर्जा केंद्र बनने की उसकी व्यापक महत्वाकांक्षा के अनुरूप है।

ईरान-पाकिस्तान गैस पाइपलाइन परियोजना के ठप होने की पृष्ठभूमि में यह ऊर्जा साझेदारी और रणनीतिक महत्व हासिल करती है। तुर्की के साथ ऊर्जा सहयोग की ओर पाकिस्तान का रुख क्षेत्रीय आर्थिक साझेदारियों में बदलाव का संकेत देता है, जिसका संभावित नुकसान ईरान को हो सकता है।

पिछले दशक में तुर्की, कतर और पाकिस्तान के त्रिपक्षीय संबंध भी महत्वपूर्ण हुए हैं। तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) के बड़े उत्पादक के रूप में कतर की स्थिति उसे ऊर्जा बाजारों में भारी प्रभाव देती है। पाकिस्तान और तुर्की, दोनों के साथ कतर के जुड़ाव के केंद्र में यही वित्तीय पहलू है।

2018-2019 में जब पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था भुगतान संतुलन की गंभीर चुनौतियों से जूझ रही थी, तब कतर ने जमा राशि और प्रत्यक्ष निवेश के रूप में 3 अरब डॉलर का पैकेज देकर मदद की। इसी तरह, तुर्की के चालू खाते के घाटे से निपटने में भी कतर ने सहायता दी। 2018 में दोहा ने तुर्की की अर्थव्यवस्था में सीधे 15 अरब डॉलर निवेश करने की घोषणा की थी।

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भविष्य की दिशा और सीमाएं

रणनीतिक महत्व के बावजूद तुर्की-पाकिस्तान साझेदारी कई बड़ी बाधाओं का सामना कर रही है, जो इसके भविष्य की दिशा तय करेंगी। आर्थिक कमजोरियां शायद सबसे बड़ी सीमा हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की सहायता पर पाकिस्तान की लगातार निर्भरता उसकी कूटनीतिक स्वतंत्रता को सीमित करती है।

इसी तरह, मुद्रा में उतार-चढ़ाव और महंगाई के दबाव समेत तुर्की की आर्थिक चुनौतियां उसकी महत्वाकांक्षी भू-राजनीतिक परियोजनाओं के लिए उपलब्ध संसाधनों को सीमित करती हैं। ये आर्थिक स्थितियां पश्चिमी शक्तियों को साझेदारी की सबसे विघटनकारी संभावनाओं पर अंकुश लगाने के लिए दबाव बनाने के अवसर देती हैं।

संस्थागत सीमाएं भी इस साझेदारी की दिशा तय करती हैं। नाटो की सदस्यता तुर्की की रणनीतिक स्वायत्तता पर कुछ पाबंदियां लगाती है, खासकर गैर-नाटो साझेदारों के साथ रक्षा सहयोग के मामले में। इसी तरह, चीन और अमेरिका के साथ पाकिस्तान के जटिल संबंध उस पर परस्पर विरोधी दबाव डालते हैं।

रणनीतिक प्राथमिकताओं में अंतर एक और संभावित बाधा है। तुर्की की मुख्य सुरक्षा चिंताएं पूर्वी भूमध्यसागर, सीरिया और कुर्द मुद्दे से जुड़ी हैं, जबकि पाकिस्तान का ध्यान मुख्य रूप से भारत और अफगानिस्तान पर है।

इन बाधाओं के बावजूद तुर्की-पाकिस्तान साझेदारी में कई क्षेत्रों में आगे बढ़ने की काफी क्षमता है। ऊर्जा सहयोग, संबंधों को गहरा करने के सबसे आशाजनक रास्तों में से एक है। रक्षा-औद्योगिक सहयोग भी विकास का एक अन्य क्षेत्र है। इसमें नौसैनिक प्लेटफॉर्म से आगे एयरोस्पेस, मिसाइल तकनीक और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियों तक विस्तार की संभावना है।

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मुख्य बातें

  • दक्षिण एशिया में तुर्की की ऐतिहासिक दिलचस्पी उस्मानी साम्राज्य के दौर तक जाती है, जिसने सैन्य तकनीक देकर मुगल साम्राज्य के उदय में मदद की
  • राष्ट्रपति एर्दोआन के नेतृत्व में आधुनिक तुर्की इस्लामी जगत में प्रभाव बढ़ाने के लिए "नव-उस्मानी" विदेश नीति अपना रहा है
  • पाकिस्तान, तुर्की और अज़रबैजान का "तीन भाई" गठबंधन एक अनौपचारिक रक्षा समूह है, जो सैन्य सहयोग मजबूत कर रहा है
  • मई 2025 में भारत-पाकिस्तान संघर्ष के दौरान तुर्की ने पाकिस्तान को सैन्य उपकरण और खुफिया जानकारी दी

    रक्षा सहयोग में मिल्गेम कॉर्वेट और T129 हेलीकॉप्टर का संयुक्त उत्पादन तथा ड्रोन तकनीक हस्तांतरण की संभावनाएं शामिल हैं

    बांग्लादेश भारत से दूर होकर पाकिस्तान, तुर्की और चीन के साथ करीबी संबंधों की ओर बढ़ रहा है

    तुर्की की प्राथमिकताओं में मुस्लिम जगत में प्रतिष्ठा बढ़ाना और दक्षिण एशिया में ईरानी तथा अरब प्रभाव का मुकाबला करना शामिल है

    आर्थिक सहयोग में मुक्त व्यापार समझौते शामिल हैं, जिनका लक्ष्य 2027 तक द्विपक्षीय व्यापार को 5 अरब डॉलर तक पहुंचाना है

    दोनों देशों की आर्थिक कमजोरियों और तुर्की की नाटो संबंधी बाध्यताओं के कारण इस साझेदारी की सीमाएं हैं

    कश्मीर, आर्मेनिया और क्षेत्रीय हितों को लेकर मतभेदों के कारण भारत-तुर्की संबंध तनावपूर्ण बने हुए हैं

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